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Delhi: Mall Culture Vs Mind Culture


बीते 16 दिसंबर 2012 की देर शाम दक्षिणी दिल्ली में एक चलती चार्टड बस में सामुहिक बलात्कार की घटना ने एकबारगी पूरे देश को स्तबध कर दिया है। इसी साल जुलाई में हुए गुवाहाटी में लड़की से छेड़खानी प्रकरण ने जो तुल पकड़ा, वह कहीं खो गया था और सनसनी फैलाने की वजह से इलेक्ट्रानिक मीडिया की भूमिका पर सवाल भी उठे थे। चुँकि इस बार की घटना दिल्ली की है फलत: मी़डिया से लेकर नारी संगठनों ने बेहतरीन एवं सराहनीय भूमिका निभाई। इसी का प्रभाव रहा कि 48 घंटे के अंदर इस घटना की गूंज लोकसभा के अंदर भी पुरर्जोर ढंग से सुनी गई। आरोपियों की घर-पकड़ हुई और दिल्ली उच्च न्यायालय ने खुद ही मामले का संज्ञान लिया। शीला दीक्षित की स्थिति शर्मनाक हुई और आनन-फानन में उन्होने कुछ ऐसे बयान भी दिए जो खुद ही इस बात की पुष्टि करते हैं कि अभी तक दिल्ली में सुरक्षा को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के पहले के निर्देशों की अवमानना हो रही है।  ज्ञात्तव है कि 40 मिनट तक दिल्ली की मुख्य सडकों पर दौड़ती इस बस मे काला शीशा और पर्दा चढा होता है जो कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का खुला उल्लंघन है। खैर, तेजी से हुई प्रशासनिक  कार्यवाही का दंभ भरनेवाली दिल्ली पुलिस और सरकार के लिए जो एक बात राहत देने वाली रही कि इस केस में एक भी आरोपी बड़े घराने से ताल्लुक नहीं रखता है वरना अबतक इस सिस्टम को समझ चुकी जनता के गाल पर दुसरा तमाचा भी पड चुका होता और हमारे सामने इस केस की कुछ और ही तस्वीर होती।
जब इंडिया गेट पर 18 और 19 नवंबर को स्वत: जुड़ी भीड़ ने कैंडिल लाईट मार्च निकालकर इस घटना का लेकर अपना जबर्दस्त विरोध प्रकट किया तो सामाजिक जागरुकता को लेकर हर्ष हुआ। अब इसे बेहतर ढंग से एक मुकाम तक पहुंचाने की जरूरत है। देश की सबसे सुरक्षित मानेजाने वाली राष्ट्रीय राजधानी में हुए इस जघन्य अपराध के बाद पूरे देश मे यह बहस चली कि इस मुश्किल दौर मे जबकि नारी के सुरक्षित जीने-चलने के अधिकार पर भी हमले तेज हो चुके है, प्रतिरोध की चेतना का एकजुट होना जरूरी है। हालांकि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अन्ना के आंदोलन के दूसरे अंक के दौरान हिंन्दुस्तान का आम आवाम य़ह महसूस कर चुका है कि प्रतिरोध की भावना सोशल मीडया पर "लाईक", "शेयर", "पोस्ट" और "'ट्वीट" तक ही सीमित न रह जाये। इसके लिए चेतना और एकजुट भावना का संगठित रुप में जमीं पर आना जरूरी है। इतिहास की गहराईयों में न भी जायें हाल के दिनों में मिस्र के तहरीर चौक के "सत्ता परिवर्तन की मांग" से लेकर न्यूयार्क का "आक्यूपाई वाल स्ट्रीट" जैसे आंदोलन कुछ और नहीं बल्कि दुनिया के फलक पर जनसंघर्ष और जनभावना का समग्र ध्रुवीकरण का बेहतरीन नमुना रहा है। कई बार ऐसा हुआ है कि जनांदोलनों ने ही संघर्षों को शुरू किया और मुक्कमल अंजाम तक पहुँचाया है। ऐसा होता रहा हे कि नेताओं से पृथक वृहत्तर एकांकी मुद्दो का संदर्भ लेकर आम अवाम ने ऐसी पटकथा लिख डाली है जिससे तब वे खुद अपरिचित थे। भारत में 1975 के दौर में हुआ जयप्रकाश नारायण के आंदोलन को इतिहासकारों ने इसका बेहतरीन उदाहरण माना है।

औरत के आत्मनिर्णय के अधिकार पर मर्द दबंगई को किनारा दे देने की वर्तमान भारतीय सामाजिक परिस्थिति एक संक्रमण काल से गुजर रही है(हालांकि यह अभी तक महानगरों और कुछ चुनिंदा प्रांतो तक ही सीमित है)। सत्ता की दुकानदारी, राजनैतिक दुर्बलता और कार्यपालिक अकर्मण्यता ने अभी तक हिंदुस्तान में पुरुषों की नारी के प्रति मानसिकता को दशकों पीछे ही ठेल रखा है। शारीरिक तुलना में नैसर्गिक रुप से सबल पौरूष-सौष्ठव अपने पौरूष्तव(या पशुत्व) को तबतक आजमाता रहेगा जब भी एकांतत्व में उसे नारी दिखेगी। अगर हमें इस पौरूष मन-मष्तिष्क को बदलना है तो यह खुलेपन से ही आयेगी। आप नारी को कपड़ों मे लपेटकर पशुओं के बीच उसके स्त्रीत्व कि रक्षा नहीं कर सकते हैं।

इस पुरे प्रकरण पर मशहूर एड-मेकर प्रह्लाद कक्कर का ब्यां स्पष्ट है। उनका कहना है कि आज अगर रात के 8-9 बजे एक अकेली लड़की जिंस या कोई मार्डन कपड़े पहनकर किसी बस या आटो का इंतजार कर रही होती है तो पुलिस वाले और आम अवाम के बीच यही संदेश जाता है कि यह कोई वेश्या है। वे आगे कहते है, कि अब इस मानसिकता से कोई कैसे करेगा मदद- फिर हम पुलिसवाले को ही दोष क्यों दे। और निचले स्तर पर काम करने वाले कांस्टेबल और बीट आफिसर जो सबसे अधिक इन परिस्थितयों से दो-चार होते हैं उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि क्या होती है? क्या खाप-पंचायतो के क्षेत्र में पला-बढा एक युवा अचानक से एक परीक्षा और 2-3 माह की ट्रेनिंग पास कर पुलिस सेवा ज्वाइन करते ही अपनी मानसिकता बदल पायेगा? 

स्पष्ट है कि जब हमारे समाज में स्त्री भ्रूण-हत्या के सर्वाधिक केस बड़े शहरों से आते हैं और भारतीय प्रशासनिक सेवा, वरिष्ठ मेडिकल अफसर और दिल्ली विश्विद्यालय के प्रोफेसर जैसे समाज के सम्मानीय लोग स्त्री भ्रूण-हत्या के दोषी पाये जाते हैं तो हमारा अक्स हमारे सामने है। हमारे समाज में स्त्रीयो को आज भी दोयम दर्जे का ही माना जाता है। कालेज परिसर और शापिंग माल में दिन के उजाले में हॅाट-पैंट कल्चर को अपनाती लड़कियाँ भी जानती है कि वे बस-स्टैंड पर सुरक्षित(उस वेश-भूषा) नहीं है। घनाढ्य घरों की लड़कियां तो व्यक्तिगत वाहनों से आवाजाही कर और अन्य संसाधनों से अपने को एक हद तक सुरक्षित रख कर "प्ले" और "डिस्प्ले" कर लेती हैं, परंतु सामान्य घरों की लड़कियों को अपने इर्द-गिर्द की सामाजिक मानसिकता और वास्तविकता को समझना होगा। 

Changing Perception And Social Media


अमेरिका के डा. किम मेसन, के अनुसार आज 8 बर्ष के बच्चे भी इंटरनेट से जुड़ चुके है और 8-18 बर्ष के बच्चे औसतन 7 घंटे समय आनलाईन मीडिया पर व्यतीत कर रहें है। हैरानी की बात यह है कि इन सात घंटो में वे किसी एक वेबसाईट से जुडे न रहकर विभिन्न पेजों पर विजीट करते रहते हैृ- इस कारण वे कुछ ऐसी वेबसाईट या पेजों के बारे में जान जाते है जो उनके बालमन को कुप्रभावित करती है। भारत में इंटरनेट का उपयोग करने वालों मे सर्वाधिक संख्या य़ुवाओं की है। हालांकि कंप्यूटर, लैपटाप, गेमिंग डिवाईस ने जहां इंटरनेट की पहुंच को सीमाओं मे रखा था टेबलेट और मोबाईल के आने से यह सर्वसुलभ हो गया है। अब तो पटना, मुजफ्फरपुर और मोतीहारी तक मे आपको युवाओं का मोबाइल-इंटरनेट प्रेम राह चलते दिख जायेगा। आये दिन ये प्रचलन सड़क दुर्धटनाओं का कारण भी बन रही हैं।
अमेरिका के "जर्नल आफ द अमेरीकन मे़डिकल ऐसोसिएशन" द्वारा एकत्रित किये गए आंकड़ो के अनुसार फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया को लेकर युवाओं मे नशा जैसा असर है, और उनकी मानसिक अवस्था को लेकर अमेरिकी प्रशासन और अभिभावकों में चिंता है। इसके लिए कई संस्थाओं ने सार्थक पहल भी किए हैं परंतु इंटरनेट के व्यापक रचनात्मक उपयोग को देखते हुए एकमत होना कठिन है।
क्या है साईबरबुलिंग
मोबाईल अथवा इंटरनेट पर उपलब्ध तकनीकों का इस्तेमाल कर के किसी व्यक्ति, ग्रुप या समूह को बदनाम करना, उत्तेजक सामग्री भेजना अथवा अपशब्दों का प्रयोग कर परेशान करना ही साईबरबुलिंग है। आज साईबरबुलिंग को कम ही लोग समझ पा रहे है क्योंकि यह वह अनुभव है जिसे दनिया पहली बार महसूस कर रही है। आप इसे कालेज की रैगिंग कह सकते है परंतु चुंकि इसका दायरा असीमित है इसलिए इसका शिकार कोई भी हो सकता है। उदाहरण के तौर पर लगातार किसी लड़की या महिला को उसके मोबाइल या इ-मेल या फेसबुक अकाउंट पर अशलील कमेंट या तस्वीर भेजना ही साईबरबुलिंग है। चुँकि मोबाईल की तुलना मे इंटरनेट पर पहचान छुपाये रखना आसान है इसलिए गलत किस्म के लोग लगातार काफी दिनों तक जबर्दस्ती किसी से संपर्क बनाये रखते है। अन्य शब्दों मे एकतरफा प्रयास है साईबरबुलिंग। पहचान छुपाये रखकर किसी को लगातार परेशान करते रहना है साईबरबुलिंग।
युवाओं में सर्वाधिक लोकप्रिय है यह तकनीक
गुगल-गुरु जैसे सर्वज्ञानी के सानिध्य मे खुलेपन का यह दौर भारतीय युवाओं में घटती जिम्मेदारी का प्रमुख कारण बनता जा रहा है। एक रिसर्च के मुताबिक मात्र 8 प्रतिशत भारतीय युवा इंटरनेट और गुगल का प्रयोग रचनात्मक कार्यों जैसे प्रोजेक्ट बनाना, लेख-आलेख या किसी कला को सीखने के लिए करते हैं। इस आलेख को सजीव करने के उद्देश्य से हमने पटना विश्विद्यालय का दौरा किया तो नाम न बताने की शर्त पर ज्यादातर युवा छात्रों ने खुलासा किया की वे इंटरनेट का प्रयोग मनोरंजन और पोर्न सामग्री के लिए करते है। 60 प्रतिशत छात्र सिर्फ दोस्तों से जुडे रहने के लिए इन तकनीकों का इस्तेमाल करते है। हालांकि छात्राओं का मत कुछ भिन्न रहा और सिर्फ 35 प्रतिशत ल़डकियों ने कहा कि वे दोस्तों से जुडे रहने के लिए इंटरनेट और फेसबुक का प्रयोग करती है।
क्या-क्या है इंटरनेट पर
आज के दौर मे यह आवशयक है कि अभिभावक भी इस तकनीक को समझें, और इंटरनेट को बेहतर समझने के लिए जरुरी है कि आप पहले कुछ दिनों तक इसे इस्तेमाल करें- ठीक उसी तर्ज पर "पहले इस्तेमाल करें फिर विश्वास करें"। क्या आपका अचार खराब हो जाता है? संजीव कपूर और तरला दलाल की रेसिपी चाहिए? कप़ड़ो पर लगे ग्रीस के दाग छुड़ाना चाहती है। इससे आगे यदि किसी भी तरह की चिकित्सकीय जानकारी चाहिए जैसे एचआईवी और ब्रेस्ट कैंसर से संबंधित बाते पूछने मे हिचकिचाहट होती है तो इंटरनेट पर जुडें। सेक्स समस्या है तो क्या करें? ब्लड प्रेशर, दिल का दौरा जैसे गंभीर परिस्थितयों में क्या हो आपका फर्श्ट रियेक्शन। इंटरनेट पर इन सभी का पलभर में जबाव आप पा सकते है। मुझे आज भी वह दौर याद है जब मेरी माँ पेपर और मैगजीन में छपे "नानी माँ के नुस्खे" या समानांतर टिप्स के कतरन काटकर सुरक्षित रख लेती थी, परंतु अफसोस की ज्यादातर परिस्थितयों में या तो वह कतरन मिलती ही नहीं थी या याद नहीं रहता था कि फलां टापिक पर आपके पास सामग्री मौजूद है।
आज के दौर मे आप इंटरनेट से दुर नहीं रह सकते है। इसकी मदद से घंटो मे होने वाले काम पलक झपकते ही हो जाते हैं। जैसे गैस का नंबर लगाना हो या ट्रेन में टिकट आरक्षण करना हो। बिजली का बिल, फोन या मोबाईल का बिल सहित तमाम यूटीलिटी बिल जमा करने में जहां पहले आपको 3-4 दिन लग जाते थे आज आप 10-15 मिनटों में कर सकते है। अमेरिका, कनाड़ा या आस्ट्रेलिया मे बैठे अपने बच्चों से आप लाईव तस्वीरें के माध्यम से अपने मोबाईल या पीसी पर जुड़ कर बात कर सकते है। अब इन अनगिनत सुविधाओं का लाभ पाने के लिए अगर महीने के दो-तीन सौ रूपये खर्च भी करने पड़े तो डेफ्नेटली नाट ए बैड डील।
बच्चो के लिए क्यों जरूरी है इंटरनेट
आज 8-9 बर्ष के बच्चे भी अभिभावकों से इंटरनेट इनेबल्ड मोबाईल, टेबलेट या पीसी की मांग करने लगे है। ऐसे में यह आवशयक है कि अभिभावक बच्चो की आवश्यकता को समझे। दिल्ली जैसे शहर मे रहनेवाली मेरी बहन अपने बच्चो को इंटरनेट देने के पक्ष मे नहीं थी परंतु जब केंद्रीय विद्यालय मे पढनेवाले उसके 8 बर्षीय बेटे को प्रोजेक्ट और असांइनमेंट पूरा करने में दिक्कत होने लगी तो मैने उसे इंटरनेट और गूगल गूरू (इंटरनेट पर उपलब्ध सर्च इंजन) की मदद लेने का सूझाव दिया। अब चाहे एटलस हो, इंगलिस डिक्सनरी हो या फिर देशों की राजधानी के नाम। प्रधानमंत्री का कार्यकाल या कोई लेख लिखने कि चुनौती 8 बर्षीय मोहित खुद ही सारी सामग्री ढूंढ लेता है और उसके असांइनमेंट समय से पहल पूरे हो जाते है।
अभिभावक हो रहे गुमराह
इंटरनेट पर बातचीत करने के लिए कीबोर्ड की मदद से टेक्सट टाईप करना होता है। चुंकि लोग कम शब्दों या लेटर में अपने को व्यक्त करना चाहते है इसलिए प्राय: शब्दों को संक्षेप मे लिखते और भेजते है, जैसे OK के लिए सिर्फ K और Take Care  के लिए TC. कालांतर मे यह आदत एक भाषा का रुप ले चुकी है जिसे net lingo कहा गय़ा। 1990 के दौर तक ILU शब्द को युवाओं में भरपूर प्रसार मिला हालांकि तब के दौर के अभिभावक इसके पीछे के अर्थ को समझते थे और इसलिए यह प्रेमी युगलों के खतों के अंदर की बात रही। परंतु फेसबुक, ट्वीटर और I-messaging के वर्तमान दौर मे अनगिनत ऐसे आदिवर्णिक(acronym) शब्द हैं जिसे देखकर भी हमें-आपको उसका गूढ जल्दी नहीं समझ आ सकता।

भावी राजनीति की पृष्ठभूमि और छात्र राजनीति


पटना विश्विद्यालय में 28 बर्षों बाद हुए छात्र संगठन चुनाव के शांतिपूर्ण समापन पर सभी ने राहत की सांस ली है। लगभग एक महीने तक युवा उर्जा से लवरेज इस पुरे चुनावी प्रकरण से विश्विधालय के शैक्षणिक आभामंडल पर पड़ने वाले प्रभावो पर कयास चाहे जो भी लगायें जायें एक बात तय है कि इस चुनाव में कोई भी गंभीर और वैचारिक दृढ उम्मीदवार नजर नहीं आया। यहां तक की वाम दलों की राजनीति में भी परिपक्वता का अभाव स्पष्ट दिखा।
लगभग तीन दशकों के बाद हुए इन छात्र संघ चुनाव परिणामों पर किसी गंभीर विश्लेषण की आवशयकता हो न हो, यह कतई महत्वपूर्ण है कि निकट भविष्य में इस चुनाव की सार्थकता पर ही गंभीर प्रश्न खड़ा न होने लगे। चूँकि छात्र संगठन के प्रमुख पदों पर पृथक पार्टियों के समर्थित उम्मीदवारों ने जीत हासिल की है, इसलिए विश्विधालय में उनके एकत्रित प्रयास से ही कोई बदलाव संभव है। वर्तमान राजनीतिक या सामाजिक परिदृश्य में एकता का अभाव सर्वविदित है, फलत: इन छात्र नेताओं के प्रयास संगठित होगें- ऐसी उम्मीद करना बेमानी है। फिर अकेले किसी एक छात्र या संगठन के प्रयास से कोई उल्लेखनीय घनात्मक परिवर्तन होगी- ऐसा एक बर्ष के अल्पकाल में तो संभव नजर नहीं आता है। इसके अलावे एक-दूसरे को नीचा दिखाने कि होड़ मे कहीं छात्र हितों का ही नुकसान नहीं हो जाए- यह भी गौर करने वाली बात है। राज्य के बाहर और दिल्ली विश्विद्यालय तक में ऐसे आचरण वक्त-वक्त पर दिखते रहे हैं।
क्या है "राजनीति" और "राजनेता"
वर्तमान राजनैतिक परिस्थिति में "राजनेता" एक ऐसा इकलौता शब्द बन चुका है जिसे पर्यायवाची के रुप में आप किसी भी ऋणात्मक व्यक्तित्व के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। "दबंग", "बाहुबली", "फरेबी","ठेकेदार", "बेईमान", "भ्रष्ट", "अनैतिक", "ठग" और यहाँ तक की "अपराधी" और "चमचा" भी। एक सफल राजनेता या नेता शब्द से आज एक ऐसे व्यक्ति की छवि ही उभरती है जो शारीरिक रूप से सबल हो, डरावनी शक्ल हो, सफेद वस्त्रधारी हो और जिसके आस-पास हमेशा लठैतों की टोली हो - और हाँ, वह किसी बड़ी गाड़ी पर लाव-लश्कर के साथ ही चलता हो। अधिक गहराई से मनन करें तो इनकी गाड़ी ही ट्रैफिक नियमों को निर्धारित करती होती है, जिसपर काला शीशा चढा हो।
दरअसल, सबसे पहले तो यह समझना जरूरी है कि राजनीति है क्या? आज जब हम राजनीति की बात करते हैं तो जो रूप हमारे सामने आता है वह है भ्रष्टाचार और पतन के दलदल में आकंठ डूबायेनकेन प्रकारेण सत्ता प्राप्ति का जूगाड़ बैठाता एक ऐसा वर्ग जिसके लिए आदर्श केवल किताबी शब्द है और झूठ-फरेब ही आदर्श। लेकिन क्या राजनीति का बस यही अर्थ होता है? नहीं - सत्ता की इस पतित राजनीति के बरक्स एक और राजनीति होती है रचनात्मक परिवर्तन की। अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए संघर्ष ही राजनीति है।इतिहास को छोड़ भी दें तो क्या कुछ समय पहले तक बिहार के युवा, नीतिश कुमार को अपना आदर्श नहीं मानने लगे थे- यह और बात है कि ओछी राजनीतिज्ञों और भ्रष्ट पदाधिकारियों की संगत उनके व्यक्तित्व पर भी हावी हूई और आज उनपर लगने वाले आरोप कमोबेश सही भी साबित हो रहे है। बिहार के राजनैतिक शीर्ष पर पिछले 22 बर्षो से काबिज लालू और नीतीश छात्र राजनीति की ही उपज हैं।
क्यों हो छात्र राजनीति?
प्राय: हर प्रजातांत्रिक राष्ट्र कि यह विडम्बना रही है कि लोग राजनीति और राजनीतज्ञों को बुरा मानते है। अभी हाल के हुए अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव भी इससे फितर नहीं है। भारतीय राजनीतिक पृष्ठभूमि पर गौर करें तो पायेंगे कि देश की स्वतंत्रता के ओजपूर्ण निर्णायक संघर्षपूर्ण संग्राम में भी अनेकानेक भारतीय परिवारों ने अपनी युवा पी़ढी को इससे पृथक रखने की कोशिश की है। राजनीति से एक सुरक्षित दूरी बनाये रखने मानसिकता ने हमेशा से अभिभावकों को अपने बच्चों को राजनीति मे आने से रोका है। बुद्धिजीवी वर्ग का एक बड़ा घटक यह मानता है कि छात्र जीवन सिर्फ और सिर्फ अध्धयन के लिए है और राजनीति एवं राष्ट्र निर्माण जैसी बातें महाविद्यालय या विश्वविद्यालय प्रांगण के बाहर ही होनी चाहिए।
भारतीय युवाओं की क्रांतिकारी चेतना के प्रतीक शहीद भगत सिंह ने विद्यार्थी और राजनीतिनामक लेख लिखकर भारतीय मानसपटल पर फैले इन विचारों का बेहतरीन प्रतिकार किया था। उनका लेख जहां युवाओं को झकझोर देने में सफल रहा, वहीं अभिभावकों में उसका प्रभाव सीमित ही रहा। इस मुद्दे पर पृथक विचार हो सकते हैं परंतु इस संदर्भ में यह जान लेना आवश्यक है कि जिन राष्ट्रों की बुनियाद में युवा उर्जा या आक्रोश नहीं है वे शिथिल राष्ट्र हैं और अंतराष्ट्रीय परिदृश्य पर उनकी कोई पहचान नहीं है।  ऐसा इसलिए है कि लोकतांत्रिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए संघर्ष ही राजनीतिहै, और संघर्ष से ही पहचान बनती है।
इस संदर्भ में एक और बात जान लेनी बेहद जरूरी है कि कि छात्रसंघ और छात्र राजनीति का अधिकार हमें किसी खैरात में नहीं मिला है। इसे हमारे पूर्ववर्ती पीढ़ियों ने लम्बे संघर्ष के बाद अपने खून-पसीने की कीमत पर हासिल किया है। कालांतर में भले ही मुख्यधारा के राजनीतिक दलों ने इस संघर्ष की राजनीतिको स्वार्थ के ट्रेनिंग सेंटरमें बदल दिया हो लेकिन अपने मौलिक रूप में यह विरोध और प्रखरता की राजनीति है जिसमें एक छात्र आरंभ से ही अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिये संघर्ष करना सीखता है। किताबों के साथ यह भी एक जरूरी पढ़ाई है जो कहीं और नहीं सीखी जा सकती। इसलिए नवनियुक्त छात्रनेता, “राजनीतिकी वर्तमान व्याख्या को सिरे से खारिज करें और पढ़ाई तथा पढ़ाई के अधिकार के लिये लड़ाई करें तब ही इन चुनावों की सार्थकता है।
सामाजिक संवेदनहीनता
अपने अधिकारों के लिए लड़ाई नहीं करने की सीख ही हमारी वर्तमान कुव्यवस्था के लिए उत्तरदायी है। चुप रहने की इस आदत को हम भले ही अपनी सहिष्णुता का शाब्दिक मुखौटा दें पर यह निशचित ही कायरता एवं संवदेनशून्यता ही है। सड़क नहीं है तब चुप है, बिजली नही है तब भी चुप हैं। अपराधी शोषण करे तब चुप हैं, पुलिस अत्याचार करे तब भी चुप है। अधिकारी काम न करे तब चुप हैं, अधिकारी काम करने के लिए पैसे माँगे तब भी चुप है। यह खामोश रहने की कैसी ट्रेनिंग मिली है आम भारतीयों को आजादी के 65 बर्षों मेऐसे दमघोंटू मौहाल में छात्र राजनीति ही एक ऐसा विकल्प दे सकने में समर्थ है जिससे व्यापक मूलभूत रचनात्मक परिवर्तन हो सकता है जिससे देश में हर तरह का शोषण समाप्त हो सके और एक जातिविहीन, धर्मविहीन और वर्गविहीन समाज की स्थापना हो सके। यह तो निश्चित है कि क्रांति के लिए बंदूकों की नहीं परिवर्तन विचारों की जरूरत है और इसके लिए युवाओं को राजनीति में लाना आवश्यक है ताकि वे नये आधार से राजनीति की व्याख्या कर सकें क्योंकि पुराने जीर्ण-शीर्ण व्यक्तिगत स्वार्थ के आधार पर बनाए गए राजनैतिक इमारतों को भ्रष्टाचार के दीमकों ने संपुर्णत: निगल लिया है।
राजनैतिक अपरिपक्वता

आजा मेरी गाड़ी में बैठ जा की संस्कृति में पले-बढे इन नव कोपलित राजनीतज्ञों से ज्यादा उम्मीद रखना बेमानी ही होगा। 2012 छात्रसंघ चुनाव जीतने वाले युवा और संगठन अभी तक विश्विद्यालय प्रशासन मे अपने प्रभाव को लेकर सशंकित है एवं स्वंय अपने अधिकारों से अनभिज्ञ भी हैं, इसलिए इन्हे पग-पग पर उचित मार्ग-दर्शन की आवशयकता है। पटना विश्विघालय छात्र संघ चुनाव में प्रचार के दौरान छात्राओं नें अपने गाल और छाती पर समर्थित उम्मीदारों का टैटू बनवाकर, नि:संदेह, छायाकारों की पहली पसंद बनी रही, पर ऐसे हथकंड़ो से उन्होनें अपनी मानसिक संकीर्णता एवं अपरिपक्वता का परिचय ही दिया है जिससे वे आगे निश्चित ही निराश ही होंगी।


Camera Draped And Snarls On Track


Toying with the tools that costs millions to the public money, the Patna Traffic Police continues to feign both the public and itself as a full calendar year is to complete in a couple of days and the system is not functioning. Back to the memory lane, the city administration installed surveillance camera at 4 major roundabouts in Patna promising to monitor and regulate the traffic. The initiative took space at almost every major dailies(e.g.the telegraph, the next image) and the traffic police got deluge of encomium. They are not just another CCTV camera. They are IP cameras run on Internet Protocol streamlines real time visual data to the control room via high bandwidth internet connection. Actually this is how traffic system gets regulated in cities like Newyork, London, Amsterdom, Tokyo etc.

The height of negligence come to light when the camera at Patna Jn. roundabout continues to draped by a rally poster for 3 weeks and nobody from the administration took care of. When I talked to Senior superintendent of police (SSP) Amrit Raj, he told “We are planning to shift the surveillance base of the CCTV cameras to the new Traffic police station (at Gandhi Maidan).”, though my question was straight about the illegal draping of camera. Anyway it is well known that CCTV cameras were installed at four roundabouts — Station, Exhibition Road, Kotwali and Income Tax — on August 20. But even the SSP claims that these are not being utilised properly. 

The new plan of surveillance not withstanding from day one said officers in traffic police headquarter in Patna.  To begin with, the plan to install the surveillance cameras faced a number of hurdles since it was announced by then SSP Alok Kumar on December 24 last year. Kumar had launched a website and announced that commuters would be able to get regular traffic updates by logging into it.

Initially the project had a three-week deadline but it's about to complete a full calendar year with no frution. Handicapped by technical personnel in force, slower internet connection and paraphernalia of excuties, the administration felt no regret at all. Instead, the perfunctory police system of the state capital blames the Patna Municipal Corporation for getting the poject delayed. A centralised monitoring system was installed at the office of the traffic SP at the headquarters then. But there were not enough staffs to monitor the visuals” 

If bank's ATM, Stock exchange and media houses transfers high density real-time data and visuals using VSAT technology in this very city, using the available infrastructure, isn't it embrassing for the administration to give excuses like slower internet connection or poor bandwidth for the successful implementation of the project. To say without euphemism, It is just another way of procrastinating.

Traffice SP of capital is in New Delhi right now and about to tour Odisha for learning skills on how to manage traffic. With all due respect we have to say that One can not get a photograph with a draped camera. Does this too need learning. And for such learning roaming around the world on public money - Is this not a sheer wastage of public money?

Ganges Tragedy: The Story Inside Out


The News
At least 18 people were killed and more than a dozen injured in a stampede during Chhath Puja in Patna on Oct,19th,2012.

What Happend
The natural course of river Ganges has shifted and took almost a 90 degree turn heading north leaving spate of land what we called Delta in geography. The Administration put one Pontoon bridge and two makeshift foot-over bridge for devotees to reach this delta as groove of stinky water was passing at place of earlier course of the river.  As the two makeshift bridge made up of bamboo(called "chachri" in local language) erected fugitively at the eleventh-hour, was weak enough to bear the crowd, subsequently collapsed partially one by one on that fateful monday evening, bifurcated the crowd on two-sides. Those who could not reach the "diara" side took a U-turn to reach the next ghat(Adalat) where the strong pontoon bridge helped them cross the stinky water. It was around 6pm of local time(+5:30 GMT) and the pontoon bridge got the crowd of another two partially collapsed "chachri" bridges. 
It was not the strength of the pontoon bridge to blame but it was the dangerously steep approach link path upto this bridge that invited the tragedy. The end of the pontoon bridge was too high compelled to got a steep merger touching the ground at city end. After the Arghya (offering holy water and milk to the Goddess Sun by standing in the waist-deep water in the river) most of the devotees were returning with the large basket("daura" in local language) over their head. The outnumbered devotees began to jostle in the steep alley as there were no one to regulate the crowd. Amid this kerfuffle, some youths attempted to cross-over through the rooftop of nearby illegal jhuggis(illegal huts on pavements). The asbestos roof failed to bear the load and collapsed with a bang leading to commotion in the crowd. Moreover as the power supply in the area was given using generators, it got tripped as the wire also got damaged. As the power supply went off the chaos went uncontrolled and stampede occured. Rest is the headline story.

Screams And Commotion Follows
People rushed to state's largest hospital Patna Medical College and Hospital, PMCH(that shares the same boundry wall where the stampede took place) within minutes and the entire hospital premises turns into a place full of screams and sore. The pepetual inflow of severely injured children made the scene intolerable. But the worst was waiting ahead as there were only one doctor with no staves in the hospital emergency.  Moreover that only doctor dodge witnessing the enormity of the tragedy as attendent went panic. As people gathered around comes to know the absence of doctors and the negligence therein they lost temperament, went violent, attacked the policemen stranded there. The emotional outburst turrned violent and the crowd pummelled the police gypsy and passing vehicles on the arterial road called Ashok Rajpath, pelted stones and vandalished the vehicles parked inside the hospital premises. Before administration could react, dozens of vehicles along with three police gypsy vandalished right in front of the local Pirbahore police station. It is relevant to know that the two ghats Mahendru and Adalatganj, the Pirbahore police station and the hospital(PMCH) happens in a row within a range of 500 meters.

Administration: Before and After
The largest hospital of Bihar or the epitome of healthcare in a changed Bihar fails drastically in such critical moment left an indelible stain on the white gowns. All those brought to this hospitals had to approach to the nearby private hospitals. A large size defunct white ambulance of the hospital remained there failed to play any role. The ambulance running on PPP mode under call up 108 reached the scene within time but few in numbers. By then the city SP Jayant Raj appeared on the scene and by his orders all private ambulance were put into service. While State's top officials were busy making sure that treatment be given at the PMCH itself to rein in the death toll, reserve forces were brought in and curfew like situation were witnessed to control the public wrath.

Political Realms Reacts
The approaching alley to the banks of river Ganges proved to be death trap as more than half of the width of the road is encroached, accepted the Deputy Chief Minister of the State. Mr. Modi accepted this bottleneck as prima-facie to be blamed for the tragedy. An inquiry at Chief Secretary level has been ordered by the Chief Minister and report is supposed to made public in 5 days. A compensation payment of Rupees 2 lakh (0.2 million) given to the family of each deceased. The main opposition party RJD demanded a CBI enquiry and the compensation to be increase to the tune of Rupees 25 lakh(2.5 million). Another leader Ramvilas Paswan demanded the CM to accept the responsibility for the tragedy and his urgent resignation.

Reason: The V-Factor 
Technically the huge encroachment by the side of the link road to the river banks, are to be blamed as the main reason for the tragedy. Due to this the 100 meter(approx) long connecting path to ghats proves impassable for a huge crowd of 50000 to 70000 people twice within a limited timeframe of 3-4 hours. Moreover, the steep approach at both ends(from the place where stampede occured) presented great challeges for devotees to walk over with overhead loads. It is relevant to know that the stampede occured at this very lowest area and more than a dozen children dead at this very spot.

Chhath: The Apex of Sanctity
Chhath is the most revered and the biggest festival of Bihar and neighbouring areas.Unlikely to other festivals, it is not just an opportunity for celebration, it is beyond that. Chhath Puja is a mark of tradition, culture and rituals significantly underscores the importance of cleanliness and self-discipline. It defines the way of living. It's shows the widest horizon of Hiduism that believes in humanity and nature above all. Enriched by the vibrance of every religion, even some muslims took part while some keep fast and follow the set rituals too. During the four day long fest even the Crime rate drops surprisingly in the state as even criminals got reverence for this festival of festivals and reluctant to do a bad job during the puja week. It is a community festival that makes conglomoration of devotees at the public place like banks of rivers and ponds.

Politics Topples Priorities Back Home For Nitish

Owing to the almost 90 degree diversion in the natural direction of flow in the water of Ganga, this year here in Patna the Chhath devotees may face great hurdles as there would be limited ghats. All and sundry after Collectariate ghat towards West one may be surprised to witness that the holy water is nowhere to the stretch of 2 kms. There is almost 90 degree north turn in the natural direction of Ganga at Collectoriate ghat. Children can be seen playing and slum being surfaced at the once river bed e.g. Baans ghat and Pehelwan ghat.

Knowingly, out of 52 Ganga ghats that comes between Digha and Deedarganj almost 35 of them have no water at all. Giving the faith attached to the rituals of giving Arghhya() at a particular ghat, most of the devotees are likely to surpass the stretch of dry land on foot and do their prayer at the place comes most perpendicular to the original one. This also going to pose great challenge for the administration to provide security and basic arrangements for these devotees.

Amid all this, this austere festival of Chhath could not attract the attention of our secular Chief minister who gives more priorities to a goodwill tour to Pakistan, right after a hectic "adhikar rally" episode. He could not even continues the old rituals of inspecting ghats before Chhath puja, that used to be a warning for the civic authorities which helps the work get done. The carelessness of the municipality is obvious as most of the ghats are full of filth and garbage till Monday as the Vratis(who keeps fast) will begin reaching ghats from Saturday. Yesteryears, Nitish used to perpetually monitoring the ghats personally by boats and in 2009 he directed the officials to take help of Google Earth for locating the unsafe ghats in 2009. He then scolded the lethargic officers and also directed to make all necessary arrangements for the the safety and security of Chhath puja devotees. The bihari must be missing that fervour of the CM on the eve of this Mahaparva(the greatest festival) of Bihar.

Meaning Of Swelling Crowd In Bihar Politics

Sunday to Friday, this week, the historical Gandhi Maidan at Patna witnessed two mammoth rallies in a row both created history in terms of head count. Though the Nitish's Adhikar Rally got his power backup, but the crowd can not be enforced in such big fashion. The denigrating commentary follows the Rally got flaked by intellectuals and media, blamed for misuse of government machinaries. "Parivartan Rally" or "Rally for a change" has been organised by CPI(ML) in Gandhi Maidan on Friday. AISA and other supporter group helps it. Top comrades from the "Red Flag Party" along with party Gen Sec. Dipankar Bhatacharya were on the dais. JNU Student Union Gen Secretary Shakil Anjum who hails from Araria in Bihar addressed in a quite balanced tone blaming both the Laloo and its successor Nitish to hoax the people of Bihar. He appealed the students community to get together and come ahead on the political dais to change the system.

On october 9 that happens to be a weekday (unlike that of adhikar rally on sunday) hundreds of thousands of supporters were sneaked in the Gandhi Maidan since early on morning at their own pace and by 2pm in the noon, there were not enough space to foot-in the Gandhi Maidan. An amazing participation of rural women coming along with children from Araria, Buxar, Kaimur, Katihar, Ara, Sasaram etc. made the rally a successful one. Even the media which was not giving the CPI significance earlier, shocked to witnessed the crowd. May it not be an earmark for losers and the winners in elections but as in democracy, "throng of people" better called as "Crowd" is the minimum baseline that is required to generate the critical vote-share. No party has won without people on the streets. Elections are won on the ground and hence you need people on the ground.

Supporters and workers of incumbent JDU in Bihar, must have shocked who pat their shoulders themselves for congregating a handsome crowd for Adhikar Rally on Nov. 4th. Though it is not needed to be a matter of statistics to say that JDU rally last Sunday surpassed all records in terms of head count, but as money, muscles and machinary were shoved in to brought the crowd it remains not a big thing to script.

Waves and swings that psephologists predict are extensions of these crowds; one may be wrong in judging the invisible waves when the baselines are so close, but one never goes wrong in not sensing a wave when there are no people on the streets. Laloo worked on it and a experienced one. Now the Comrades proven themselves. The CPI(ML) rally significantly underscores the silent bubbling erupting out of a failing administrative steam in Bihar. It is remarkable here that the CPI(ML) rally were non-de-script in the media and not even a dozen hoardings were witnessed in the state capital contrary to the Nitish rally which smogged the city altogether. This is a bell definately not a jingle one for man in power in Bihar.

Truth Of Thick Crowd At Adhikar Rally

सूत्रो के अनुसार अधिकार रैली में जुटी भीड़ को लाने में जदयू विधायकों ने अहम भुमिका निभाई। आईये चलें खगडिया जिला जहां नीतीश का प्रखर विरोध दिखा था और जहां से करीब 20 हजार लोगों ने रैली में शिरकत की। खगडिया के चुकटी (NH-31) मे 2 एकड़ प्लौट पर बना संभावी सदन की अपनी ही दास्तान हैं। नीतिश कुमार की जद(यू) के वर्तमान विधायक पूनम देवी एवं उनके पति एवं पुर्व विधायक रणवीर यादव का यह मकान खगडिया के लोगों के लिए खौफ का पर्याय ही है। वर्तमान विधायक श्रीमती पूनम देवी तो एक मुख्तारी(proxy) विधायक भर हैं, जबकि सारे अधिकार उनके पति और पूर्व विधायक रणवीर यादव ही इस्तेमाल करते हैं।

कौन है ऱणवीर यादव
पार्टी और पाले बदलने मे माहिर यह महत्वकांक्षी नेता पिछले महीने(सितंबर 2012) तब सुर्खियों में आया जब इसने नीतिश कुमार के अधिकार यात्रा के दौरान खगडिया में हुए व्यापक विरोध को दबाने के लिए दिन-दहाड़े कार्बाइन चलाया। बाद में मीडीया के दबाव से मामले ने तूल तो पकड़ा परंतु सुशासन बाबू के वरद्हस्त के कारण FIR तक दर्ज नहीं हो सका। पत्रकारों और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार बर्ष 1985 में लक्ष्मीपुरृ-तौफीर में वहां कम-से-कम 100 लोगों की हत्या हुई थी और वह घटना सप्ताहों तक अखबारो की सुर्खियाँ बना रहा। हालांकि सरकारी आंकडो में सिर्फ 9 की पुष्टि हुई। इस मामले मे रणवीर यादव को मुख्य आरोपी बनाया गया था।
परंतु भय और आतंक से गवाहों के न्यायालय तक नही पहुंच पाने के कारण न्यायालय ने उन्हे बरी कर दिया। जदयू विधायक पूनम देवी के इस बाहुबली पति पर अभी भी 20 ऐसे केस लंबित हैं जिसमें हत्या और अपहरण के ही दर्जन से ज्यादा मामले हैं। राजनैतिक सफर, महत्वकांक्षा और शतरंजी आखेट में माहिर आपराधिक पृष्ठभूमि वाला यह नेता बिहार के सभी राजनैतिक दल LJP, CPM, और RJD में बराबर की पैठ रखता है और बदलते समीकरण के साथ पाला भी बदल लेता है। रणवीर यादव के खिलाफ अपने भतीजे, भरत यादव की हत्या का मामला भी अभी निचली अदालत में चल ही रहा है कि इसी बर्ष दूसरे भतीजे की हत्या के प्रयास(u/s IPC 307) में एक और केस दर्ज कराया गया है। According to National Election Watch (NEW), an organisation of NGOs, the ruling JD(U) has the most number of candidates charged with serious offences. "Most of these charges against the women are filed because of the criminal background of their husbands and their supporters," says Anjesh Kumar, state coordinator,NEW.

अधिकार रैली में भूमिका
नीतिश के रैली में जहाँ 50 करोड़ से ज्यादा खर्च होने की बात दबी जुबान से स्वीकार की जा रही हैं वहीं भीड़ जुटाने में सफल रहे आयोजकों के उन तरीकों पर भी सवाल उठने लगे हैं, जिसके जरिये दूर-दराज से लोगों को भॆड़-बकडियों की तरह ट्रक, बस और ट्रेनों मे भर कर लाया गया। कुछ उद्दमी पत्रकारों ने यह दिखलाकर(विसुअल फुटेज के साथ) सनसनी फैला दी की ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं था कि वह पटना क्यों आये हैं। अभी आने वाले दिनों में अभी कई सवाल और उठेंगें भले ही रैली की सफलता की गूंज में उन्हें कम ही जगह मिले, परंतु सवाल तो उठेंगे। क्योंकि बाहुबलियों के दम पर चलनेवाली सुशासन सरकार की आपराधिक पृष्ठभूमि वाले विधायक नीतिश के साथ-साथ पोस्टरो से लेकर रैली के मंच तक नजर आये। ये वही नीतिश है जिनके पोस्टर पर नरेन्द्र मोदी को दिखलाये जाने के कारण घंटे भर के अंदर इतनी तेज प्रशासनिक कार्यवाई हूई कि पोस्टर बनाने वाली एजेंसी का तंबू ही पटना से उखाड़ दिया गया, और पुलिस प्रताड़ना तो मिली ही।

Seven Crore Extortion Demanded For Nitish Rally

ऐसा प्रतीत होता है बिहार को विशेष राज्य दिलाने की नीतिशिया मुहिम बिहार की आम जनता पर ही भारी पड़ने लगी है। मुजफ्फरपुर के पाटलिपुत्र इंजीनियरिंग कालेज(निजी कालेज) के प्रबंध निदेशक संतलाल यादव से अधिकार रैली को फंडिंग करने के लिए 7 करोड़ की रंगदारी माँगी गई है और पैसे की सप्लाई नहीं होने पर जान से मारने की धमकी दी गई। आरोप यह है कि 26 अक्टूबर को मुजफ्फरपुर स्थित शहीद खुदीराम बोस जेल मे सजायाफ्ता पूर्व विधायक मुन्ना शुक्ला ने जेल से ही फोन कर संतलाल से 7 करोड़ की रंगदारी माँगी। पुन: 27 अक्टूबर को 08-42 बजे सुबह एवं 10-28 बजे सुबह अलग-अलग नंबरो से फोन की गई और गंदी गालियों के साथ जान मारने की धमकी दी गई।
इलेक्ट्रानिक मीड़िया में खबर को प्राथमिकता से दिखाये जाने के बाद सत्तारूढ़ दल हरकत में आया आनन-फानन में प्राथमिकी दर्ज करायी गयी हालांकि मिठनपुरा पुलिस स्टेशन में दर्ज प्राथमिकी में रंगदारी की राशि को 2 करोड़ ही बताया गया हैं। तत्पश्चात् पूर्व की भांति ही नीतिश कुमार का रटा-रटाया बयान आया कि "आरोपों की जांच होगी और कानून अपना काम करेगा"। स्वाभाविक रूप से जद(यू) के तमाम नेता बिना किसी जांच के ही आरोपों को निराधार बताने लगे। यह निश्चित रूप से राष्ट्रीय स्तर पर एक पखवाड़े पूर्व हुए राबर्ट वाड्रा प्रकरण का पुनर्मंचन जैसा प्रतीत हुआ जब सभी कांग्रेसी नेता आरोप लगने के घंटे के भीतर ही आरोपों को निराधार बताने लगे।मीडिया के बढ़ते दबाब मे मुन्ना शुक्ला कि पत्नी एवं वर्तमान जद(यू)विधायक अंजु शुक्ला ने भी स्वीकार किया है कि पैसे की माँग की गई थी लेकिन तर्क यह कि वह आपसी लेन-देन का मामला है और उधार न चुकाने की मंशा से कालेज के निदेशक संतलाल ने व्यक्तिगत लेन-देन के मामले को रंगदारी की शक्ल दे दिया।
कौन है मुन्ना शुक्ला
गंभीर आरोपों से घिरे मुन्ना शुक्ला उर्फ विजय शुक्ला सिर्फ एक पूर्व विधायक ही नहीं है, य़ह एक ऐसा नाम है जिसकी धौंस मोटे तौर पर संपूर्ण उत्तरी बिहार पर है और राज्य की सत्ता किसी के पाले में हौ इनकी राबिनहुड वाली छवि का असर अछुण्ण रहता है। नीतिश के प्रथम सत्ता काल मे मुन्ना शुक्ला सत्तारूढ़ दल के विधायक थे हालांकि उनपर हत्या जैसे गंभीर आरोपों का मुकदमा चल रहा था। कालांतर में न्यायालय से सजा होने के कारण उन्हें पद त्याग करना पड़ा परंतु सुशासन बाबू का प्रेम इन दबंग आपराधिक व्यक्तियों के लिए बढ़ता ही रहा और 2010 विधानसभा चुनाव में नीतिश ने उनकी पत्नी अंजु शुक्ला को पार्टी टिकट दिया और नीतिश लहर की वजह से वह चुनाव जीत गयीं। यहां यह जानना जरूरी है कि वर्तमान में यह दबंग नेता एक पूर्व मंत्री बृज बिहारी प्रसाद(लालू सरकार में कैबिनेट मंत्री)की हत्या(13 जून 1998) के आरोप मे ताउम्र कैद की सजा काट रहा है। इसके आलावा मुन्ना शुक्ला पर गोपालगंज के तत्कालीन जिलाधिकारी की हत्या का भी आरोप है। ज्ञातत्व है कि राजद शासन के दौरान में मुजफ्फरपुर में भीड़ ने गोपालगंज के तत्कालीन जिलाधिकारी की हत्या दिनदहाड़े उनके कार से खींच कर कर दी थी, और मुन्ना शुक्ला और कुछ अन्य दबंग नेता उस भीड़ की अगुआई कर रहे थे। 
अधिकार रैली की सार्थकता पर सवाल
अधिकार रैली को जनता का समर्थन तो नहीं ही मिल रहा है प्रदेश में इसके पक्ष में हो रहे सत्ताधारी दल के प्रयासों को धन, समय एवं उर्जा की बरबादी बताया जा रहा है। राजधानी की तमाम होर्डिंग पर जबरन कब्जा कर लिया गया है और बड़ी संख्या में अस्थायी पोस्टर एवं बैनर से डिवाइडर एवं दीवार पाट दिये गये हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से लगातार दबी दबाई खबरें लीक कर आ रहीं हैं कि अधिकार रैली के लिए पैसों की वसूली की जा रही है। ट्रेवेल ऐजेंसी और निजी बस चलाने वाले कई लोग कैमरे के पीछे नाम न बताने की शर्तो पर इस बात को कूबूल करते हैं। पटना विशविधालय के राजनीतिशास्त्र के पूर्व व्याख्याता प्रो. जे. के. शर्मा बड़े ही बेहतरीन उदाहरण से इस रैली की सार्थकता पर प्रश्न ख़डा करते हैं। "अगर आप को वेतन नहीं मिले (या और कोई मांग है) तो आप अपनी मांगों के समर्थन में घर के अंदर प्रदर्शन करेंगे या संबंधित अथारिटी के दरवाजे पर? विशेष राज्य की मांग के लिए इस रैली का आयोजन पटना में करने का कोई अर्थ ही नहीं है- आप दिल्ली जाइये, अनशन किजिये, रैली कीजिये। परन्तु, पटना में इस भारी भरकम रैली का कोई औचित्च ही नहीं है।"
सरकार में दबंग नेताओं की बडी संख्या
चार नवंबर को पटना में होने वाले अधिकार रैली में बड़ी संख्या में भीड़ जुटाने के लिए पूरा सरकारी तंत्र कहीं खामोशी से तो कहीं खुलकर सामने आ चुका है। मोकामा के जद(यू) विधायक एवं दबंग नेता(जिनकी अपराघिक पृष्ठभूमि से बिहार का बच्चा-बच्चा वाकिफ हैं) की बड़ी-बड़ी हौर्डिग पटना की सभी सड़को पर लगाये गए हैं। और चूंकि विधायक जी भी बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने के नीतीशिया मुहिम में जोरदार समर्थन दिखा रहें है उनके लिए सभी हौर्डिग उपलब्ध हैं। पटना जंक्शन पर दो विज्ञापन होर्ड़िंग को सिर्फ इसलिए फाड़ दिया(तस्वीरों में स्पष्ट) गया क्योंकि संबंघित कंपनी इस सरकारी जुबानी हुक्म को मानने के लिए तैयार नहीं हुई। वर्तमान दौर मे किसी भी राज्य या केंद्र मे सत्ता पर बने रहने के लिए के लिए समझौते करना लाजमी है पर उसकी सीमा सत्ता के सारथी को पता होनी चाहिए। और नीतिश कुमार को याद रखनी चाहिए कि अपराधिक सांठगांठ को भंगुर करने की अपेक्षा से ही जनता ने उन्हें पुन: राज्य की सत्ता सौंपी है।
अपराध को मिटाने के वादे के साथ 2005 में सत्तासीन हुई जदयू के विधायक विजय कुमार शुक्ला को भी हत्या के इसी केस में कारावास हुई थी। इसी केस मे अन्य सजायाफ्ता शशि कुमार राय भी जद(यू) के विधायक ही थे। सारी हकीकत जानते हुए भी नीतिश ने ऐसे लोगों को सरकार में शामिल किया। बात दिगर है कि अगर एक दूसरे दबंग अपराधी मोहम्मद शहाबुद्दीन(लालू के सहयोगी) को दिल्ली के तिहाड़ जेल में भेजा जा सकता है तो हत्या के आरोप मे उम्रकैद काट रहे मुन्ना शुक्ला को उनके गृह जिला के जेल मे क्यों रखा जाता है? क्या सिर्फ इसलिए कि वह सत्तारूढ. दल का सहयोगी है? बहुत आसानी से कल्पना कि जा सकती है कि ऐसा दबंग नेता अपने गृह जिला के जेल में कैसी सजा काट रहा होगा।  

Developing Bihar:A Reality Check

जहाँ बिहार के विकास की चर्चा हर ओर हो रही थी वहीं नीतिश कुमार के अधिकार यात्रा के दौरान हुए विरोध के व्यापक सिलसिले ने उस बिखरते हुए आभामंडल को सामने ला खड़ा किया। हालांकि इसपर पक्ष और विपक्ष के अपने तर्क हैं परंतु नीतिश पर मीडीया को ब्लैकआउट करने के आरोपों को निराधार नहीं कहा जा सकता।उन समाचारों और तस्वीरों को जगह नहीं मिल रही है जो सरकार को सच्चाई दिखाने की हिम्मत करतें हैं। खैर जमीनी हकीकत से रूबरू कराने का एक प्रयास है यह तस्वीर। निशचित तौर से मेरी ली हुई दूसरी तस्वीर नहीं छापी जाएगी।

नीचे की तस्वीर में उसी नवनिर्मित थाना के सामने की हैं(तस्वीर से स्पष्ट है), जहां 70 प्रतिशत सड़क अतिक्रमण का शिकार है। सैंकड़ो सड़ती गाडियों के बीच (पुराने कबाड़ कार मे आराम करता सूअर)एक विकसित राज्य की राजधानी की कुव्यवस्था को प्रतिबिंबित कर रहा है। और जिला प्रशासन की अकर्मणयता का आलम यह है कि उद्घाट्न के दिन भी हालात जस के तस रहे। सुशासन बाबू आये..उद्घाट्न किया..फोटो खिंचाई और चल दिये। अब मुख्यमंत्री को कुछ दिखता ही नहीं है और मीडिया अगर दिखाने की हिम्मत करे तो ब्लैकआउट की धमकी। पत्रकार अपनी नौकरी बचाये या भूखे रह कर प्रशासन से पंगा ले??

काला बाल पर बैन न लगा दें नीतिश...


पटना 8 अक्टूबर। आज बिहार के मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार अपनी अधिकार यात्रा लेकर जुमई जिले में थे। अधिकार यात्रा के पहले चरण में बेगूसराय, खग़डिया और लगभग प्रत्येक जिले में मुख्यमंत्री का पुरजोर विरोध हुआ- मंच पर अंडे चले और मुख्यमंत्री को जूते चप्पल दिखाये गए। काले झंडे दिखानेवालों ने तो उनके कारकेकड को भी नहीं बख्शा। अब तो लाल कपड़ा और सांढ़ के संबध को काला कपड़ा और नीतीश के समानांतर बताया जा रहा है। विरोध प्रदर्शनों से विचलित मुख्यमंत्री की ओर से समूचे बिहार प्रशासन को एक तुगलकी फरमान जारी हुआ है।


उनकी सभा में काला झंड़ा, काला कपड़ा, काला टी-शर्ट, काली साड़ी पहन कर आने की अनुमति नहीं है, और ऐसे लोगों पर धारा 107 लगाकर जेल भेजा जा रहा है। हद तो तब हो गई जब काला छाता लिए कुछ लोगों को आज(सोमवार) को कार्यक्रम क्षेत्र से 2 किलोमीटर पहले ही रोक दिया गया। हालांकि प्रशासन इस बात से लगातार इंकार कर रहा है।


जुमई प्रशासन की तरफ से मुख्यमंत्री के लिए अभूतपुर्व सुरक्षा के इंतजाम किये गयो थे। अब गया जिले की बारी है और यहां के विधायक को सोमवार की सुबह से नजरबंद कर दिया गया है। कारण, यह है कि विधायक जी शिक्षक संघ के अगुआ हैं, और आज के लोकतांत्रिक बिहार में आप विरोध करने की अनुमति किसी को नहीं है। गया कि जिलाधिकारी वंदना प्रेयसी इस मुद्दे पर मीडिया से कतराती रहीं। अब यदि आपको बिहार में रहना है तो आपको सुशाशन सरकार का तुगलकी फरमान तो मानना होगा वरना आप तय मानिये की आप जेल भेजे जाएंगे। विरोध और अनुरोध को लोकतांत्रिक दायरे मे रखने कि नसीहत देने वाले सुशासन बाबू कहीं जल्द ही काला बाल वाले को भी जेल भेजने का आदेश न दे दें। फिर तो बिहार मे सात सालों के विकास का सफर भूरा बाल से लेकर काले के बीच ही रह जायेगा।

India's Security Challenged By Social Media

पिछले एक महीने से भारत की एक बड़ी आबादी एक घिनौनी साजिश का शिकार हूई है। इससे सिर्फ आसाम ही नहीं बल्कि संपुर्ण भारत की संप्रभुता खतरे में है। गृह सचिव आर के सिंह का यह बयान कि हम अब जान चुके हैं कि भारत के संप्रभुता को इस तरह भी चुनौती दी जा सकती है, काफी हैरान कर देने वाला है और भारत के खुफिया तंत्र की विफलता को दर्शाता है। सवाल बिलकूल स्पष्ट है कि अगर पाकिस्तान की जमीं पर इतनी बड़ी साजिश रची जा रही थी तो हमारी आईबी क्य़ा कर रही थी। उदय भास्कर जो कि भारत के सुरक्षा मामलों के जानकार हैं कहते हैं कि पाकिस्तान में रची गयी यह साजिश एक बड़ी योजना का हिस्सा थी अन्यथा अफवाह के SMS उन मोबाईल नंबरों पर ही कैसे अग्रसारित किये गए जो कि आसाम और उत्तर-पूर्व के लोगों के थे। इसका अर्थ है कि भारतीय दूरसंचार कंपनियों के डाटा को गोपनीय तरीके से चुराया गया है। वैसे हमारे देश मे ऐसे देशभक्तों की भी कोई कमी नहीं है जो बहूत कम कीमत पर इस तरह के डाटा किसी को भी सौंपने को तैयार हैं।

भारत के गृह मंत्रालय ने 19 अगस्त को बताया कि सोशल मिडिया, इंटरनेट और वेबसाईटों के द्वारा 13 जुलाई(एक महीने से अधिक समय) से साजिश की जा रही थी। इसके बाद सरकार की ओर से य़ह खबर आय़ी की 100 से ज्यादा वेव साईट्स और वेवपेजस् पर रोक लगा दी गई है। 16 अगस्त से केंद्र सरकार ने एसएमएस और एमएमएस सर्विस पर भी शिकंजा कसा और 24 घंटो में 5 से ज्यादा एसएमएस भेजने पर प्रतिबंध लगा दिय़ा। सूचना प्रौधौगिकी की मदद से पता चला कि 150 से ज्यादा वेबसाइटों पर ऐसी भ्रामक तस्वीरों और खबरों को सबसे पहले पाकिस्तान से अपलोड किया गया था जिसके बाद(20 अगस्त तक) कुल 245 वेबसाइटों का एक्सेस भारत से रोक दिया गया। हमेशा की तरह भारत ने पाकिस्तान पर आरोप लगाया और हमेशा की ही तरह पाकिस्तान ने आरोपों से इंकार किया और भारत से पुख्ता सबूतों की मांग की है। वैसे भारत के आरोपों की पुष्टि उस वक्त हो गई जब 21 अगस्त को फेसबुक और ट्वीटर के सर्वर मैनेजमेंट टीम ने इस बात पर मुहर लगा दी कि वैसे तमाम अफवाही फोटोग्राफ और भड़काउ समाचार सामाग्री पाकिस्तान से ही अपलोड किये गए थे।

एक ग्राउँड रिपोर्ट के अनुसार आसाम के चिरांग प्रांत के भवानीपुर गाँव जहाँ मुसलिम बड़ी संख्या में रहते थे आज बिलकुल सुनसान पडा है। वर्तमान में इस पूरे गाँव की आबादी शरणार्थी कैंपों में रह रही है एक अनिशिचत भविष्य की ओर देख रही है। कौन बोड़ो है और कौन मुसलिम(बांग्लादेशी) य़ह सवाल आज पूरे भारत के लिए एक ज्वलंत मुद्दा बनकर रह गय़ा है। उत्तर-पूर्व में प्रतिशोध की चली लहर से आसाम से सर्वाधिक प्रभावित चार जिले कोकाराझार, उदालगूडी, बकसा और चिरांग में दबी आग और बुझी राख से ज्यादा कुछ भी नजर नहीं आता है। 2 बांग्लादेशी(अवैध मुस्लिम शरणार्थी) की हत्या के बदले 4 बोड़ो आदिवासियों(आसाम मूल के भारतीय नागरिक) की हत्या हूई और इसके बाद प्रतिशोध की आग इतनी अधिक गति से ब़ढी की तीन दिनों के अंदर चार जिले बुरी तरह हिंसा की चपेट में आ गये। बोड़ो टेरीटोरियल ओटोनोमस बाडी जो कि बोडो लोगों की आवाज है, दंगे का कारण बोड़ो बनाम गैर-बो़डो मानने से साफ इंकार करती है। बोड़ो नेताओं का कहना है कि यह लड़ाई वास्तव में बांग्लादेश से आये गैर-भारतीय मुसलमानों की वजह से है। इनामुल हक जो कि असम गण परिषद् के स्थानीय नेता है, मुस्लिम बनाम गैर-मुस्लिम की लड़ाई और तत्पश्चात् फैले दंगो को तत्काल नियंत्रण करने की वकालत तो करते है परंतु बोड़ो लोगों को उनके ही प्रांत में अल्पसंख्यक बनाने की साजिश जैसे किसी भी चीज से इंकार करते हैं।

समस्या की जड़ तक पहुँचने का माकूल वक्त अभी नहीं है परंतु 130 किमी लंबे सीमा से हमारी संप्रभुता को जो खतरा है उसपर एक सरसरी निगाह तो ड़ालनी ही होगी। भारत-बांग्लादेश सीमा पर बहने वाली तोरशा नदी बांग्लादेश से भारत में आती है और इस नदी के तट पर सुरक्षा के कोई पुख्ता प्रबंध तो छोडि़ए, बीएसएफ का एक जवान तक नहीं है। भारत-बांग्लादेश सीमा पर तारबंदी का कोई मकसद ही नहीं है जब तोरशा नदी पर बने पुल के नीचे से लगातार दिन के समय में घुसपैठ होती रहती है। हमारी सरकार कि सीमा सुरक्षा के प्रति संवेदनहीनता इस बात से स्पष्ट है कि रात्रि गश्ती के लिए 1 साल पहले 130 किमी. लंबी पुरी फेनसिंग के साथ ही पोल और लाईटिंग की व्यवस्था की गई थी लेकिन आज तक उसमें बिजली नहीं दौडाई गई। इस कारण आज भी सीमा सुरक्षा बल के जवान अंधेरे में रात्रि-गश्ती करने को मजबूर हैं। हालांकि दिल में सुलगती अंगारों की खबरों के बीच उम्मीद के कुछ दिये भी जल रहे हैं। एक इलेक्ट्रानिक टीवी चैनल पर विजुअल के साथ आयी यह खबर काफी सुकून देने वाली रही कि दंगों के दौरान आसाम के चिरांग जिले के भवानीपुर गाँव के मस्जिद को नहीं जलाया गया जबकि उसके पास के ही भवन राख में तबदील हो चुके है। इससे स्पष्ट है कि आसाम के लोग या बोड़ो मुसलमान विरोधी नहीं बल्कि बांग्लादेशी घुसपैठ के विरोधी हैं। अब चँकि लगभग सभी बांग्लादेशी घुसपैठिय मुसलमान ही हैं इसलिए इस पूरे बोड़ो बनाम बांग्लादेशी आक्रोश को मुसलमान और आसाम मूल के बीच दंगा बताकर देश भर के मुसलमानों को आसामियों के विरूद्ध भड़काया जा रहा है।

मलेशिया के भुकंप पीड़ित लोगों के पलायन के फोटोग्राफ (चुँकि आसाम के लोगों और मलेशिया के लोगों का चेहरा मंगोल प्रभावित फलत: एक जैसा दिखता है) को सोशल वेबसाइटों पर अपलोड किया गया और अफवाह फैलायी गयी कि यह भारत के विभिन्न जगहों कि तस्वीरें है जहां से उत्तर-पुर्व मुल के लोग हिंसा से प्रभावित होकर अपने प्रांत लौट रहे हैं। चूँकि तस्वीरों पर इंसान स्वतः विश्वास कर लेता है, फलतः इसका व्यापक असर हूआ और बैंगलोर, मुँबई और अन्य प्रांतो से पलायन शुरू हो गया। अब सोशल मिडिया का काम पूरा हो चुका था और वास्तविक पलायन की वास्तविक तस्वीरें भारत के सभी छोटे-बड़े चैनलों और अखबारों में आने लगी जिसे देखकर उत्तर-पुर्व के लोग घबरा गए और अपने घर लौटने लगे। अचानक हुए इस भीड़ को मैनेज करने के लिए रेलवे को विशेष रेलगाडि़याँ चलानी पड़ी। खैर गृह मंत्रालय के स्पष्टीकरण और वास्तविक हिंसा न होने की खबरों ने सूकून दिया और धीरे-धीरे अफवाहों का प्रभाव कम हुआ परंतु इस घटना ने हमारी खुफिया तंत्र कि कमजोरी को बखूबी शर्मिंदा किया है।

बिहार में जंगलराजः महिला आयोग

शुक्रवार को पटना के राजनीतिक गलियारे में उस समय भूचाल आ गया जब महिला आयोग की सदस्य चारू खन्ना अपने बिहार दौरे के दौरान राज्य सरकार को जंगलराज की संज्ञा दी। आयोग सदस्य चारू ने सूबे में पिछले कुछ समय में महिलाओं के विरूद्द अपराधो में वृद्धि को बेहद शर्मनाक और राज्य सरकार पर धब्बा बताया। चारू खन्ना ने आगे कहा कि बिहार में महिलाएँ महफूज नहीं हैं क्योंकि अपराध पश्चात् अनुसंधान की जगह पुलिस पदाधिकारी द्वारा कारवाई के नाम पर मात्र खानापूर्ति की जा रही है। महिला आयोग की सदस्य चारू खन्ना उस समय बिफर गईं जब महिला आयोग की सदस्य चारू खन्ना के सामने प्रदेश से 9 लड़कियाँ मिलने आयी और उनसे सीधे मुलाकात कर प्रशासन पर उन्हें प्रताड़ित कर केश वापस लेने का दबाव बनाने का आरोप लगाय़ा। इसके बाद उन्होनें कहा कि बिहार में जंगलराज है। इसके बाद उन्होंने महिला थाने का भी दौरा किया।
बिहार के महिला थाने का उद्धघाट्न 24 जनवरी 2012 को भरपूर मिडिया कवरेज के बीच मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने नालंदा में किया था। लेकिन 6 महीने बीतने के बाद इस थाने में अभी तक सिर्फ 5 मामले दर्ज हूए हैं। जबकि बिहार के सभी जिलों से महिलाओं के विरूद्द हूए अपराधों को इस थाने में स्थांतरित कर तुरंत कार्यवाही करना ही इसका उद्देश्य था। लेकिन सरकार और प्रशासनिक स्तर पर लापरवाही का आलम यह है कि 6 महीनें बाद भी राज्य के इस पहले महिला थाने को स्थायी थानाध्यक्ष तक नहीं मिल पाया है। ASI अंजू कुमारी ही अब तक प्रभार देख रहीं है। जबकि सरकार ने हर जिला में एक महिला थाना खोलने की धोषणा की थी और इसके लिए 643 पदों का सृजन करने की बात की गई थी और 25.44 करोड़ रूपये का बज़ट सरकार ने पास किया था। महिला आयोग सदस्य के आरोप के बारे में प्रतिक्रिया पूछने पर जदयू नेता ने कहा कि महिला आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उनका आचरण मर्यादित और राजनीति से परे होना चाहिए।

Patna Drowned In Two Hour Rain

Patna, the capital city of Bihar, that dare to invite world's investers under the "susasan" of Nitish Kumar gets washed away in a two hour rainfall that took place on tuesday morning. The two hour spell was well enough to embrass the Government, Urban development Ministry and the administration that has spends crores of rupees during the last couple of years under the NDA government on the name of making better drainage. City dwellers would not yet forget the promises of CM Nitish Kumar, who committed to change the scene and demanded a year of time in september 2006. Thanks to 2009,2010 and 2011 when there were no proper rain in the state and government pat their shoulder to solve the menace.

The whole government machinary working throughout night to suck out the water from Gandhi Maidan. Getting affraid of photo shoot of flood like scene in Gandhi Maidan, which were prepared for the Independence day parade the administration did not allow photographers and media persons to enter into the Gandhi Maidan on 14th. Still we have some images of 14th and 15th august which may help Nitish to cross-verify his efforts. Except some island like Bailey Road, Boring Road, Fraser Road and Anne Marg most of the roads were drowned. Even colonies connected to these area could not remain without water logging. The new drainage system has proved totally useless and completely fails to drain out the water.

भारत में हैं 2 करोड़ अवैध बांगलादेशी


आसाम में जारी जातीय हिंसा के बारे में विभिन्न प्रकार के वक्तव्य, अफवाह और मनगढंत कारण गिनाये जाने लगे हैं। स्थानीय संगठित दल बोडो उग्रवादियों और स्थानीय मुसलमानों के बीच अंतर्विरोध को जारी हिंसक वारदातों का प्रमुख कारण बताया जाना जमीनी हकीकत से बिलकुल भिन्न है। आसाम के जमीनी सामाजिक कार्यकर्ता बताते हैं कि दशकों से बंगलादेश से लगातार आ रहे अवैध घुसपैठ का नतीजा है कि आज आसाम के वास्तविक नागरिको पर अपने ही प्रांत में अल्पसंख्यक होने का खतरा मंडरा रहा है, और इसी दबाब से निकलने की कोशिस ही वर्तमान में जारी हिंसा का कारण है।


भारत की आजादी के बाद से ही पाकिस्तान आसाम को पूर्वी पाकिस्तान (आज का बंगलादेश) में शामिल करने की मंशा जताता रहा है। 1971 में बाग्लादेश की आजादी के बाद से भारतीय क्षेत्र (खासकर आसाम और अन्य उत्तर-पूर्वी भारतीय राज्यों) में बंगलादेशी नागरिकों के घुसने और भारतीय मूल में विलय हो जाने की घटना में तीव्र इजाफा हुआ है। बंगलादेश की खराब अर्थव्यवस्था और रोजगार की कमी के कारण गरीबी और भूखमरी वहां का पर्याय बन चुकी है। अच्छी जीवनशैली एवं रोजगार की तलाश में भारतीय सीमा में बंगलादेशी नागरिकों का घुसपैठ एक दिनचर्या बन चुकी है। भारतीय़ राजनैतिकों में इच्छाशक्ति की कमी के कारण चार दशकों से चल रहा यह सिलसिला आज एक सिरदर्द बन चुका है। एक अर्धसरकारी आंकड़े के अनुसार आज देशभर में 2 करोड. से ज्यादा अवैध बंगलादेशीयों ने शरण ले रखी है जिसका कोई लेखा-जोखा हमारे देश के सुरक्षा तंत्र को नहीं है। दिल्ली जैसे शहरों में लगातार बढ. रही झुग्गी-झोपडी में रहनेवाले अधिकतर लोग बांगलादेश से भागे-भगाये हुए हैं जिनकी कोई पहचान नहीं है। भारतीय सेना और भारतीय तिब्बत पुलिस बल खुद स्वीकार करती है कि बंगलादेश से लगने वाली 267 किलोमीटर लंबी सीमा-रेखा में छिद्र है और वहाँ से घुसपैठ होती रही है फिर हमारे राजनैतिक आका किस आधार पर आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था का दंभ भरते हैं। य़ह निशिचत ही हैरान कर देने वाली स्थिति है।


भारतीय मुसलमानों को बाकी मुसलमानों के बराबर नहीं देखा जाना चाहिए। भारत के मुसलमान सिर्फ अपनी कौम की वजह से नही ब्लकि अपनी नागरिकता के कारण भारतीय है। लेकिन कोई भी मुसलमान जो घुसपैठ कर भारत में बस जाने की इच्छा रखता हो वह भारतीय़ नहीं है। ऐसे मुसलमान भारतीय मूल के मुसलमानों के हक तो छीनते हीं हैं वे पूरी कौम को बदनाम भी करते है। ऐसे अवैध बंगलादेशी भारत में रोजगार पा जाते हैं और हमारी अपनी मुसलिम जनसंख्या ठगी रह जाती है।


हिंसा से सर्वाधिक प्रभावित कोकराझार महाविद्यालय परिसर में लगाए गए राहत शिविर के दौरे के बाद कोकराझार में मेरी बात भारतीय मूल के कुछ पुराने वाशिंदो से हुई जिनके खुलासे हैरान कर देने वाले हैं। इनके अनुसार राजनीतिक दलों के नेता इन अवैध घुसपैठियों को वोटर लिस्ट मे नाम और भारतीय वोटर आई-कार्ड जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज दिलवाने में मदद करते है। और इस मदद के बदले वे चुनावों में इन बंगलादेशी घुसपैठिये या अवैध रूप से बने भारतीय नागरिकों से अपने पक्ष में मतदान करवाते हैं। य़ह भी एक कारण है कि भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में मतदान का आँकड़ा सर्वाधिक है। जहाँ चुनाव आयोग और सरकार इसे स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आमजन का विशवास बताती है हकीकत में वे आमजन भारतीय हैं ही नहीं।


बोडो संगठन के स्थानीय नेता(नाम नहीं छापने की शर्त पर) बताया कि केंद्र की नीतियां सिर्फ सत्ता में बने रहने के लिए है। और यही कारण है कि आसाम में सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ है। 126 सीटों के विधानसभा में कांग्रेस ने अपनी इन्हीं नीतीयों के दम पर आजादी से लगातार 1985 तक शासन किय़ा, जिसमें सिर्फ दो बर्षों के लिए सत्ता 1978-79 में उससे दूर रही और वर्तमान सत्ताधारी कांग्रेस के मुख्यमंत्री तरूण गोगई ने रिकार्ड तीसरी बार राज्य की सत्ता संभाली है। सेवानिवृत लेफटिनेंट जेनरल एस.के.सिन्हा जिन्होंने आसाम क्षेत्र में बर्षों तक आर्मी की सेवा कि और तत्पश्चात् आसाम के राज्यपाल भी रहे – के अनुसार, आसाम की स्थिति अत्यंत विस्फोटक है और यह स्थिति कोई नई नहीं है। सिन्हा ने राज्यपाल रहते हुए 1998 में केन्द्र को इस बारे में गंभीरता से आगाह किया था और बांगलादेशी घुसपैठ को रोकने के लिए उचित पहल पर शीघ्रता से कारवाही का आग्रह किया था।


भ्रष्टाचार में डूबी हमारी व्यवस्था में कुछ सौ रुपये खर्च कर ये बंगलादेशी घुसपैठिये भारतीय वोटर आई कार्ड, पैन कार्ड, बीपीएल कार्ड बनवाकर भारतीय पहचान पा जाते हैं और तमाम सरकारी योजनाओं मसलन इंदिरा आवास, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थय मिशन और मनरेगा जैसी योजनाओं तक का लाभ पाते रहतें है। 1998 में केंद्र को भेजे गए इस रिपोर्ट में उन्होनें 1947 में पाकिस्तान के उन प्रयासों का जिक्र भी किया था जिसमें आसाम को पूर्वी पाकिस्तान में समाहित करने का षड्यंत्र शामिल था। इतिहासकार जानते हैं कि क्षेत्रीय़ नेताओं के विरोध के कारण ही आसाम भारत में रह सका अन्यथा जुल्फिकार अली भुटटो ने आसाम को काश्मीर जैसा ही एक विवादास्पद मुद्दा बनाने में कोई कसर नहीं छोडी थी।


अपने रिपोर्ट में सिन्हा ने बताया कि किस प्रकार बंगलादेशी आंदोलन के प्रखर नेता शेख मुजीर्बुरहमान, जिन्हें भारत ने 1971 में बांगलादेश को आजाद कराने में भरपूर मदद की, ने आसाम को बांगलादेश का हिस्सा बताने में तनिक भी शर्म नहीं की। प्रकृति प्रदत्त स्त्रोतों से भरपूर आसाम को देखकर सभी उसका दोहन करना चाहते हैं, परंतु हमारे राजनेताओं की ओछी मानसिकता के कारण हमने उसे पड़ोसी मुल्कों का चारागाह बना दिया है। श्री सिन्हा के साहसिक एवं दूरगामी प्रयासों का फल उन्हे तुरंत ही मिला। कांग्रेस और सीपीआई के स्थानीय और राष्द्रीय स्तर के नेताओं ने सांप्रदायिक उन्माद फैलाने के प्रयास करने जैसे गंभीर आरोप श्री सिन्हा पर लगाये गए। कांग्रेस के 22 सांसदों ने राष्ट्रपति से श्री सिन्हा (तत्कालीन राज्यपाल) को आसाम से वापस बुलाने की मांग की। अब ऐसी परिस्थिति में केन्द्र और आसाम में सत्ताच्युत्त कांग्रेस से सवाल-जबाव का अर्थ ही बेमानी है।

वेतन में फर्क ही बना मारूति के मानेसर प्लांट में हिंसा की वजह

The article originally appeared on NewsPlus hindi monthly in Aug,2012
मानेसर में 18 जुलाई को हुए हिंसक झड़प के दौरान मारूति कंपनी के मानव संसाधन प्रबंधक अवनीश कुमार देव की पिटाई और हत्या तथा 80 से अधिक कर्मचारियों का घायल होना अत्यंत ही शर्मनाक एवं निदनीय धटना है। धटना के बाद विभिन्न कर्मचारी संघटन एवं राजनीतिक दल घटना के पीछे अपने-अपने तर्क दे रहे है।
जमीनी हकीकत
मैगसैसे पुरस्कार सम्मानित संदीप पांडेय ने मारूति प्लांट के बारे में जमीनी तहकीकात की और कहा कि यदि कोई संस्था या फैक्ट्री प्रबंधन के लोगों की वेतन वृद्दि कर रही हैं तो निशिचत तौर पर उसे चाहिए कि निचले स्तर पर काम कर रहे कर्मचारियो(स्थायी या अस्थायी) की भी वेतन वृद्दि करनी चाहिए, अन्यथा उस संस्थान में कर्मचारियों के बीच द्वेष बढेगा एवं उनके बीच गरीबी-अमीरी का मसला गहराता चला जाऐगा। यह स्थिति किसी भी परिस्थिति में बेहतर रिजल्ट नहीं देगी और एक दिन समस्या विकराल हो जाएगी जैसा अभी मानेंसर में हुआ। पाठकों को याद होगा कि तीन साल पहले इसी हरियाणा के गुड़गाँव में हीरो होंड़ा के प्लांट में कर्मचारियों, प्रबंधन और पुलिस के बीच व्यापक स्तर पर हिंसक झड़प हुई थी जिसकी लाईव तस्वीरें सारी दुनियाँ ने देखी थी।

व्यापक स्तर के किसी भी प्लांट या संस्थान का एकमात्र उद्देश्य लाभ कमाना ही नहीं होता। जिस जमीन, पानी, पर्यावरण और समाज के बीच वह संस्थान चलती है उसके प्रति भी जिम्मेदारी होती है। स्थानीय स्तर के लोगों के बीच स्थायी-अस्थायी स्तर पर नौकरियाँ देकर कंपनीया अपने दायित्व का निर्वाह करती है। पर सही भावना के अभाव में उन कर्मचारियों से भेदभाव करने की घटनायें प्रकाश में आती रहती हैं। मानेसर की घटना प्रबंधन की इसी भेदभाव पूर्ण नीति के कारण हुई है।
मारुति कंपनी के स्थायी कर्मचारियों का वेतन अस्थायी कर्मचारियों से दुगूना है। जबकि दोनों प्रकार के कर्मचारियों के कार्य या कार्यावधि में कोई अंतर नहीं है। कंपनी के आंतरिक स्त्रोत के अनुसार पिछले 1 बर्ष के दौरान अस्थायी कर्मचारियों ने अनेकों बार प्रबंधन का ध्यान इस ओर दिलाया और वेतन वृद्धि के लिए तीन बार अल्पकालिक सार्वजनिक अवकाश पर भी गए परंतु प्रबंधन इन मांगो को अनसुना करती रही। मारूति प्लांट में जहाँ स्थायी कर्मचारी 17-18 हजार मासिक पाते हैं वहीं उसी काम को करनेवाले अस्थायी कर्मचारी मात्र 7000 रुपये मासिक पाते है। य़ह कहीं से न्यायोचित्त नहीं है और इसी कारण मानेसर प्लांट में यह दर्दनाक घटना हूई।

कंपनी अस्थायी कर्मचारियों को स्थायी नहीं कर रही है और उन्हें कर्मचारी संगठन बनाने की अनुमति भी नहीं दी जा रही है। ज्ञातत्व है कि गुडगाँव और मानेसर प्लांट के कर्मचारी संगठनों को भी आपसी तालमेल नहीं करने दिया जा रहा है और प्रबंधन ने इस पर सख्ती से रोक लगा रखी है। इसके पीछे कंपनी को डर है कि कर्मचारी संगठन मजबूत होंगे और उनकी मांगे प्रबंधन के लिए अतिरिक्त जिम्मेदारी लाएंगी और कंपनी का आर्थिक बोझ बढेगा। कंपनी प्रबंधन ने गुडगाँव और मानेसर कर्मचारी संगठनों को अन्य किसी भी क्षेत्रीय या राष्ट्रीय स्तर की संगठनों से तालमेल की अनुमति नहीं दी है जो कि संगठन के अधिकारों को हनन है एवं कानूनी तौर से अवैध है।

कंपनी और प्रबंधन की यही कुनीतियां निचले स्तर के अस्थायी कर्मचारियों के बीच मनोविकार पैदा करता आ रहा है एवं अमीर-गरीब के बीच बढ़ती खाई ही इन घटनाओं के लिए जिम्मेदार है एवं सरकार और प्रबंधन की असामाजिक नीति के कारण ही ऐसी घटनाएँ बढ रही हैं। ये नीतियाँ सही मायनों मे निचले स्तर के कामगारों का शोषण कर रही है। सरकार एवं प्रबंधन को अपनी आर्थिक नीतियों की पुर्नसमीक्षा की जरूरत है। किसी भी उद्योग की आमद को उसकी कामगारों की संतुष्टि से अलग कर देखे जाने कि नीति सरासर गलत है।

मारूति प्लांट में हुई हिंसक झड़प के बाद 21 जुलाई को कंपनी ने एक प्रेस कांफ्रेंस आयोजित कर घोषणा कि कंपनी आने वाले छह महीनों में सभी कैसुअल कामगारों को विभिन्न जिम्मेदारीयों से अलग कर देगी और असेंबली लाईन में कोई भी तात्कालिक कर्मचारियों को नहीं रखा जायेगा। जरूरत के अनुसार कंपनी सीधी भरती करेगी एवं इस प्रक्रिया में ठेकेदारों की सेवा नहीं ली जाएगी। नवनियुक्त कर्मचारियो को तात्कालिक तौर पर ही रखा जायेगा परंतु सभी भावी भरतियों में उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी। मारूति के चेयरमैन आर.सी.भार्गव ने कहा कि छुट्टी, बोनस और सभी तकनीकी मुद्दो पर कर्मचारियों और कंपनी के बीच सीधा समझौता होगा।


मारूति सुजुकी कामगार संघ जो कि कंपनी के गुङगांव प्लांट को प्रतिबिंबित करता है ,के महासचिव कुलदीप सिंह जंघु ने घटना की तीखी आलोचना कि है और कहा है कि प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच बढती खाई को यदि समय रहते नहीं पाटा गया तो गुडगाँव के प्रति उद्योगों का आकर्षण खत्म हो जाएगा।
Amit Sinha is a Research Journalist. He is available at f/indianxpress