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बिहार की राजनीति में आतंकवाद मुद्दा क्यों नहीं?

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बीते सप्ताह बिहार में नीतिश सरकार ने अपने 8 साल पूरे किये और अपनी उपलब्धियों का रिपोर्ट कार्ड जारी किया। इसके तीन दिनों बाद बिहार में 15 साल राज कर चुके लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल ने सरकार के खिलाफ अपना रिपोर्ट कार्ड(आरोप-पत्र) जारी किया। उसी दिन बिहार की राजनीति का तीसरा प्रमुख चेहरा रामविलास पासवान ने अपने दल लोक जनशक्ति पार्टी की 13वीं बर्षगांठ मनायी, जिसमें अमूमन हर बिषय पर चर्चा हुई। परंतु इन तीनो दलों के इतने प्रमुख आयोंजनों में हुई चर्चाओं में आतंकवाद का जिक्र तक नही हुआ। 

यहां यह गौर करना होगा कि बिहार में जदयू, राजद, लोजपा और कांग्रेस कि राजनीती पूरे तौर पर बिहार के 11 प्रतिशत मुसलमानों की करवट अपने पक्ष में करने के लिए बेचैन है। बिहार में मुस्लिम तुष्टीकरण की जर्बदस्त होड़ मची है जो सारे तर्कों को पीछे छोड़ रही है। ये दल कभी भी मुस्लिम समाज को आतंकवाद से पृथक नहीं देख पा रहे हैं। इसी कारण आतंक का पनाहगार बन चुके बिहार में आतंकवाद आज भी इन दलों के लिए एक मुद्दा नहीं बन सका है। 

पटना में रैली के दौरान हुए आतंकी हमले और तत्पश्चात राँची से ताबड़तोड़ गिरफ्तारी और गिरफ्तार आतंकियों के कूबुलनामे ने सब कुछ स्पष्ट कर दिया। निःसंदेह बिहार-झारखंड में आतंकवाद की जड़ें गहरी हो चुकी है। इन सब के बावजूद बिहार में आतंकवाद को लेकर राजनीति दलों की चुप्पी खतरनाक है। यह उनकी मानसिक पक्षाघात का नतीजा है या फिर राजनीतिक साजिश? 

NIA और उसकी सफलता के राज
देश में आतंकवादी कारवाईयों को रोकने के उद्देश्य से 2008 में गठित नेशनल इंनवेस्टीगेशन एजेंसी, NIA के पास आज देश के सबसे बेहतरीन आफिसर्स की लाईनअप है। इनके काम करने के तरीके सटीक और रिजल्ट ओरियेंटेड है। विकास वैभव उन चुनिंदा आफिसर्स में से एक है जो आज NIA की सफलता की वजह है। विकास वैभव दरभंगा के एसएसपी भी रह चुके हैं और इन्हें मिथिलांचल क्षेत्र की जमीनी हकीकत बखूबी पता है। अपनी ईमानदारी और बेहतर कार्यकुशलता से इन्होने दरभंगा के आम-अवाम के दिल में अपनी जगह बनायी। इन्हीं कारणों से इन्हें NIA की टीम में रखा गया। मालूम हो की NIA की जिस टीम ने रक्सौल से यासिन भटकल को गिरफ्तार किया उसकी अगुआई विकास वैभव ही कर रहे थे।

इस बर्ष 2013 जनवरी के अंतिम पखवाड़े में NIA के ऐसे ही अधिकारी गुपचुप तरीके से पटना आये और दरभंगा की ओर रूख कर गये। झटपट में हुई उनकी कारवाई की भनक मीडिया और बिहार प्रशासन तक को नहीं लग सकी और आतंकी दानिश की गिरफ्तारी भी कर ली गई। इन्हीं तीव्रतम कारवाईयों कि बदौलत पिछले कुछ वर्षों में बिहार के विभिन्न भागों से दर्जनों दुर्दांत आतंकीयों को दबोचने में NIA को कामयाबी मिली है। इसके पूर्व अंडरवर्ल्ड डान दाउद का करीबी जम्मो खाँ और फर्जुर्रल रहमान की गिरफ्तारी भी बिहार से हो चुकी है। 

बर्ष 2000 में जब बिहार के सीतामढ़ी जिले में पहली बार आतंकियों की गिरफ्तारी हुई तब सभी को हैरानी हुई थी। तब हिजबुल मुजाहिदिन के सदस्य मकबूल और जहीर की गिरफ्तारी से भारतीय खुफिया तंत्र भी सर्तक हुआ था। लेकिन फिर सब कुछ शांत लगने लगा। फिर 2006 से मानो आतंकी कुनबा फिर से सक्रिय हो गया। तब से आज तक बिहार(खासकर मिथिलांचल) से लगातार आतंकियो के जुड़ते तार ने बिहार को आतंकियों का सेफ जोन बना दिया है। कैसे, कब और क्यों यह प्रदेश आतंकियो का ठिकाना बन गया। आईये डालें एक पैनी नजर।

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2006 
• मुंबई में हुए श्रृंखलाबध्द बम विस्फोटों के मामले में 20 जुलाई 2006 को एटीएस की टीम ने मधुबनी जिले के बासोपटटी गांव से मो. कमाल अंसारी को दबोचा। 
2007 
• 12 नवंबर 2007 को मधुबनी के रहने वाले मोहम्मद सबाउद्यीन उर्फ फरहान को जयपुर में हुए विज्ञान सम्मेलन के दौरान रामपुर के सीआरपीएफ कैंप पर गोलीबारी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। 
2008 
• 9 जुलाई 2008 को यूपी एटीएस ने लखनउ से मधुबनी के ही पप्पू खान को गिरफ्तार किया। दिल्ली के सरोजनी नगर इलाके में हुए बम विस्फोट के मामले में खुफिया तंत्र को उसकी तलाश थी। 
• 14 अक्तूबर 2008 को ही यूपी की एटीएस ने मो. खलील को पकड़ा। 
2009 
• 17 अगस्त 2009 को सुरक्षा तंत्र को तब मिली जब लश्करे तोयबा के आतंवादी उमर मरदानी को दिल्ली में ही दबोच लिया गया जो मधुबनी जिले के बासोपटटी का निवासी था। 
2010 
• मधुबनी के गंधवारी गांव से मो. शबाउद्यीन को गिरफ्तार किया गया। उसपर रामपुर सीआरपीएफ कैंप पर गोलीबारी करने के आरोप थे। 
 अलकायदा के मिर्जा खान को पूर्णिया रेलवे स्टेशन पर पकड़ लिया गया। 
2011 
• 17 अगस्त 2011 को हुजी के आतंकवादी रियाजुल को सीमांचल के किशनगंज में दबोचा गया। 
• 24 नवंबर 2011 को इंडियन मुजाहिदीन के आतंकवादी अहमद जलील और मोहम्मद अजमल को गिरफ्तार किया । 
• नवंबर 2011 में ही समस्तीपुर में चेन्नै की स्पेशल सेल पुलिस ने इंडियन मुजाहिदीन के आतंकवादी इरशाद खान को गिरफ्तार किया। 
2012 
• 12 जनवरी 2012 को इसी संगठन के नकवी और नदीम को दरभंगा में दबोचा गया। • 6 मई 2012 को कर्नाटक पुलिस ने आतंकी घटनाओं के आरोप में कफील अख्तर को पकड़ा। 
2013 
• 21 जनवरी को दरभंगा से कुख्यात आतंकी भटकल के सहयोगी दानिश को दबोच लिया गया। दानिश पर मुंबई बम ब्लास्ट के अलावा दो अन्य मामलों की संलिप्तता के आरोप हैं।
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पटना में आतंकी हमले के बाद तो NIA ने जो ताबड़तोड़ गिरफ्तारियाँ की वे सभी सही पायी गयीं। जिनके नाम सामने आये हम सबने उसे जाना। इससे सेक्यूलर राजनीतिज्ञ बेचैन हो उठे। इसी कारण राजनीतज्ञो का एक खास वर्ग NIA को बदनाम करने में लगा हुआ है। इसी कड़ी में गृहमंत्री का आदेश आया था कि "निर्दोष अल्पसंख्यकों को पुलिस गिरफ्तार न करे"। परंतु शिंदे साहब निर्दोष या दोष तो गिरफ्तारी के बाद ही सिद्ध होगा। तब गृहमंत्री के इस आदेश की जबर्दस्त भर्तस्ना हुई थी और इसे सीधे अल्पसंख्यक तुष्टीकरण से जोड़ा गया था। साजिश के तहत अल्पसंख्यकों के मन-मस्तिष्क मे NIA के विरुद्ध मनगढ़ंत तर्क भरे जा रहे है। ये लोग इंडियन मुजाहिद्दीन जैसे खतरनाक आतंकवादी संगठन को भी NIA की परिकल्पना मानते हैं।

नरेन्द्र मोदी की रैली के दौरान हुए आतंकी हमलों के बाद सूबे की सियासी फिजा ने एक बड़ी करवट ली है। बिहार के आम आवाम के दिलो-दिमाग में आतंकवाद का मुद्दा हावी हो चुका है। आम चुनावों की दहलीज पर इतने बड़े करवट की आहट शायद बिहार के राजनीतिज्ञ समझ ही नहीं पा रहे। मेरा व्यक्तिगत आकलन है कि बिहार से जदयू को निराशा मिलनी तय है और इसके लिए नीतिश की नासमझी ही जिम्मेदार होगी। इन राजनीतिज्ञों को अल्पसंख्यक और आतंकवाद का फर्क समझना होगा। मुस्लिम समाज का भी एक बड़ा वर्ग इस तथाकथित सेक्युलर राजनीति से निराश है। इनके अनुसार आरोपियों को अल्पसंख्यक होने का लाभ मिल रहा है और इस कारण अपने ही देश में उनकी छवि खराब हो रही है।

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याद है बिहार की सड़कों पर ईडेन की एसी बसों का रोमांच!

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बर्ष 2011 में धूमधाम से बिहार की सड़कों पर सैकड़ों बसों की फ्लीट लेकर उतरी निजी बस कंपनी ईडेन ट्रांसपोर्ट ने अपनी कई सेवा बंद कर दी है। रिंग रूट बसों के संचालन को लेकर उपजे विवाद में इडेन ने यह कदम उठाया है। कंपनी की अंर्तजिला एसी बस सेवायें कई महीनों से बंद हैं। कंपनी ने राज्य में सड़कों की बुरी हालत को इसके लिए जिम्मेदार बताया। ईडेन कंपनी के सेवा केंद्र के पुनीत शर्मा बताते हैं की ज्यादातर रूटों पर ईडेन ने एसी बस सेवा बंद कर दी है। क्योंकि इन एसी बसों की रोड क्लीयरेंस कम होती है और बिहार में कहीं भी सड़कें ऐसी नहीं हैं कि वे ठीक से चल पायें। आगे वे कहते हैं कि हमारी कई बसों का चैंबर खराब सड़को की वजह से फट चुका है और भारी नुकसान के कारण कई बसें बंद पड़ी है।


ईडेन के एक दूसरे अधिकारी बताते हैं कि हमारी बसों में जबर्दस्ती रंगदार किस्म के लोग घुस जाते हैं और मनचाहे सीट पर बैठते-बिठाते हैं। मना करने पर स्टाफ और ड्राईवर से मार-पीट करते है। और इन सब में अन्य निजी बस संचालक और उनके गुर्गे भी ऐसे गलत लोगों का साथ देते हैं। इस कारण हमने(ईडेन ने) आरक्षण की सुविधा ही खत्म कर दी है। पहले यह सेवा बेबसाईट पर भी उपलब्ध थी। परंतु जो यात्री सुखद यात्रा की आश में दिल्ली, मुंबई सहित देश के बाहर से भी हमारे वेबसाईट पर आरक्षण कराते थे उन्हें यात्रा के दिन निराश होना पड़ता था और हमारी फजीहत हो जाती थी। स्थानीय प्रशासन इसे निजी मामला बताकर कोई मदद नहीं करता। इसकी शिकायत उपर तक की गई परंतु नतीजा शिफर ही रहा। 

सूत्रों के अनुसार पूरी साजिश अन्य प्राईवेट बस मालिकों और BSRTC के अधिकारियों की ओर से की गई है। कम दर पर बेहतर माहौल और सेवा देकर ईडेन चंद महीनों में ही यात्रियों की चहेती बन गई। आरक्षण की सुविधा और वेबसाईट बुकिंग जैसी सुविधा देकर ईडेन ने बिहार में बस सेवा की नई तस्वीर पेश की। चूँकि बिहार में बसों के संचालन में अपराधी और राजनीतिक लोगों की ही पैठ रही है इसी कारण प्रतिद्धंधिता में पिछड़े अन्य बस संचालक मार-पीट पर उतर आये। बस स्टैंड़ो पर भी ईडेन की बसों को स्थानीय गुर्गों द्धारा विभिन्न तरीकों से परेशान किया जाने लगा। कई बार प्रशासन से शिकायत की गई परंतु पुलिस ने निजी स्वार्थवश अपराधी-राजनीतिक पैठ को ही संरक्षण देती है। 


BSRTC का 5 करोड़ ईडेन पर बकाया, तो ईडेन का सरकार पर 8.9 करोड़ बकाया 
बेहतर यात्री सेवा को लेकर बर्ष 2011 में शुरू की गई राज्य सरकार की इस कवायद का सबने स्वागत किया। राज्य सरकार की ओर से BSRTC और ईडेन ट्रांसपोर्ट प्राईवेट लिमिटेड के बीच कई करार हुए। शर्तों के अनुसार बसों का संचालन ईडेन को ही करना था जिसके लिए सरकार उसे सब्सीडी देती और ईडेन बतौर टैक्स सरकार को एक तय मुश्त रकम चुकाती। 

निर्धारित रूट पर लागू अधिकतम किराये को बस में उपलब्ध सीटों की कुल संख्या के 11 प्रतिशत से गुणा करने पर जो संख्या प्राप्त होती है वह अधिभार था। यह वह संख्या थी जो ईडेन टैक्स के रूप में सरकार को चुकाती। परंतु BSRTC के अधिकारियों ने इसमें बसों की फ्रीकवेंसी को भी जोड़ दिया। यह करार के खिलाफ था और कहीं न कहीं ईडेन को परेशान करने की साजिश थी। ईडेन के औनर सह मैनेजिंग डायरेक्टर सच्चिदानंद राय अधिकारियों से लेकर मंत्री तक पूरे मामले को पहुँचाते रहे परंतु नतीजा शिफर। 

दोनो पक्षों के बीच हुए करार के अनुसार बिहार सरकार की संस्था BSRTC हर बस संचालन के लिए ईडेन कंपनी को 7.5 लाख रूपये प्रतिबर्ष देना है। इसी प्रकार अंर्तजिला सर्विस के लिए भी ईडेन को 5 लाख रूपये प्रति बस प्रति बर्ष की दर से बतौर सब्सिडी मिलनी थी। 15 मई 2011 को हुए करार के विपरीत BSRTC ने सब्सीडी देने के वक्त से टाल-मटोल की नीति अपनाई। जबकि ईडेन ने आर्थिक संकट के बाबजूद बसों का परिचालन करने की कोशिस की। मालूम हो की 14 मार्च 2011 को दोनों पक्षों के बीच पटना में स्थानीय रूटों पर 8 एसी बसों समेत कुल 78 बसों के परिचालन का अनुबंध हुआ था। ऐसा ही एक करार जनवरी 2011 में पटना-छपरा रूट पर 40 बसों के परिचालन को लेकर किया गया। 

इस प्रकार 2011 तक ईडेन और सरकार के बीच कई करार हुए, बसें चलनी शुरू हुई, सरकार के मुखिया और अन्य मंत्री बस फ्लीट्स को हरी झंडी दिखाते अखबारों के मुख्य पृष्ठों पर छा गये। परंतु जिस तरह से ईडेन को बिहार में परेशान किया गया है यह बिहार के भावी निवेशकों के लिए शुभ संदेश नही है। हर बर्ष राजधानी के बड़े होटलों में ग्लोबल बिहार समिट, इंवेस्टर्श मीट और चिंतन-मनन पर करोड़ो रुपये लुटाकर अखबारों की सुर्खियाँ तो बटोर ली जाती हैं परंतु इन समस्याओं से मुँह चुराकर "हूजूर" आप बिहार में निवेशक बुला नही रहे ब्लकि बिहार से निवेशक भगा रहे हैं।
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अतुलनीय भारत ! Incredible India !!!

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जिस प्रकार से देश के सर्वोच्च संस्थानों और प्रबुद्ध व्यक्तियों पर यौन शोषण के आरोप लग रहे हैं वह चिंताजनक है। हर घटना को संबंधित सभी आयामों पर परखना होगा और उसी के अनुरूप निर्णय देना होगा। अन्यथा नारी सुरक्षा कानूनों के परिदृश्य में एक ऐसी अराजक स्थिति पैदा हो रही है जहाँ आधी दुनिया, बाकी आधे को हाशिये पर ढकेलती नजर आ रही है। तहलका के संस्थापक संपादक तरूण तेजपाल और उस महिला पत्रकार के बीच जो कुछ हुआ है उस के अनेक आयाम हैं। 

कार्यालयों में प्रेम-प्रसंग का मामला जब शादी में तब्दील होता है तो समाज उसका स्वागत करता है। यह एक आयाम है। प्रेम-प्रसंग का वही मामला जब विवाह में तब्दील नहीं हो पाता तो महिला का एक सिर्फ एक ट्वीट पूरे मामले को यौन-शोषण का बना डालता है। यह उसी पहलू का दूसरा आयाम है।

कार्यालयों में प्रेम-प्रसंग और आकर्षण के मामले अक्सर सुनने को मिलते हैं। ऐसे प्रसंगों में नैतिकता और सीमाएँ किस हद तक बचती हैं या तोड़ी जाती है इसका कोई साक्ष्य नहीं होता। लेकिन इसमें महिला और पुरूष दोनों की बिलकुल बराबर की सहभागिता होती है इसमें कोई शक नहीं है। हर मामले में परिस्थिति एक हो यह जरूरी नहीं। विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण और यौनाकर्षण प्रकृति के सिद्धांत है। इस आकर्षण के पीछे उम्र, मैरीटल स्टेटस, सामाजिक कद और योग्यता सब कुछ बौना सिद्द होता है। 
मर्दों के सेक्सुअल एडवांसमेंट, वासनायुक्त नजरों और हरकतों को एक महिला से बेहतर कोई नही समझ सकता। कार्यालयों और परिचितों के दायरें में देखें तो महिलाओं के साथ यौन-शोषण तो छोडिए कोई उसपर तीरछी निगाह भी नहीं डाल सकता, यदि उनका खुद की नजर और नजरिया स्पष्ट हो। फिर क्या कारण है आधुनिक भारत की तेज तर्रार काबिल महिलाएँ जो ज्युडीसियरी से लेकर पत्रकारिता तक जुड़ी हैं ऐसे मामलों में उस वक्त तक इंतजार करती है, जब तक उनके प्रकरण सीसीटीवी फुटेज और गोपनीय कैमरों में कैद नहीं हो जाते। जबकि चाय की प्याली बढ़ाते हुए उन हाथों को पहली बार में वहीं रोका जाना चाहिए यदि बौस की उँगलियो की थिरकन आपको असहज करती हैं।


नैतिकता की जिस मंडी में उपर से नीचे तक सब तेजी से छीज रहा हो, सड़ गया हो वहां सिर्फ एक पक्ष को कठघरे में खड़ा करना अपराध होगा। इस तरह समाज में आराजकता फैल जायेगी। स्वार्थी महिलायें इसे व्यक्तिगत हथकंड़ो की तरह इस्तेमाल करेंगी। आज कानून की धारा 498A का महिलाओं ने जिस तरह दुरूपयोग किया है उसपर सरकार और सर्वोच्च न्यायालय तक चिंतित है।

नैतिक अवमूल्यन के इस दौर में सिर्फ मर्दों को कसूरवार मानना सिरे से गलत है। हाँ इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता की शुरूआत पुरूषों की ओर से ही होती है। परंतु यह निश्चित है कि कंप्रमाईज करनेवाले और करवानेवाले दोनो बराबर के दोषी है। कभी कास्टिंग काउच के मामले के मामले सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री तक सीमित थे। आज बेरोजगारी और मजबूरियों के कारण यह हर दूसरे कार्यालयों और अन्य वर्क प्लेस तक फैल चुका है। 
इसलिए जरूरी है कि महिलायें पहले दिन ही जोरदार सार्वजनिक आपति दर्ज करें। पूरे मामले को कांड या प्रकरण बनने ही न दें। इससे कार्यलाय में उनकी व्यक्तिगत छवि और भी मजबूत बनेगी और आसपास कोई दूसरा मर्द उनपर गलत निगाह डालने तक से डरेगा। 

वैसे तहलका मामले की इस पीड़िता ने एक निर्भीक महिला पत्रकार होने का दंभ दिखाया है। इसने पत्रकारों की समाज में तेजी से बनी रही स्टीरियो इमेज को थोड़ा ही सही ध्वस्त करने का काम किया है। उस इमेज को जहाँ यह गारेंटेड माना जाने लगा है कि नौकरी और तरक्की के लिए महिलाँए किसी भी हद तक मैनेज हो जाती है। 

अब असलियत तो जाँच और होटल के विडियो फुटेज से सामने आ ही जायेंगी परंतु अतिसक्रिय मीडिया को थोड़ा धैर्य रखना ही चाहिए। निजी प्रतिद्धंधिता निभाने का यह न तो सही वक्त है और न ही सही प्लेटफार्म। निःसंदेह तरूण तेजपाल ने देश में पत्रकारिता को एक ऐसे उच्च स्तर तक पहुँचाया, जहाँ पहुँचने की कल्पना भी किसी भी दूसरे पत्रकार और मीडिया के लिए चुनौती है। तरूण लाखों युवायों और पत्रकारों के रोल माडल है।

यौन शोषण के आरोप भर से ऐसे रोल माडल को फर्श पर ला खड़ा करना तार्किक नहीं है। डर हम सभी को है कि आदर्शों के ये चंद प्रतिमायें दरक न जायें वर्ना रोल माडल को तरसते इस देश में विश्वास कई आयामों में बिखरेंगे।


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विकास की बहती गंगा और उसपर बनते राजनैतिक सेतू

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पिछले सप्ताह राजधानी के श्रीकृष्ण मेमोरियल सभागार में "इंजीनीयर" होने का घमंड मुख्यमंत्री के दिल से चलकर जुबां तक आ गया। जोश में यह भी कहने से नहीं चूके की राज्य में कभी इतने पुलों का निर्माण हुआ था। मगर इंजीनियर साहब, जब आप 8 बर्षों में गाँधी सेतु की मरम्मत नहीं करा सके तो पुलों का सब्जबाग मत दिखाईये। बिहार पुल निर्माण निगम के दूसरी पंक्ति के अधिकारियों की मानें तो मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के शासन में गैर-जरूरी पुलों की बाढ़ आ चुकी है। ठेकेदारों और आला अधिकारियों ने निजी स्वार्थों के कारण ऐसी-ऐसी जगहों पर पुल बनवा दिये है जिनपर चढ़ना लोगों की मजबूरी बन गई है। और जहाँ मजबूरी थी वहाँ पुल आज भी नदारद। 

परंतु बात जब गाँधी सेतु की मरम्मती की आती है तो सब चुप। और जो बोलते हैं वे केंद्र को कोसते हैं। बात सीधी है। बात राजनीतिक है। बात राज्य सरकार के निजी जिद की है। दरअसल बिहार सरकार गाँधी सेतु को एक राजनैतिक मुद्दे के रूप में बने रहना देना चाहते हैं। पिछले बर्ष तक राष्ट्रीय राजमार्ग की नजरअंदाजी को लेकर केंद्र को कोसते आपके बयान अखबारों की सुर्खियाँ हुआ करते थे। हर दूसरे दिन हर राजनैतिक और गैर-राजनैतिक मंच से इतना दंभ भरा जाता था कि बिहार जैसा अल्पआय वाला राज्य अपने दम पर एनएच की चौड़ाई और निखार बढ़ा लेगा। जिला मुख्यालयों से राजधानी की सड़क दूरी को समय की इकाई में बाँधने वाले "हूजूर" क्या बता पायेंगे कि क्यूँ पूरे पर्व के दौरान 6 घंटो में रेंगते रूकते वाहन गांधी सेतु को भी पार न कर सके।


दीवाली और छठ के दौरान दूर-दूर से अप्रवासी बिहारी अपने घरों को आये थे। उनके पास सीमित समय था। उनके पास पैसा था पर आपने संसाधन नहीं दिया। क्या गुजरात, महाराष्ट्र, चंडीगढ़ जैसे बेहतर सड़क संसाधन वाले राज्यों से बमुश्किल छुट्टी निकालकर, रेलवे के रेलमपेल के बाबजूद पटना पहुँचने पर आपने उन्हें निराश नहीं किया? 

सप्ताहांत तक गाँधी सेतु पर 8-9 घंटे तक भीषण जाम लगता रहा। पुराने फटेहाल बसों में बच्चे दूध तक के लिए तरस गये। 10 रूपये की बोतल पानी 60-70 रूपये में बिकी। बीच पुल पर वाहनों में फँसी महिलाओं के लिए स्थिति शर्मनाक हो गई। 2-3 घंटों के बाद लोग वाहन छोड़ 3-4 किमी. की लंबी दूरी सर पर सामान ढोते देखे गए। 

वाकई यह ऐसा दृश्य था जो उद्देलित करता था कि ऐसी सरकारों पर मुकदमें हो और इन्हें जेल में डाल दिया जाये। रिलायंस, महिन्द्रा और आपके इंवेस्टर्स जब आयें तो आयें - परंतु ये अप्रवासी बिहारी ही हमारे रीयल इंवेस्टर है। आपके शासन ने इन्हें बार-बार निराश किया है और इन्हें खीझ इस बात की "आपने किया क्या"?
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कुछ यूँ बन रहा बिहार, आतंकीयों का पनाहगार


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इंडियन मुजाहिदीन के सरगना यासिन भटकल की गिरफ्तारी के बाद आइएम के दूसरी पंक्ति के आतंकियों ने नया पैंतरा अपनाया है। वे दंगों की विडियो फुटेज और जेहादी पुस्तकों के सहारे बेरोजगार मुस्लिम युवाओं को संगठन में भर्ती कर रहे हैं। इन आतंकियो को नया पैंतरा है कि उतर भारत में चुनावों के पूर्व बड़े पैमाने पर धार्मिक उन्माद फैलाया जाये। 

इसका खुलासा पटना सीरियल ब्लास्ट में पकड़े गए आतंकियों ने किया है। सरकार की खुफिया विभाग के खास अफसरों की मानें तो पटना ब्लास्ट के मुख्य आरोपी इम्तियाज ने पुछताछ में कूबूल किया है कि आईएम से जु़ड़े हैदर ने उसे बर्मा और गुजरात दंगो के विडियो फुटेज दिखाये थे। दरअसल ये विडियो क्लिप असली नहीं थे और इनमें भारत में मुसलमानों पर हो रहे जुल्म को तकनीकी सहारे से फर्जी तरीके से फिल्माया गया था। ऐसे फर्जी विडिया क्लिप दिखाकर मुस्लिम युवाओं के मन-मस्तिष्क में नफरत पैदा किया जा रहा है। ऐसे में बेरोजगारी से जुझ रहे युवा आसानी से चंद पैसों के लालच में आतंक और नफरत के रास्ते पर बढ़ रहे हैं। 

बिहार में सीमांचल के लगभग सभी जिलों में तेजी से पैर पसार रहे इन आतंकी कार्यकलापों पर राज्य सरकार ने आँखें मूँद रखी है। लचर स्थानीय पुलिस प्रशासन और बिहार सरकार के अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की नीतियों के कारण अफसरों पर अत्यधिक दबाब है कि वे ऐसे केसों में स्वंय निर्णय न लें। सता के शीर्ष से निर्धारित होती इस स्तर की दखलंदाजी ने दरभंगा, समस्तीपुर आदि जिलों में पुलिस तंत्र को पंगु बना दिया है। इन सभी बातों को बेबुनियाद आरोप कर किनारा कर देना आसान होगा। परंतु क्या बिहार के "हूजूर" इस बात का जबाब देंगे कि आखिर क्यों दिल्ली में बैठे NIA की टीम ही हर दूसरे महीने सीमांचल से आतंकियों को गिरफ्तार कर पा रही है जबकि बिहार पुलिस को इकलौती कामयाबी भी नहीं मिली है? 

पटना हमले के बाद सख्त पूछताछ में गिरफ्तार आतंकियों ने कूबूल किया है कि भटकल के बाद आईएम की दूसरी पंक्ति के आतंकवादी बिहार की जमीं से ही सारी गतिविधियों को अंजाम दे रहें है। मालूम हो कि हैदर और मोनू मेनन ने इस जिम्मेदारी को लेते ही काफी सक्रिय हो गए थे। जेहादी पुस्तकों की तुलना में विडियो क्लिप के मार्फत् युवकों का ब्रेनवाश करना ज्यादा आसान है। साथ ही जेहादी पुस्तकों के लिए अक्षर ज्ञान होना जरूरी है वहीं विडियो क्लिप से बिलकुल निरक्षर मुस्लिम किशोरों को भी भड़काया जाना आसान है। इसलिए आजकल ऐसे भड़काउ एमएमएस भी इन भटके युवकों के मोबाईलों में मौजूंद है जिसे देखकर भारत के मुस्लिम युवा और किशोर अपने ही देश के प्रति नफरत करने लगे हैं। 

खुफिया विभाग के अफसरों के अनुसार आतंकी कार्रवाई के लिए आईएम तीन स्तरों पर काम करती है। पहले स्तर पर आतंकी घटना के बाद आतंकवादियों को पनाह देने के लिए जगह-जगह पर सेफ जोन बनाए जाते हैं। दूसरे स्तर में घटना के लिए विस्फोटक पहुँचाने वाले आतंकियों की टोली तैयार होती है। तीसरे और अंतिम स्तर पर आतंकी सबसे खतरनाक आतंकीयों की भर्ती कर उन्हे निर्णायक अंजाम के लिए तैयार करते हैं। 

दिल्ली के आंतरिक सुरक्षा विशेषज्ञों की माने तो आतंकी पटना ब्लास्ट के बाद खुफिया और केंद्रीय गृह विभाग की सक्रियता के कारण आगामी लोकसभा चुनावों के पहले की तैयारियों में आतंकियो ने तब्दीली कर ली है। और इस कारण विस्फोट करने में नाकाम होते देखकर आतंकियों का नया पैंतरा है कि उतर भारत में बड़े पैमाने पर धार्मिक उन्माद फैलाया जाये, दंगे भड़काए जायें। 

एक नई बात जो सामने आई है वह यह कि इन घटनाओं में हिंदु युवाओं का नाम भी सामने आया है जो पाकिस्तान में बैठे आकाओं के दिशा-निर्देंश में स्थानीय स्तर पर फंडिंग का काम कर रहे थे। यह दृश्य दुःखद तो है ही साथ ही चेतावनी है कि बेरोजगारी के भीषण संकट से जूझते बिहार को सरकारी रोजगार मेले के ढकोसलों से आगे निकलने की सख्त जरूरत है। अन्यथा हम सभी जानते हैं भूख की दस्तक धर्म और आदर्शों की परवाह नहीं करती।
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Nitish on way to appeasement of all

This article originally appeared at The Patna Daily

Virtue out of necessity 
Fortuitously, as the four-day Chhath festival ended gracefully in a peaceful way, everyone is relaxed now, especially the Bihar government and the state police which were on toe for more than a week's time. On the backdrop of serial bomb blast in Patna it was skeptical for deities and the public in general.
But what is surprising to witness this festive week that very few of us would have noticed is the incarnation of poster boy in Nitish as huge hoardings of him were pasted throughout the arterial roads, roundabouts and the Ganga ghats. 

In these giant posters Nitish Kumar is depicted as praying the God Bhaskar with a dark silhouette of a woman devotee paying aarghya to the God Sun in waist deep water. It was a perfect work that touches the sentiments of aam Biharis. Everyone agrees that Chhath related photographs is a hit. It is nothing but reflexive of a large Hindu sentiment. 

Since Nitish Kumar sworn in as the Chief Minister of Bihar on 24 November 2005, it is his eighth term as CM witnessing the Chhath Puja celebration. And this is the first time our Nitish Kumar appears on such large posters on the eve of a Hindu festival. Is there any political compulsion or this a damage control exercise. 
The poster boy 
It is ubiquitous, that the serial bomb blast in the Modi rally on 27th October in Patna followed by reports of Bihar being soft on terror for minority vote politics has made enough dent to the image of Nitish Kumar. The BJP which buoy to a level best on the Hindu votes cut him short heavily blaming him doing politics of minority appeasement. 
The split with BJP followed by the terror attack on Bodh Gaya and Patna are sure to damage his(Nitish) entire political gimmick beyond revocable. Nitish who bowed to minority vote bank compulsion, went too far on the path of secular politics where it was impossible for him to make a U-turn. This makes him dump a 17 year long partner in BJP. Nitish must have got the idea of the repercussion of this split act before he formally made his way apart. 

Still, post split a wary and worried Nitish whispered at occasions that he never wanted a split, approves his state of mind. But the aftermath of the terror attack in the Modi rally in Patna, unexpectedly helped polarization of Hindus in favor of Modi. The saffron party aptly handles the post blast atmosphere to project the attack as attack on Hindutava and Modi.

This is a sheer poster politics and nothing else. Nitish is on the way to a damage control exercise to get the large Hindu vote bank back. This political compulsion has made Nitish to do work tirelessly ahead of a Hindu festival. Undoubtedly, the wary Nitish made a virtue out of necessity this time.
Amit Sinha is a bilingual writer and research Journalist. He can be contacted at facebook.amit

आतंक का सुशासनी माड्यूल


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Photo Courtesy- India Today
भारतीय राजनीति में नीतिश कुमार ने ही मॉड्यूल की राजनीति की शुरूआत की या कहें उसे सामने लाया। आज बिहार में पथ निर्माण के लिए मौड़्यूल, कृषि के लिए मॉड्यूल और समावेशी विकास के मौड्यूल मौजूद हैं। परंतु अपनी पहली पारी की बेहतरीन शुरूआत करने वाले नीतिश कुमार इन मॉड्यूलस के प्रचार में इतने व्यस्त हुए कि आतंकी मौड्यूल ने उन्हें माइनारिटी का नकाब ओढ़कर कुछ यूँ भ्रमित किया कि उनकी समझ ही बौनी पड़ गयी। उनकी माइनरिटी अपीसमेंट की पालिसी ने नेक मुसलमानों को आतंकियो के समानांतर ला खड़ा किया है।

समस्तीँपुर, दरभंगा मधुबनी समेत कई जिले पूर्णतः आतंकियों के अभ्यारण्य बन चुके हैं। जहां केंद्रीय ऐजेंसियों के सख्त रवैये के कारण दिल्ली में बाटला मॉड्यूल के बाद यूपी के 'आजमगढ़ मॉड्यूल' को ध्वस्त किया जा सका वहीं बिहार में सरकारी संरक्षण के कारण यहाँ 'दरभंगा मॉड्यूल / मधुबनी मॉड्यूल' ने खूब पैर पसारे हैं। आतंकियों को पनाह देने वाले इस कदर बेफिक्र है कि राजधानी पटना के सबसे प्रमुख फ्रेजर रोड में स्थित होटल में ब्लास्ट का ब्लूप्रिंट तैयार किया जाता है, विस्फोटक जमा किये जाते हैं। काबिले गौर है कि इस होटल का मालिक सताधारी जदयू के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ का नेता है और पटना 27 अक्टूबर को हुए आतंकी हमले के तीसरे दिन यह नीतिश कुमार के साथ पार्टी के शिविर में राजगीर में दिखता है।


नरेंद्र मोदी की 27 अक्टूबर की रैली में पटना में हुए आतंकी हमले के बाद नीतिश आतंकवाद की जगह मोदी पर हमले कर रहे हैं। इससे नीतिश की छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। कभी मोदी की इतिहास की जानकारी पर सवाल उठाकर, तो कभी तीसरे मोर्चे के प्रति उनकी छटपटाहट, फिर मोदी पर पलटवार और फिर यह कहना कि किसी का लालकिले का सपना कभी पूरा नहीं होगा। आतंकी हमले के बाद के चार दिन इन मुद्दो पर राज्य के मुख्यमंत्री से ऐसे अप्रासंगिक बयानों की अपेक्षा नहीं थी। जरूरत थी कि मुख्यमंत्री कड़े कदम उठाते। सुऱक्षा खामियों पर मिटिंग और एक्शन लेते। अपने पार्टी के उस नेता को बर्खास्त करते जिसके होटल में विस्फोट की तैयारी की गई थी। पटना सचिवालय के उस अधिकारी को गिरफ्तार करते जिसके घर पर रूक कर आतंकियों ने रेकी की। 

सुरक्षा सलाहकार डी.पी.ओझा की माने तो माइनोरिटी अपीसमेंट(अल्पसंख्यक तुष्टीकरण) की राजनीति ने आज बिहार को आतंकियों का सेफ जोन बना दिया है। दर्जनों ऐसे केस हैं, जिसमें अनुसंधान में बाधा डाली गई, अनुसंधान रोका गया या फिर जाँच पदाधिकारियों को औब्लाइज किया गया। 

राज्य या केंद्र में आंतरिक सह बाह्रय सुरक्षा के सबसे मजबूत तंत्र की बागडोर गृह मंत्रालय की होती है। इस मंत्रालय के पास सबसे संवेदनशील सूचनाएँ और इनपुट्स होती है। आखिर क्या कारण है कि नीतिश कुमार गृह-मंत्रालय पर शुरू से (2005 से) कुंडली मार कर बैठे हैं।  
हर बात को सेक्युलर रंग में रंगते, लोकतंत्र के लिए खतरा बताते नीतिश क्या इस सवाल का जबाब देंगें कि किस कारण वे गृह मंत्रालय किसी के भी हवाले नहीं करना चाहते? इस आचरण से शक की सुई सीधे उनकी तरफ है।

राज्य में आतंकवादी हमले बढ़े हैं, न्यायालयों में कमजोर केस के कारण आतंकियों को सजा नहीं मिल पा रही है। गृह विभाग से रिटायर एक आला-अधिकारी नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं कि गृह-मंत्रालय के पास ऐसे-ऐसे साक्ष्य, दस्तावेज और इंटेलिजेंस इनपुट हैं जो कि नीतिश के सुशासनी मास्काट की धज्जियाँ उड़ा देंगे।

चूँकि भारत एक अत्यंत क्षमाशील देश है इसलिए हम हिंसा का जबाब हिंसा से नहीं देते। हम हिंसा फैलाने वालों को और उनके पैरोकारों को बाहर का रास्ता लोकतांत्रित तरीकों से देते हैं। मुस्लिम समाज का भी एक चिंतक वर्ग इस तरह की वोट वाली धर्मनिरपेक्ष राजनीति को बर्खास्त करता है। आतंकियों को अल्पसंख्यक होने के राजनैतिक फायदे तो निःसंदेह मिल रहा है, परंतु इस नीति ने अल्पसंख्यकों को आतंकवादीयों के समानांतर ही प्रोजेक्ट किया है। इस प्रकार की राजनीति से भारत में और बिहार में मुस्लिम समाज का बुद्धिजीवी वर्ग खफा है। परंतु इस समाज मे इन बुद्दिजीवियों की संख्या इतनी कम है कि उनकी आवाज न तो सता समीकरण को प्रभावित कर पा रही है और न ही सामाजिक कट्टरता को।
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मेरी मजबूरियों को इल्जाम न दो

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मुहब्बत और नफरत के अफसाने

अगर तूमने देखी नहीं है इन आँखो की दहकती गर्मी
तो आकर मेरी जमीं पर इस नफरत का इम्तहान न लो
मेरी मजबूरियों को इल्जाम न दो

इतनी आसानी से नफरत के अफसाने रूकते नहीं
इसलिए इन धमाकों से बताया है तुम्हें
हमारी मोहब्बत का यूँ इम्तहान न लो

मुझपर उनकी रहमत को तुम बर्खास्त न करो
मझे सता से बेदखल कर देंगे, तुम ऐसे दर्खास्त न करो
अब जैसा भी है, उसे तुम बदनाम न करो

सिर्फ एहसास करो, और रूह से महसूस करो
उनके लिए मेरी मुहब्बत या कहूँ मजबूरी
पर तुम यूँ इम्तहान न लो

मेरी मजबूरी को प्यार ही कहने दो, कोई और नाम न दो
उनके लिए मेरी मुहब्बत का तुम यूँ इम्तहान न लो

होठ कहना चाहते तो बहुत कुछ, पर जिगर न हुआ
इसलिए काँपते होठों से कभी मैने तेरा नाम न लिया, बस हर बार इशारा ही किया
मेरी मजबूरियों को इल्जाम ना दो

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