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कार्यालयों में प्रेम-प्रसंग का मामला जब शादी में तब्दील होता है तो समाज उसका स्वागत करता है। यह एक आयाम है। प्रेम-प्रसंग का वही मामला जब विवाह में तब्दील नहीं हो पाता तो महिला का एक सिर्फ एक ट्वीट पूरे मामले को यौन-शोषण का बना डालता है। यह उसी पहलू का दूसरा आयाम है।
कार्यालयों में प्रेम-प्रसंग और आकर्षण के मामले अक्सर सुनने को मिलते हैं। ऐसे प्रसंगों में नैतिकता और सीमाएँ किस हद तक बचती हैं या तोड़ी जाती है इसका कोई साक्ष्य नहीं होता। लेकिन इसमें महिला और पुरूष दोनों की बिलकुल बराबर की सहभागिता होती है इसमें कोई शक नहीं है। हर मामले में परिस्थिति एक हो यह जरूरी नहीं। विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण और यौनाकर्षण प्रकृति के सिद्धांत है। इस आकर्षण के पीछे उम्र, मैरीटल स्टेटस, सामाजिक कद और योग्यता सब कुछ बौना सिद्द होता है।
मर्दों के सेक्सुअल एडवांसमेंट, वासनायुक्त नजरों और हरकतों को एक महिला से बेहतर कोई नही समझ सकता। कार्यालयों और परिचितों के दायरें में देखें तो महिलाओं के साथ यौन-शोषण तो छोडिए कोई उसपर तीरछी निगाह भी नहीं डाल सकता, यदि उनका खुद की नजर और नजरिया स्पष्ट हो। फिर क्या कारण है आधुनिक भारत की तेज तर्रार काबिल महिलाएँ जो ज्युडीसियरी से लेकर पत्रकारिता तक जुड़ी हैं ऐसे मामलों में उस वक्त तक इंतजार करती है, जब तक उनके प्रकरण सीसीटीवी फुटेज और गोपनीय कैमरों में कैद नहीं हो जाते। जबकि चाय की प्याली बढ़ाते हुए उन हाथों को पहली बार में वहीं रोका जाना चाहिए यदि बौस की उँगलियो की थिरकन आपको असहज करती हैं।नैतिक अवमूल्यन के इस दौर में सिर्फ मर्दों को कसूरवार मानना सिरे से गलत है। हाँ इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता की शुरूआत पुरूषों की ओर से ही होती है। परंतु यह निश्चित है कि कंप्रमाईज करनेवाले और करवानेवाले दोनो बराबर के दोषी है। कभी कास्टिंग काउच के मामले के मामले सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री तक सीमित थे। आज बेरोजगारी और मजबूरियों के कारण यह हर दूसरे कार्यालयों और अन्य वर्क प्लेस तक फैल चुका है।
इसलिए जरूरी है कि महिलायें पहले दिन ही जोरदार सार्वजनिक आपति दर्ज करें। पूरे मामले को कांड या प्रकरण बनने ही न दें। इससे कार्यलाय में उनकी व्यक्तिगत छवि और भी मजबूत बनेगी और आसपास कोई दूसरा मर्द उनपर गलत निगाह डालने तक से डरेगा। वैसे तहलका मामले की इस पीड़िता ने एक निर्भीक महिला पत्रकार होने का दंभ दिखाया है। इसने पत्रकारों की समाज में तेजी से बनी रही स्टीरियो इमेज को थोड़ा ही सही ध्वस्त करने का काम किया है। उस इमेज को जहाँ यह गारेंटेड माना जाने लगा है कि नौकरी और तरक्की के लिए महिलाँए किसी भी हद तक मैनेज हो जाती है।
अब असलियत तो जाँच और होटल के विडियो फुटेज से सामने आ ही जायेंगी परंतु अतिसक्रिय मीडिया को थोड़ा धैर्य रखना ही चाहिए। निजी प्रतिद्धंधिता निभाने का यह न तो सही वक्त है और न ही सही प्लेटफार्म। निःसंदेह तरूण तेजपाल ने देश में पत्रकारिता को एक ऐसे उच्च स्तर तक पहुँचाया, जहाँ पहुँचने की कल्पना भी किसी भी दूसरे पत्रकार और मीडिया के लिए चुनौती है। तरूण लाखों युवायों और पत्रकारों के रोल माडल है।
यौन शोषण के आरोप भर से ऐसे रोल माडल को फर्श पर ला खड़ा करना तार्किक नहीं है। डर हम सभी को है कि आदर्शों के ये चंद प्रतिमायें दरक न जायें वर्ना रोल माडल को तरसते इस देश में विश्वास कई आयामों में बिखरेंगे।
Amit Sinha is a bilingual journalist. You can join him on facebook.amit.
