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Delhi: Mall Culture Vs Mind Culture


बीते 16 दिसंबर 2012 की देर शाम दक्षिणी दिल्ली में एक चलती चार्टड बस में सामुहिक बलात्कार की घटना ने एकबारगी पूरे देश को स्तबध कर दिया है। इसी साल जुलाई में हुए गुवाहाटी में लड़की से छेड़खानी प्रकरण ने जो तुल पकड़ा, वह कहीं खो गया था और सनसनी फैलाने की वजह से इलेक्ट्रानिक मीडिया की भूमिका पर सवाल भी उठे थे। चुँकि इस बार की घटना दिल्ली की है फलत: मी़डिया से लेकर नारी संगठनों ने बेहतरीन एवं सराहनीय भूमिका निभाई। इसी का प्रभाव रहा कि 48 घंटे के अंदर इस घटना की गूंज लोकसभा के अंदर भी पुरर्जोर ढंग से सुनी गई। आरोपियों की घर-पकड़ हुई और दिल्ली उच्च न्यायालय ने खुद ही मामले का संज्ञान लिया। शीला दीक्षित की स्थिति शर्मनाक हुई और आनन-फानन में उन्होने कुछ ऐसे बयान भी दिए जो खुद ही इस बात की पुष्टि करते हैं कि अभी तक दिल्ली में सुरक्षा को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के पहले के निर्देशों की अवमानना हो रही है।  ज्ञात्तव है कि 40 मिनट तक दिल्ली की मुख्य सडकों पर दौड़ती इस बस मे काला शीशा और पर्दा चढा होता है जो कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का खुला उल्लंघन है। खैर, तेजी से हुई प्रशासनिक  कार्यवाही का दंभ भरनेवाली दिल्ली पुलिस और सरकार के लिए जो एक बात राहत देने वाली रही कि इस केस में एक भी आरोपी बड़े घराने से ताल्लुक नहीं रखता है वरना अबतक इस सिस्टम को समझ चुकी जनता के गाल पर दुसरा तमाचा भी पड चुका होता और हमारे सामने इस केस की कुछ और ही तस्वीर होती।
जब इंडिया गेट पर 18 और 19 नवंबर को स्वत: जुड़ी भीड़ ने कैंडिल लाईट मार्च निकालकर इस घटना का लेकर अपना जबर्दस्त विरोध प्रकट किया तो सामाजिक जागरुकता को लेकर हर्ष हुआ। अब इसे बेहतर ढंग से एक मुकाम तक पहुंचाने की जरूरत है। देश की सबसे सुरक्षित मानेजाने वाली राष्ट्रीय राजधानी में हुए इस जघन्य अपराध के बाद पूरे देश मे यह बहस चली कि इस मुश्किल दौर मे जबकि नारी के सुरक्षित जीने-चलने के अधिकार पर भी हमले तेज हो चुके है, प्रतिरोध की चेतना का एकजुट होना जरूरी है। हालांकि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अन्ना के आंदोलन के दूसरे अंक के दौरान हिंन्दुस्तान का आम आवाम य़ह महसूस कर चुका है कि प्रतिरोध की भावना सोशल मीडया पर "लाईक", "शेयर", "पोस्ट" और "'ट्वीट" तक ही सीमित न रह जाये। इसके लिए चेतना और एकजुट भावना का संगठित रुप में जमीं पर आना जरूरी है। इतिहास की गहराईयों में न भी जायें हाल के दिनों में मिस्र के तहरीर चौक के "सत्ता परिवर्तन की मांग" से लेकर न्यूयार्क का "आक्यूपाई वाल स्ट्रीट" जैसे आंदोलन कुछ और नहीं बल्कि दुनिया के फलक पर जनसंघर्ष और जनभावना का समग्र ध्रुवीकरण का बेहतरीन नमुना रहा है। कई बार ऐसा हुआ है कि जनांदोलनों ने ही संघर्षों को शुरू किया और मुक्कमल अंजाम तक पहुँचाया है। ऐसा होता रहा हे कि नेताओं से पृथक वृहत्तर एकांकी मुद्दो का संदर्भ लेकर आम अवाम ने ऐसी पटकथा लिख डाली है जिससे तब वे खुद अपरिचित थे। भारत में 1975 के दौर में हुआ जयप्रकाश नारायण के आंदोलन को इतिहासकारों ने इसका बेहतरीन उदाहरण माना है।

औरत के आत्मनिर्णय के अधिकार पर मर्द दबंगई को किनारा दे देने की वर्तमान भारतीय सामाजिक परिस्थिति एक संक्रमण काल से गुजर रही है(हालांकि यह अभी तक महानगरों और कुछ चुनिंदा प्रांतो तक ही सीमित है)। सत्ता की दुकानदारी, राजनैतिक दुर्बलता और कार्यपालिक अकर्मण्यता ने अभी तक हिंदुस्तान में पुरुषों की नारी के प्रति मानसिकता को दशकों पीछे ही ठेल रखा है। शारीरिक तुलना में नैसर्गिक रुप से सबल पौरूष-सौष्ठव अपने पौरूष्तव(या पशुत्व) को तबतक आजमाता रहेगा जब भी एकांतत्व में उसे नारी दिखेगी। अगर हमें इस पौरूष मन-मष्तिष्क को बदलना है तो यह खुलेपन से ही आयेगी। आप नारी को कपड़ों मे लपेटकर पशुओं के बीच उसके स्त्रीत्व कि रक्षा नहीं कर सकते हैं।

इस पुरे प्रकरण पर मशहूर एड-मेकर प्रह्लाद कक्कर का ब्यां स्पष्ट है। उनका कहना है कि आज अगर रात के 8-9 बजे एक अकेली लड़की जिंस या कोई मार्डन कपड़े पहनकर किसी बस या आटो का इंतजार कर रही होती है तो पुलिस वाले और आम अवाम के बीच यही संदेश जाता है कि यह कोई वेश्या है। वे आगे कहते है, कि अब इस मानसिकता से कोई कैसे करेगा मदद- फिर हम पुलिसवाले को ही दोष क्यों दे। और निचले स्तर पर काम करने वाले कांस्टेबल और बीट आफिसर जो सबसे अधिक इन परिस्थितयों से दो-चार होते हैं उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि क्या होती है? क्या खाप-पंचायतो के क्षेत्र में पला-बढा एक युवा अचानक से एक परीक्षा और 2-3 माह की ट्रेनिंग पास कर पुलिस सेवा ज्वाइन करते ही अपनी मानसिकता बदल पायेगा? 

स्पष्ट है कि जब हमारे समाज में स्त्री भ्रूण-हत्या के सर्वाधिक केस बड़े शहरों से आते हैं और भारतीय प्रशासनिक सेवा, वरिष्ठ मेडिकल अफसर और दिल्ली विश्विद्यालय के प्रोफेसर जैसे समाज के सम्मानीय लोग स्त्री भ्रूण-हत्या के दोषी पाये जाते हैं तो हमारा अक्स हमारे सामने है। हमारे समाज में स्त्रीयो को आज भी दोयम दर्जे का ही माना जाता है। कालेज परिसर और शापिंग माल में दिन के उजाले में हॅाट-पैंट कल्चर को अपनाती लड़कियाँ भी जानती है कि वे बस-स्टैंड पर सुरक्षित(उस वेश-भूषा) नहीं है। घनाढ्य घरों की लड़कियां तो व्यक्तिगत वाहनों से आवाजाही कर और अन्य संसाधनों से अपने को एक हद तक सुरक्षित रख कर "प्ले" और "डिस्प्ले" कर लेती हैं, परंतु सामान्य घरों की लड़कियों को अपने इर्द-गिर्द की सामाजिक मानसिकता और वास्तविकता को समझना होगा। 

Changing Perception And Social Media


अमेरिका के डा. किम मेसन, के अनुसार आज 8 बर्ष के बच्चे भी इंटरनेट से जुड़ चुके है और 8-18 बर्ष के बच्चे औसतन 7 घंटे समय आनलाईन मीडिया पर व्यतीत कर रहें है। हैरानी की बात यह है कि इन सात घंटो में वे किसी एक वेबसाईट से जुडे न रहकर विभिन्न पेजों पर विजीट करते रहते हैृ- इस कारण वे कुछ ऐसी वेबसाईट या पेजों के बारे में जान जाते है जो उनके बालमन को कुप्रभावित करती है। भारत में इंटरनेट का उपयोग करने वालों मे सर्वाधिक संख्या य़ुवाओं की है। हालांकि कंप्यूटर, लैपटाप, गेमिंग डिवाईस ने जहां इंटरनेट की पहुंच को सीमाओं मे रखा था टेबलेट और मोबाईल के आने से यह सर्वसुलभ हो गया है। अब तो पटना, मुजफ्फरपुर और मोतीहारी तक मे आपको युवाओं का मोबाइल-इंटरनेट प्रेम राह चलते दिख जायेगा। आये दिन ये प्रचलन सड़क दुर्धटनाओं का कारण भी बन रही हैं।
अमेरिका के "जर्नल आफ द अमेरीकन मे़डिकल ऐसोसिएशन" द्वारा एकत्रित किये गए आंकड़ो के अनुसार फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया को लेकर युवाओं मे नशा जैसा असर है, और उनकी मानसिक अवस्था को लेकर अमेरिकी प्रशासन और अभिभावकों में चिंता है। इसके लिए कई संस्थाओं ने सार्थक पहल भी किए हैं परंतु इंटरनेट के व्यापक रचनात्मक उपयोग को देखते हुए एकमत होना कठिन है।
क्या है साईबरबुलिंग
मोबाईल अथवा इंटरनेट पर उपलब्ध तकनीकों का इस्तेमाल कर के किसी व्यक्ति, ग्रुप या समूह को बदनाम करना, उत्तेजक सामग्री भेजना अथवा अपशब्दों का प्रयोग कर परेशान करना ही साईबरबुलिंग है। आज साईबरबुलिंग को कम ही लोग समझ पा रहे है क्योंकि यह वह अनुभव है जिसे दनिया पहली बार महसूस कर रही है। आप इसे कालेज की रैगिंग कह सकते है परंतु चुंकि इसका दायरा असीमित है इसलिए इसका शिकार कोई भी हो सकता है। उदाहरण के तौर पर लगातार किसी लड़की या महिला को उसके मोबाइल या इ-मेल या फेसबुक अकाउंट पर अशलील कमेंट या तस्वीर भेजना ही साईबरबुलिंग है। चुँकि मोबाईल की तुलना मे इंटरनेट पर पहचान छुपाये रखना आसान है इसलिए गलत किस्म के लोग लगातार काफी दिनों तक जबर्दस्ती किसी से संपर्क बनाये रखते है। अन्य शब्दों मे एकतरफा प्रयास है साईबरबुलिंग। पहचान छुपाये रखकर किसी को लगातार परेशान करते रहना है साईबरबुलिंग।
युवाओं में सर्वाधिक लोकप्रिय है यह तकनीक
गुगल-गुरु जैसे सर्वज्ञानी के सानिध्य मे खुलेपन का यह दौर भारतीय युवाओं में घटती जिम्मेदारी का प्रमुख कारण बनता जा रहा है। एक रिसर्च के मुताबिक मात्र 8 प्रतिशत भारतीय युवा इंटरनेट और गुगल का प्रयोग रचनात्मक कार्यों जैसे प्रोजेक्ट बनाना, लेख-आलेख या किसी कला को सीखने के लिए करते हैं। इस आलेख को सजीव करने के उद्देश्य से हमने पटना विश्विद्यालय का दौरा किया तो नाम न बताने की शर्त पर ज्यादातर युवा छात्रों ने खुलासा किया की वे इंटरनेट का प्रयोग मनोरंजन और पोर्न सामग्री के लिए करते है। 60 प्रतिशत छात्र सिर्फ दोस्तों से जुडे रहने के लिए इन तकनीकों का इस्तेमाल करते है। हालांकि छात्राओं का मत कुछ भिन्न रहा और सिर्फ 35 प्रतिशत ल़डकियों ने कहा कि वे दोस्तों से जुडे रहने के लिए इंटरनेट और फेसबुक का प्रयोग करती है।
क्या-क्या है इंटरनेट पर
आज के दौर मे यह आवशयक है कि अभिभावक भी इस तकनीक को समझें, और इंटरनेट को बेहतर समझने के लिए जरुरी है कि आप पहले कुछ दिनों तक इसे इस्तेमाल करें- ठीक उसी तर्ज पर "पहले इस्तेमाल करें फिर विश्वास करें"। क्या आपका अचार खराब हो जाता है? संजीव कपूर और तरला दलाल की रेसिपी चाहिए? कप़ड़ो पर लगे ग्रीस के दाग छुड़ाना चाहती है। इससे आगे यदि किसी भी तरह की चिकित्सकीय जानकारी चाहिए जैसे एचआईवी और ब्रेस्ट कैंसर से संबंधित बाते पूछने मे हिचकिचाहट होती है तो इंटरनेट पर जुडें। सेक्स समस्या है तो क्या करें? ब्लड प्रेशर, दिल का दौरा जैसे गंभीर परिस्थितयों में क्या हो आपका फर्श्ट रियेक्शन। इंटरनेट पर इन सभी का पलभर में जबाव आप पा सकते है। मुझे आज भी वह दौर याद है जब मेरी माँ पेपर और मैगजीन में छपे "नानी माँ के नुस्खे" या समानांतर टिप्स के कतरन काटकर सुरक्षित रख लेती थी, परंतु अफसोस की ज्यादातर परिस्थितयों में या तो वह कतरन मिलती ही नहीं थी या याद नहीं रहता था कि फलां टापिक पर आपके पास सामग्री मौजूद है।
आज के दौर मे आप इंटरनेट से दुर नहीं रह सकते है। इसकी मदद से घंटो मे होने वाले काम पलक झपकते ही हो जाते हैं। जैसे गैस का नंबर लगाना हो या ट्रेन में टिकट आरक्षण करना हो। बिजली का बिल, फोन या मोबाईल का बिल सहित तमाम यूटीलिटी बिल जमा करने में जहां पहले आपको 3-4 दिन लग जाते थे आज आप 10-15 मिनटों में कर सकते है। अमेरिका, कनाड़ा या आस्ट्रेलिया मे बैठे अपने बच्चों से आप लाईव तस्वीरें के माध्यम से अपने मोबाईल या पीसी पर जुड़ कर बात कर सकते है। अब इन अनगिनत सुविधाओं का लाभ पाने के लिए अगर महीने के दो-तीन सौ रूपये खर्च भी करने पड़े तो डेफ्नेटली नाट ए बैड डील।
बच्चो के लिए क्यों जरूरी है इंटरनेट
आज 8-9 बर्ष के बच्चे भी अभिभावकों से इंटरनेट इनेबल्ड मोबाईल, टेबलेट या पीसी की मांग करने लगे है। ऐसे में यह आवशयक है कि अभिभावक बच्चो की आवश्यकता को समझे। दिल्ली जैसे शहर मे रहनेवाली मेरी बहन अपने बच्चो को इंटरनेट देने के पक्ष मे नहीं थी परंतु जब केंद्रीय विद्यालय मे पढनेवाले उसके 8 बर्षीय बेटे को प्रोजेक्ट और असांइनमेंट पूरा करने में दिक्कत होने लगी तो मैने उसे इंटरनेट और गूगल गूरू (इंटरनेट पर उपलब्ध सर्च इंजन) की मदद लेने का सूझाव दिया। अब चाहे एटलस हो, इंगलिस डिक्सनरी हो या फिर देशों की राजधानी के नाम। प्रधानमंत्री का कार्यकाल या कोई लेख लिखने कि चुनौती 8 बर्षीय मोहित खुद ही सारी सामग्री ढूंढ लेता है और उसके असांइनमेंट समय से पहल पूरे हो जाते है।
अभिभावक हो रहे गुमराह
इंटरनेट पर बातचीत करने के लिए कीबोर्ड की मदद से टेक्सट टाईप करना होता है। चुंकि लोग कम शब्दों या लेटर में अपने को व्यक्त करना चाहते है इसलिए प्राय: शब्दों को संक्षेप मे लिखते और भेजते है, जैसे OK के लिए सिर्फ K और Take Care  के लिए TC. कालांतर मे यह आदत एक भाषा का रुप ले चुकी है जिसे net lingo कहा गय़ा। 1990 के दौर तक ILU शब्द को युवाओं में भरपूर प्रसार मिला हालांकि तब के दौर के अभिभावक इसके पीछे के अर्थ को समझते थे और इसलिए यह प्रेमी युगलों के खतों के अंदर की बात रही। परंतु फेसबुक, ट्वीटर और I-messaging के वर्तमान दौर मे अनगिनत ऐसे आदिवर्णिक(acronym) शब्द हैं जिसे देखकर भी हमें-आपको उसका गूढ जल्दी नहीं समझ आ सकता।

भावी राजनीति की पृष्ठभूमि और छात्र राजनीति


पटना विश्विद्यालय में 28 बर्षों बाद हुए छात्र संगठन चुनाव के शांतिपूर्ण समापन पर सभी ने राहत की सांस ली है। लगभग एक महीने तक युवा उर्जा से लवरेज इस पुरे चुनावी प्रकरण से विश्विधालय के शैक्षणिक आभामंडल पर पड़ने वाले प्रभावो पर कयास चाहे जो भी लगायें जायें एक बात तय है कि इस चुनाव में कोई भी गंभीर और वैचारिक दृढ उम्मीदवार नजर नहीं आया। यहां तक की वाम दलों की राजनीति में भी परिपक्वता का अभाव स्पष्ट दिखा।
लगभग तीन दशकों के बाद हुए इन छात्र संघ चुनाव परिणामों पर किसी गंभीर विश्लेषण की आवशयकता हो न हो, यह कतई महत्वपूर्ण है कि निकट भविष्य में इस चुनाव की सार्थकता पर ही गंभीर प्रश्न खड़ा न होने लगे। चूँकि छात्र संगठन के प्रमुख पदों पर पृथक पार्टियों के समर्थित उम्मीदवारों ने जीत हासिल की है, इसलिए विश्विधालय में उनके एकत्रित प्रयास से ही कोई बदलाव संभव है। वर्तमान राजनीतिक या सामाजिक परिदृश्य में एकता का अभाव सर्वविदित है, फलत: इन छात्र नेताओं के प्रयास संगठित होगें- ऐसी उम्मीद करना बेमानी है। फिर अकेले किसी एक छात्र या संगठन के प्रयास से कोई उल्लेखनीय घनात्मक परिवर्तन होगी- ऐसा एक बर्ष के अल्पकाल में तो संभव नजर नहीं आता है। इसके अलावे एक-दूसरे को नीचा दिखाने कि होड़ मे कहीं छात्र हितों का ही नुकसान नहीं हो जाए- यह भी गौर करने वाली बात है। राज्य के बाहर और दिल्ली विश्विद्यालय तक में ऐसे आचरण वक्त-वक्त पर दिखते रहे हैं।
क्या है "राजनीति" और "राजनेता"
वर्तमान राजनैतिक परिस्थिति में "राजनेता" एक ऐसा इकलौता शब्द बन चुका है जिसे पर्यायवाची के रुप में आप किसी भी ऋणात्मक व्यक्तित्व के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। "दबंग", "बाहुबली", "फरेबी","ठेकेदार", "बेईमान", "भ्रष्ट", "अनैतिक", "ठग" और यहाँ तक की "अपराधी" और "चमचा" भी। एक सफल राजनेता या नेता शब्द से आज एक ऐसे व्यक्ति की छवि ही उभरती है जो शारीरिक रूप से सबल हो, डरावनी शक्ल हो, सफेद वस्त्रधारी हो और जिसके आस-पास हमेशा लठैतों की टोली हो - और हाँ, वह किसी बड़ी गाड़ी पर लाव-लश्कर के साथ ही चलता हो। अधिक गहराई से मनन करें तो इनकी गाड़ी ही ट्रैफिक नियमों को निर्धारित करती होती है, जिसपर काला शीशा चढा हो।
दरअसल, सबसे पहले तो यह समझना जरूरी है कि राजनीति है क्या? आज जब हम राजनीति की बात करते हैं तो जो रूप हमारे सामने आता है वह है भ्रष्टाचार और पतन के दलदल में आकंठ डूबायेनकेन प्रकारेण सत्ता प्राप्ति का जूगाड़ बैठाता एक ऐसा वर्ग जिसके लिए आदर्श केवल किताबी शब्द है और झूठ-फरेब ही आदर्श। लेकिन क्या राजनीति का बस यही अर्थ होता है? नहीं - सत्ता की इस पतित राजनीति के बरक्स एक और राजनीति होती है रचनात्मक परिवर्तन की। अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए संघर्ष ही राजनीति है।इतिहास को छोड़ भी दें तो क्या कुछ समय पहले तक बिहार के युवा, नीतिश कुमार को अपना आदर्श नहीं मानने लगे थे- यह और बात है कि ओछी राजनीतिज्ञों और भ्रष्ट पदाधिकारियों की संगत उनके व्यक्तित्व पर भी हावी हूई और आज उनपर लगने वाले आरोप कमोबेश सही भी साबित हो रहे है। बिहार के राजनैतिक शीर्ष पर पिछले 22 बर्षो से काबिज लालू और नीतीश छात्र राजनीति की ही उपज हैं।
क्यों हो छात्र राजनीति?
प्राय: हर प्रजातांत्रिक राष्ट्र कि यह विडम्बना रही है कि लोग राजनीति और राजनीतज्ञों को बुरा मानते है। अभी हाल के हुए अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव भी इससे फितर नहीं है। भारतीय राजनीतिक पृष्ठभूमि पर गौर करें तो पायेंगे कि देश की स्वतंत्रता के ओजपूर्ण निर्णायक संघर्षपूर्ण संग्राम में भी अनेकानेक भारतीय परिवारों ने अपनी युवा पी़ढी को इससे पृथक रखने की कोशिश की है। राजनीति से एक सुरक्षित दूरी बनाये रखने मानसिकता ने हमेशा से अभिभावकों को अपने बच्चों को राजनीति मे आने से रोका है। बुद्धिजीवी वर्ग का एक बड़ा घटक यह मानता है कि छात्र जीवन सिर्फ और सिर्फ अध्धयन के लिए है और राजनीति एवं राष्ट्र निर्माण जैसी बातें महाविद्यालय या विश्वविद्यालय प्रांगण के बाहर ही होनी चाहिए।
भारतीय युवाओं की क्रांतिकारी चेतना के प्रतीक शहीद भगत सिंह ने विद्यार्थी और राजनीतिनामक लेख लिखकर भारतीय मानसपटल पर फैले इन विचारों का बेहतरीन प्रतिकार किया था। उनका लेख जहां युवाओं को झकझोर देने में सफल रहा, वहीं अभिभावकों में उसका प्रभाव सीमित ही रहा। इस मुद्दे पर पृथक विचार हो सकते हैं परंतु इस संदर्भ में यह जान लेना आवश्यक है कि जिन राष्ट्रों की बुनियाद में युवा उर्जा या आक्रोश नहीं है वे शिथिल राष्ट्र हैं और अंतराष्ट्रीय परिदृश्य पर उनकी कोई पहचान नहीं है।  ऐसा इसलिए है कि लोकतांत्रिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए संघर्ष ही राजनीतिहै, और संघर्ष से ही पहचान बनती है।
इस संदर्भ में एक और बात जान लेनी बेहद जरूरी है कि कि छात्रसंघ और छात्र राजनीति का अधिकार हमें किसी खैरात में नहीं मिला है। इसे हमारे पूर्ववर्ती पीढ़ियों ने लम्बे संघर्ष के बाद अपने खून-पसीने की कीमत पर हासिल किया है। कालांतर में भले ही मुख्यधारा के राजनीतिक दलों ने इस संघर्ष की राजनीतिको स्वार्थ के ट्रेनिंग सेंटरमें बदल दिया हो लेकिन अपने मौलिक रूप में यह विरोध और प्रखरता की राजनीति है जिसमें एक छात्र आरंभ से ही अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिये संघर्ष करना सीखता है। किताबों के साथ यह भी एक जरूरी पढ़ाई है जो कहीं और नहीं सीखी जा सकती। इसलिए नवनियुक्त छात्रनेता, “राजनीतिकी वर्तमान व्याख्या को सिरे से खारिज करें और पढ़ाई तथा पढ़ाई के अधिकार के लिये लड़ाई करें तब ही इन चुनावों की सार्थकता है।
सामाजिक संवेदनहीनता
अपने अधिकारों के लिए लड़ाई नहीं करने की सीख ही हमारी वर्तमान कुव्यवस्था के लिए उत्तरदायी है। चुप रहने की इस आदत को हम भले ही अपनी सहिष्णुता का शाब्दिक मुखौटा दें पर यह निशचित ही कायरता एवं संवदेनशून्यता ही है। सड़क नहीं है तब चुप है, बिजली नही है तब भी चुप हैं। अपराधी शोषण करे तब चुप हैं, पुलिस अत्याचार करे तब भी चुप है। अधिकारी काम न करे तब चुप हैं, अधिकारी काम करने के लिए पैसे माँगे तब भी चुप है। यह खामोश रहने की कैसी ट्रेनिंग मिली है आम भारतीयों को आजादी के 65 बर्षों मेऐसे दमघोंटू मौहाल में छात्र राजनीति ही एक ऐसा विकल्प दे सकने में समर्थ है जिससे व्यापक मूलभूत रचनात्मक परिवर्तन हो सकता है जिससे देश में हर तरह का शोषण समाप्त हो सके और एक जातिविहीन, धर्मविहीन और वर्गविहीन समाज की स्थापना हो सके। यह तो निश्चित है कि क्रांति के लिए बंदूकों की नहीं परिवर्तन विचारों की जरूरत है और इसके लिए युवाओं को राजनीति में लाना आवश्यक है ताकि वे नये आधार से राजनीति की व्याख्या कर सकें क्योंकि पुराने जीर्ण-शीर्ण व्यक्तिगत स्वार्थ के आधार पर बनाए गए राजनैतिक इमारतों को भ्रष्टाचार के दीमकों ने संपुर्णत: निगल लिया है।
राजनैतिक अपरिपक्वता

आजा मेरी गाड़ी में बैठ जा की संस्कृति में पले-बढे इन नव कोपलित राजनीतज्ञों से ज्यादा उम्मीद रखना बेमानी ही होगा। 2012 छात्रसंघ चुनाव जीतने वाले युवा और संगठन अभी तक विश्विद्यालय प्रशासन मे अपने प्रभाव को लेकर सशंकित है एवं स्वंय अपने अधिकारों से अनभिज्ञ भी हैं, इसलिए इन्हे पग-पग पर उचित मार्ग-दर्शन की आवशयकता है। पटना विश्विघालय छात्र संघ चुनाव में प्रचार के दौरान छात्राओं नें अपने गाल और छाती पर समर्थित उम्मीदारों का टैटू बनवाकर, नि:संदेह, छायाकारों की पहली पसंद बनी रही, पर ऐसे हथकंड़ो से उन्होनें अपनी मानसिक संकीर्णता एवं अपरिपक्वता का परिचय ही दिया है जिससे वे आगे निश्चित ही निराश ही होंगी।


Camera Draped And Snarls On Track


Toying with the tools that costs millions to the public money, the Patna Traffic Police continues to feign both the public and itself as a full calendar year is to complete in a couple of days and the system is not functioning. Back to the memory lane, the city administration installed surveillance camera at 4 major roundabouts in Patna promising to monitor and regulate the traffic. The initiative took space at almost every major dailies(e.g.the telegraph, the next image) and the traffic police got deluge of encomium. They are not just another CCTV camera. They are IP cameras run on Internet Protocol streamlines real time visual data to the control room via high bandwidth internet connection. Actually this is how traffic system gets regulated in cities like Newyork, London, Amsterdom, Tokyo etc.

The height of negligence come to light when the camera at Patna Jn. roundabout continues to draped by a rally poster for 3 weeks and nobody from the administration took care of. When I talked to Senior superintendent of police (SSP) Amrit Raj, he told “We are planning to shift the surveillance base of the CCTV cameras to the new Traffic police station (at Gandhi Maidan).”, though my question was straight about the illegal draping of camera. Anyway it is well known that CCTV cameras were installed at four roundabouts — Station, Exhibition Road, Kotwali and Income Tax — on August 20. But even the SSP claims that these are not being utilised properly. 

The new plan of surveillance not withstanding from day one said officers in traffic police headquarter in Patna.  To begin with, the plan to install the surveillance cameras faced a number of hurdles since it was announced by then SSP Alok Kumar on December 24 last year. Kumar had launched a website and announced that commuters would be able to get regular traffic updates by logging into it.

Initially the project had a three-week deadline but it's about to complete a full calendar year with no frution. Handicapped by technical personnel in force, slower internet connection and paraphernalia of excuties, the administration felt no regret at all. Instead, the perfunctory police system of the state capital blames the Patna Municipal Corporation for getting the poject delayed. A centralised monitoring system was installed at the office of the traffic SP at the headquarters then. But there were not enough staffs to monitor the visuals” 

If bank's ATM, Stock exchange and media houses transfers high density real-time data and visuals using VSAT technology in this very city, using the available infrastructure, isn't it embrassing for the administration to give excuses like slower internet connection or poor bandwidth for the successful implementation of the project. To say without euphemism, It is just another way of procrastinating.

Traffice SP of capital is in New Delhi right now and about to tour Odisha for learning skills on how to manage traffic. With all due respect we have to say that One can not get a photograph with a draped camera. Does this too need learning. And for such learning roaming around the world on public money - Is this not a sheer wastage of public money?