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भारत में हैं 2 करोड़ अवैध बांगलादेशी


आसाम में जारी जातीय हिंसा के बारे में विभिन्न प्रकार के वक्तव्य, अफवाह और मनगढंत कारण गिनाये जाने लगे हैं। स्थानीय संगठित दल बोडो उग्रवादियों और स्थानीय मुसलमानों के बीच अंतर्विरोध को जारी हिंसक वारदातों का प्रमुख कारण बताया जाना जमीनी हकीकत से बिलकुल भिन्न है। आसाम के जमीनी सामाजिक कार्यकर्ता बताते हैं कि दशकों से बंगलादेश से लगातार आ रहे अवैध घुसपैठ का नतीजा है कि आज आसाम के वास्तविक नागरिको पर अपने ही प्रांत में अल्पसंख्यक होने का खतरा मंडरा रहा है, और इसी दबाब से निकलने की कोशिस ही वर्तमान में जारी हिंसा का कारण है।


भारत की आजादी के बाद से ही पाकिस्तान आसाम को पूर्वी पाकिस्तान (आज का बंगलादेश) में शामिल करने की मंशा जताता रहा है। 1971 में बाग्लादेश की आजादी के बाद से भारतीय क्षेत्र (खासकर आसाम और अन्य उत्तर-पूर्वी भारतीय राज्यों) में बंगलादेशी नागरिकों के घुसने और भारतीय मूल में विलय हो जाने की घटना में तीव्र इजाफा हुआ है। बंगलादेश की खराब अर्थव्यवस्था और रोजगार की कमी के कारण गरीबी और भूखमरी वहां का पर्याय बन चुकी है। अच्छी जीवनशैली एवं रोजगार की तलाश में भारतीय सीमा में बंगलादेशी नागरिकों का घुसपैठ एक दिनचर्या बन चुकी है। भारतीय़ राजनैतिकों में इच्छाशक्ति की कमी के कारण चार दशकों से चल रहा यह सिलसिला आज एक सिरदर्द बन चुका है। एक अर्धसरकारी आंकड़े के अनुसार आज देशभर में 2 करोड. से ज्यादा अवैध बंगलादेशीयों ने शरण ले रखी है जिसका कोई लेखा-जोखा हमारे देश के सुरक्षा तंत्र को नहीं है। दिल्ली जैसे शहरों में लगातार बढ. रही झुग्गी-झोपडी में रहनेवाले अधिकतर लोग बांगलादेश से भागे-भगाये हुए हैं जिनकी कोई पहचान नहीं है। भारतीय सेना और भारतीय तिब्बत पुलिस बल खुद स्वीकार करती है कि बंगलादेश से लगने वाली 267 किलोमीटर लंबी सीमा-रेखा में छिद्र है और वहाँ से घुसपैठ होती रही है फिर हमारे राजनैतिक आका किस आधार पर आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था का दंभ भरते हैं। य़ह निशिचत ही हैरान कर देने वाली स्थिति है।


भारतीय मुसलमानों को बाकी मुसलमानों के बराबर नहीं देखा जाना चाहिए। भारत के मुसलमान सिर्फ अपनी कौम की वजह से नही ब्लकि अपनी नागरिकता के कारण भारतीय है। लेकिन कोई भी मुसलमान जो घुसपैठ कर भारत में बस जाने की इच्छा रखता हो वह भारतीय़ नहीं है। ऐसे मुसलमान भारतीय मूल के मुसलमानों के हक तो छीनते हीं हैं वे पूरी कौम को बदनाम भी करते है। ऐसे अवैध बंगलादेशी भारत में रोजगार पा जाते हैं और हमारी अपनी मुसलिम जनसंख्या ठगी रह जाती है।


हिंसा से सर्वाधिक प्रभावित कोकराझार महाविद्यालय परिसर में लगाए गए राहत शिविर के दौरे के बाद कोकराझार में मेरी बात भारतीय मूल के कुछ पुराने वाशिंदो से हुई जिनके खुलासे हैरान कर देने वाले हैं। इनके अनुसार राजनीतिक दलों के नेता इन अवैध घुसपैठियों को वोटर लिस्ट मे नाम और भारतीय वोटर आई-कार्ड जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज दिलवाने में मदद करते है। और इस मदद के बदले वे चुनावों में इन बंगलादेशी घुसपैठिये या अवैध रूप से बने भारतीय नागरिकों से अपने पक्ष में मतदान करवाते हैं। य़ह भी एक कारण है कि भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में मतदान का आँकड़ा सर्वाधिक है। जहाँ चुनाव आयोग और सरकार इसे स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आमजन का विशवास बताती है हकीकत में वे आमजन भारतीय हैं ही नहीं।


बोडो संगठन के स्थानीय नेता(नाम नहीं छापने की शर्त पर) बताया कि केंद्र की नीतियां सिर्फ सत्ता में बने रहने के लिए है। और यही कारण है कि आसाम में सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ है। 126 सीटों के विधानसभा में कांग्रेस ने अपनी इन्हीं नीतीयों के दम पर आजादी से लगातार 1985 तक शासन किय़ा, जिसमें सिर्फ दो बर्षों के लिए सत्ता 1978-79 में उससे दूर रही और वर्तमान सत्ताधारी कांग्रेस के मुख्यमंत्री तरूण गोगई ने रिकार्ड तीसरी बार राज्य की सत्ता संभाली है। सेवानिवृत लेफटिनेंट जेनरल एस.के.सिन्हा जिन्होंने आसाम क्षेत्र में बर्षों तक आर्मी की सेवा कि और तत्पश्चात् आसाम के राज्यपाल भी रहे – के अनुसार, आसाम की स्थिति अत्यंत विस्फोटक है और यह स्थिति कोई नई नहीं है। सिन्हा ने राज्यपाल रहते हुए 1998 में केन्द्र को इस बारे में गंभीरता से आगाह किया था और बांगलादेशी घुसपैठ को रोकने के लिए उचित पहल पर शीघ्रता से कारवाही का आग्रह किया था।


भ्रष्टाचार में डूबी हमारी व्यवस्था में कुछ सौ रुपये खर्च कर ये बंगलादेशी घुसपैठिये भारतीय वोटर आई कार्ड, पैन कार्ड, बीपीएल कार्ड बनवाकर भारतीय पहचान पा जाते हैं और तमाम सरकारी योजनाओं मसलन इंदिरा आवास, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थय मिशन और मनरेगा जैसी योजनाओं तक का लाभ पाते रहतें है। 1998 में केंद्र को भेजे गए इस रिपोर्ट में उन्होनें 1947 में पाकिस्तान के उन प्रयासों का जिक्र भी किया था जिसमें आसाम को पूर्वी पाकिस्तान में समाहित करने का षड्यंत्र शामिल था। इतिहासकार जानते हैं कि क्षेत्रीय़ नेताओं के विरोध के कारण ही आसाम भारत में रह सका अन्यथा जुल्फिकार अली भुटटो ने आसाम को काश्मीर जैसा ही एक विवादास्पद मुद्दा बनाने में कोई कसर नहीं छोडी थी।


अपने रिपोर्ट में सिन्हा ने बताया कि किस प्रकार बंगलादेशी आंदोलन के प्रखर नेता शेख मुजीर्बुरहमान, जिन्हें भारत ने 1971 में बांगलादेश को आजाद कराने में भरपूर मदद की, ने आसाम को बांगलादेश का हिस्सा बताने में तनिक भी शर्म नहीं की। प्रकृति प्रदत्त स्त्रोतों से भरपूर आसाम को देखकर सभी उसका दोहन करना चाहते हैं, परंतु हमारे राजनेताओं की ओछी मानसिकता के कारण हमने उसे पड़ोसी मुल्कों का चारागाह बना दिया है। श्री सिन्हा के साहसिक एवं दूरगामी प्रयासों का फल उन्हे तुरंत ही मिला। कांग्रेस और सीपीआई के स्थानीय और राष्द्रीय स्तर के नेताओं ने सांप्रदायिक उन्माद फैलाने के प्रयास करने जैसे गंभीर आरोप श्री सिन्हा पर लगाये गए। कांग्रेस के 22 सांसदों ने राष्ट्रपति से श्री सिन्हा (तत्कालीन राज्यपाल) को आसाम से वापस बुलाने की मांग की। अब ऐसी परिस्थिति में केन्द्र और आसाम में सत्ताच्युत्त कांग्रेस से सवाल-जबाव का अर्थ ही बेमानी है।

वेतन में फर्क ही बना मारूति के मानेसर प्लांट में हिंसा की वजह

The article originally appeared on NewsPlus hindi monthly in Aug,2012
मानेसर में 18 जुलाई को हुए हिंसक झड़प के दौरान मारूति कंपनी के मानव संसाधन प्रबंधक अवनीश कुमार देव की पिटाई और हत्या तथा 80 से अधिक कर्मचारियों का घायल होना अत्यंत ही शर्मनाक एवं निदनीय धटना है। धटना के बाद विभिन्न कर्मचारी संघटन एवं राजनीतिक दल घटना के पीछे अपने-अपने तर्क दे रहे है।
जमीनी हकीकत
मैगसैसे पुरस्कार सम्मानित संदीप पांडेय ने मारूति प्लांट के बारे में जमीनी तहकीकात की और कहा कि यदि कोई संस्था या फैक्ट्री प्रबंधन के लोगों की वेतन वृद्दि कर रही हैं तो निशिचत तौर पर उसे चाहिए कि निचले स्तर पर काम कर रहे कर्मचारियो(स्थायी या अस्थायी) की भी वेतन वृद्दि करनी चाहिए, अन्यथा उस संस्थान में कर्मचारियों के बीच द्वेष बढेगा एवं उनके बीच गरीबी-अमीरी का मसला गहराता चला जाऐगा। यह स्थिति किसी भी परिस्थिति में बेहतर रिजल्ट नहीं देगी और एक दिन समस्या विकराल हो जाएगी जैसा अभी मानेंसर में हुआ। पाठकों को याद होगा कि तीन साल पहले इसी हरियाणा के गुड़गाँव में हीरो होंड़ा के प्लांट में कर्मचारियों, प्रबंधन और पुलिस के बीच व्यापक स्तर पर हिंसक झड़प हुई थी जिसकी लाईव तस्वीरें सारी दुनियाँ ने देखी थी।

व्यापक स्तर के किसी भी प्लांट या संस्थान का एकमात्र उद्देश्य लाभ कमाना ही नहीं होता। जिस जमीन, पानी, पर्यावरण और समाज के बीच वह संस्थान चलती है उसके प्रति भी जिम्मेदारी होती है। स्थानीय स्तर के लोगों के बीच स्थायी-अस्थायी स्तर पर नौकरियाँ देकर कंपनीया अपने दायित्व का निर्वाह करती है। पर सही भावना के अभाव में उन कर्मचारियों से भेदभाव करने की घटनायें प्रकाश में आती रहती हैं। मानेसर की घटना प्रबंधन की इसी भेदभाव पूर्ण नीति के कारण हुई है।
मारुति कंपनी के स्थायी कर्मचारियों का वेतन अस्थायी कर्मचारियों से दुगूना है। जबकि दोनों प्रकार के कर्मचारियों के कार्य या कार्यावधि में कोई अंतर नहीं है। कंपनी के आंतरिक स्त्रोत के अनुसार पिछले 1 बर्ष के दौरान अस्थायी कर्मचारियों ने अनेकों बार प्रबंधन का ध्यान इस ओर दिलाया और वेतन वृद्धि के लिए तीन बार अल्पकालिक सार्वजनिक अवकाश पर भी गए परंतु प्रबंधन इन मांगो को अनसुना करती रही। मारूति प्लांट में जहाँ स्थायी कर्मचारी 17-18 हजार मासिक पाते हैं वहीं उसी काम को करनेवाले अस्थायी कर्मचारी मात्र 7000 रुपये मासिक पाते है। य़ह कहीं से न्यायोचित्त नहीं है और इसी कारण मानेसर प्लांट में यह दर्दनाक घटना हूई।

कंपनी अस्थायी कर्मचारियों को स्थायी नहीं कर रही है और उन्हें कर्मचारी संगठन बनाने की अनुमति भी नहीं दी जा रही है। ज्ञातत्व है कि गुडगाँव और मानेसर प्लांट के कर्मचारी संगठनों को भी आपसी तालमेल नहीं करने दिया जा रहा है और प्रबंधन ने इस पर सख्ती से रोक लगा रखी है। इसके पीछे कंपनी को डर है कि कर्मचारी संगठन मजबूत होंगे और उनकी मांगे प्रबंधन के लिए अतिरिक्त जिम्मेदारी लाएंगी और कंपनी का आर्थिक बोझ बढेगा। कंपनी प्रबंधन ने गुडगाँव और मानेसर कर्मचारी संगठनों को अन्य किसी भी क्षेत्रीय या राष्ट्रीय स्तर की संगठनों से तालमेल की अनुमति नहीं दी है जो कि संगठन के अधिकारों को हनन है एवं कानूनी तौर से अवैध है।

कंपनी और प्रबंधन की यही कुनीतियां निचले स्तर के अस्थायी कर्मचारियों के बीच मनोविकार पैदा करता आ रहा है एवं अमीर-गरीब के बीच बढ़ती खाई ही इन घटनाओं के लिए जिम्मेदार है एवं सरकार और प्रबंधन की असामाजिक नीति के कारण ही ऐसी घटनाएँ बढ रही हैं। ये नीतियाँ सही मायनों मे निचले स्तर के कामगारों का शोषण कर रही है। सरकार एवं प्रबंधन को अपनी आर्थिक नीतियों की पुर्नसमीक्षा की जरूरत है। किसी भी उद्योग की आमद को उसकी कामगारों की संतुष्टि से अलग कर देखे जाने कि नीति सरासर गलत है।

मारूति प्लांट में हुई हिंसक झड़प के बाद 21 जुलाई को कंपनी ने एक प्रेस कांफ्रेंस आयोजित कर घोषणा कि कंपनी आने वाले छह महीनों में सभी कैसुअल कामगारों को विभिन्न जिम्मेदारीयों से अलग कर देगी और असेंबली लाईन में कोई भी तात्कालिक कर्मचारियों को नहीं रखा जायेगा। जरूरत के अनुसार कंपनी सीधी भरती करेगी एवं इस प्रक्रिया में ठेकेदारों की सेवा नहीं ली जाएगी। नवनियुक्त कर्मचारियो को तात्कालिक तौर पर ही रखा जायेगा परंतु सभी भावी भरतियों में उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी। मारूति के चेयरमैन आर.सी.भार्गव ने कहा कि छुट्टी, बोनस और सभी तकनीकी मुद्दो पर कर्मचारियों और कंपनी के बीच सीधा समझौता होगा।


मारूति सुजुकी कामगार संघ जो कि कंपनी के गुङगांव प्लांट को प्रतिबिंबित करता है ,के महासचिव कुलदीप सिंह जंघु ने घटना की तीखी आलोचना कि है और कहा है कि प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच बढती खाई को यदि समय रहते नहीं पाटा गया तो गुडगाँव के प्रति उद्योगों का आकर्षण खत्म हो जाएगा।
Amit Sinha is a Research Journalist. He is available at f/indianxpress