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वेतन में फर्क ही बना मारूति के मानेसर प्लांट में हिंसा की वजह

The article originally appeared on NewsPlus hindi monthly in Aug,2012
मानेसर में 18 जुलाई को हुए हिंसक झड़प के दौरान मारूति कंपनी के मानव संसाधन प्रबंधक अवनीश कुमार देव की पिटाई और हत्या तथा 80 से अधिक कर्मचारियों का घायल होना अत्यंत ही शर्मनाक एवं निदनीय धटना है। धटना के बाद विभिन्न कर्मचारी संघटन एवं राजनीतिक दल घटना के पीछे अपने-अपने तर्क दे रहे है।
जमीनी हकीकत
मैगसैसे पुरस्कार सम्मानित संदीप पांडेय ने मारूति प्लांट के बारे में जमीनी तहकीकात की और कहा कि यदि कोई संस्था या फैक्ट्री प्रबंधन के लोगों की वेतन वृद्दि कर रही हैं तो निशिचत तौर पर उसे चाहिए कि निचले स्तर पर काम कर रहे कर्मचारियो(स्थायी या अस्थायी) की भी वेतन वृद्दि करनी चाहिए, अन्यथा उस संस्थान में कर्मचारियों के बीच द्वेष बढेगा एवं उनके बीच गरीबी-अमीरी का मसला गहराता चला जाऐगा। यह स्थिति किसी भी परिस्थिति में बेहतर रिजल्ट नहीं देगी और एक दिन समस्या विकराल हो जाएगी जैसा अभी मानेंसर में हुआ। पाठकों को याद होगा कि तीन साल पहले इसी हरियाणा के गुड़गाँव में हीरो होंड़ा के प्लांट में कर्मचारियों, प्रबंधन और पुलिस के बीच व्यापक स्तर पर हिंसक झड़प हुई थी जिसकी लाईव तस्वीरें सारी दुनियाँ ने देखी थी।

व्यापक स्तर के किसी भी प्लांट या संस्थान का एकमात्र उद्देश्य लाभ कमाना ही नहीं होता। जिस जमीन, पानी, पर्यावरण और समाज के बीच वह संस्थान चलती है उसके प्रति भी जिम्मेदारी होती है। स्थानीय स्तर के लोगों के बीच स्थायी-अस्थायी स्तर पर नौकरियाँ देकर कंपनीया अपने दायित्व का निर्वाह करती है। पर सही भावना के अभाव में उन कर्मचारियों से भेदभाव करने की घटनायें प्रकाश में आती रहती हैं। मानेसर की घटना प्रबंधन की इसी भेदभाव पूर्ण नीति के कारण हुई है।
मारुति कंपनी के स्थायी कर्मचारियों का वेतन अस्थायी कर्मचारियों से दुगूना है। जबकि दोनों प्रकार के कर्मचारियों के कार्य या कार्यावधि में कोई अंतर नहीं है। कंपनी के आंतरिक स्त्रोत के अनुसार पिछले 1 बर्ष के दौरान अस्थायी कर्मचारियों ने अनेकों बार प्रबंधन का ध्यान इस ओर दिलाया और वेतन वृद्धि के लिए तीन बार अल्पकालिक सार्वजनिक अवकाश पर भी गए परंतु प्रबंधन इन मांगो को अनसुना करती रही। मारूति प्लांट में जहाँ स्थायी कर्मचारी 17-18 हजार मासिक पाते हैं वहीं उसी काम को करनेवाले अस्थायी कर्मचारी मात्र 7000 रुपये मासिक पाते है। य़ह कहीं से न्यायोचित्त नहीं है और इसी कारण मानेसर प्लांट में यह दर्दनाक घटना हूई।

कंपनी अस्थायी कर्मचारियों को स्थायी नहीं कर रही है और उन्हें कर्मचारी संगठन बनाने की अनुमति भी नहीं दी जा रही है। ज्ञातत्व है कि गुडगाँव और मानेसर प्लांट के कर्मचारी संगठनों को भी आपसी तालमेल नहीं करने दिया जा रहा है और प्रबंधन ने इस पर सख्ती से रोक लगा रखी है। इसके पीछे कंपनी को डर है कि कर्मचारी संगठन मजबूत होंगे और उनकी मांगे प्रबंधन के लिए अतिरिक्त जिम्मेदारी लाएंगी और कंपनी का आर्थिक बोझ बढेगा। कंपनी प्रबंधन ने गुडगाँव और मानेसर कर्मचारी संगठनों को अन्य किसी भी क्षेत्रीय या राष्ट्रीय स्तर की संगठनों से तालमेल की अनुमति नहीं दी है जो कि संगठन के अधिकारों को हनन है एवं कानूनी तौर से अवैध है।

कंपनी और प्रबंधन की यही कुनीतियां निचले स्तर के अस्थायी कर्मचारियों के बीच मनोविकार पैदा करता आ रहा है एवं अमीर-गरीब के बीच बढ़ती खाई ही इन घटनाओं के लिए जिम्मेदार है एवं सरकार और प्रबंधन की असामाजिक नीति के कारण ही ऐसी घटनाएँ बढ रही हैं। ये नीतियाँ सही मायनों मे निचले स्तर के कामगारों का शोषण कर रही है। सरकार एवं प्रबंधन को अपनी आर्थिक नीतियों की पुर्नसमीक्षा की जरूरत है। किसी भी उद्योग की आमद को उसकी कामगारों की संतुष्टि से अलग कर देखे जाने कि नीति सरासर गलत है।

मारूति प्लांट में हुई हिंसक झड़प के बाद 21 जुलाई को कंपनी ने एक प्रेस कांफ्रेंस आयोजित कर घोषणा कि कंपनी आने वाले छह महीनों में सभी कैसुअल कामगारों को विभिन्न जिम्मेदारीयों से अलग कर देगी और असेंबली लाईन में कोई भी तात्कालिक कर्मचारियों को नहीं रखा जायेगा। जरूरत के अनुसार कंपनी सीधी भरती करेगी एवं इस प्रक्रिया में ठेकेदारों की सेवा नहीं ली जाएगी। नवनियुक्त कर्मचारियो को तात्कालिक तौर पर ही रखा जायेगा परंतु सभी भावी भरतियों में उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी। मारूति के चेयरमैन आर.सी.भार्गव ने कहा कि छुट्टी, बोनस और सभी तकनीकी मुद्दो पर कर्मचारियों और कंपनी के बीच सीधा समझौता होगा।


मारूति सुजुकी कामगार संघ जो कि कंपनी के गुङगांव प्लांट को प्रतिबिंबित करता है ,के महासचिव कुलदीप सिंह जंघु ने घटना की तीखी आलोचना कि है और कहा है कि प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच बढती खाई को यदि समय रहते नहीं पाटा गया तो गुडगाँव के प्रति उद्योगों का आकर्षण खत्म हो जाएगा।
Amit Sinha is a Research Journalist. He is available at f/indianxpress