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Reminiscent Of Jungle Raj

बह्रामेश्वर  सिंह उर्फ मुखिया जी की हत्या के बाद राजधानी की कानून-व्यवस्था के साथ जो क्रूर मजाक हुआ उसने राजद शासनकाल के जंगल राज की यादें ताजा कर दी। हत्या के दिन मुखिया समर्थकों ने संपूर्ण भोजपुर को 5-6 घंटे तक पूरे विश्व से काट दिया। राष्ट्रीय राजपथ और दिल्ली-हावड़ा रेलमार्ग पर दर्जनों रेलगाड़ियाँ मुगलसराय से मोकामा के बीच फंसी रही और प्रशासन मूक दर्शक बनकर उत्पातियों के स्वतः शांत होने की प्रतीक्षा करता रहा।
नीतिश कुमार जो अच्छी कानून-व्यवस्था दे पाने के कारण ही दुबारा सत्ता में भारी बहुमत से आये हैं शायद अपनी ही प्राथमिकता भूलने लगे है। भले ही पुलिस प्रशासन के अधिकारी मुखिया समर्थक की शक्ल में आये असामाजिक तत्वों की विडियोग्राफी कर लेने और तत्पश्चात् उन्हें सजा देने का दंभ भर रही हो, पर क्या सरेआम राज्य की राजधानी में अराजकता फैलने देना एक सही कदम था। जैसे ही शवयात्रा सगुना मोड़ पहुंची भीड मे एकाएक बढोत्तरी हुई और शेखपुरा पहुँचते-2 दुकानदारों और गरीब फेरीवाले लुटे जाने लगे। भीड़ ने किसी को नहीं बख्सा और प्रशासन की सुस्ती(या योजना) उस समय अत्यंत निराश करने वाली साबित हुई जब भीड़ ने शेखपुरा पुलिस पिकेट को आग के हवाले कर दिया और कुछ कांस्टेबलों की शरेआम पिटाई हुई।

बह्रामेश्वर सिंह-एक संक्षिप्त परिचय
बह्रामेश्वर सिंह 90 के दशक में अगड़ी जाति(खास कर जमींदार वर्ग) के नायक के रूप स्थापित हुए। उन्होंने नीची जाति के लोगों के बढते प्रभाव को खत्म करने के लिए नीची जाति के लोगों को ही खत्म करने का रास्ता चुना। बिहार के विभिन्न प्रांतो से सामंती वर्ग के लोगों से उन्हे भरपुर समर्थन मिलने लगा। जमींदारों और बंटाईदारों के बीच की लड़ाई अब नये आयाम लेने लगी थी और वह मुख्यतः जाति प्रधान होकर भूमिहारों और नीची जाति के बीच सिमट गयी। इस दौर में वामदल बंटाईदारों के समर्थन में नक्सलीयो की खेप तैयार कर रहा था और जमींदारों के बीच ऐसी कोई एकता य़ा संगठन नहीं होने से उनकी पुश्तैनी जमीन पर नक्सलियों द्वारा लाल झंड़ा गाड़ कर कब्जा कर लिया जाने लगा।

80-90 का वह खूनी दौर
सर्वविदित है कि उस दौर में प्रशासन (खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में) बिलकुल नगण्य था और ताकतवर और दबंग ही कानून था। ऐसे नाजुक वक्त में बर्ह्मदेव सिंह ने जमींदारों को एकजुट किया और उन्हें हथियार के बल पर नक्सलियों से लोहा लेने का उद्देश्य दिया। इसके पश्चात् के ही बर्षों में ऱणवीर सेना एक ऐसे मजबूत संगठन के रूप में सामने आया जिसने कई नरसंहारो को अंजाम दिया। बथानी टोला नरसंहार, शंकर टोला और ऐसे कई नरसंहारो में 300 से अधिक लोगों की जानें गईं और रणवीर सेना ने स्पष्ट रुप से प्रेस विज्ञप्ति जारी कर ज्यादातर नरसंहारों की जिम्मेदारी ली। सूत्र मानते हैं कि बर्ह्मदेव सिंह ने ही ज्यादातर नरसंहारो की योजना बनाई और रणवीर सेना की स्थापना से लेकर हथियारों और पैसों की व्यवस्था की।

स्थूलता या नजरअंदाजी
बह्रामेश्वर मुखिया के मौत के बाद उनके शव-यात्रा के दौरान दो दिनो तक राज्य के विभिन्न जिला क्षेत्रों में मुखिया-समर्थकों द्धारा लूटपाट मची रही और प्रशासन स्थूल पड़ा रहा। यही मंजर था राजधानी का सुशासन की राजधानी का । उस सरकार का जो अच्छे प्रशासनिक माहौल का दंभ भर कर प्रदेश में निवेशकों को आकर्षित करना चाहती है और इसके लिए तीन माह पहले ही राजधानी के सबसे मंहगे होटल में बिहार ग्लोबल समिट करती है और उस सरकारी आयोजन पर जनता का पैसा पानी की तरह बहाया जाता है। निश्चित तौर पर 13 फीसदी का विकास दर हासिल कर लगातार दूसरे साल सबसे उपरी पायदान पर आना आंकडो का गणित हो सकता है परंतु लगातार तीन दिनों तक लगभग सभी इलेक्ट्रानिक मीडिया पर चल रही अराजकता की विडियो फुटेज कुछ और नहीं ब्लकि सरकारी तंत्र और प्रशासन की विफलता पर सच्चाई की मुहर है।