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फिर से राजनीती सीखें नीतिश कुमार

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देश के पांच राज्यों में चुनावों और परिणाम के बाद सबकी नजरें दिल्ली पर टिकीं है। राजनीतिक पंड़ितों के बहस का मुद्दा दिल्ली में त्रिशंकु जनादेश के भविष्य को लेकर है। ऐसे में इस विषय पर मेरे विश्लेषण की कोई खास आवश्यकता नहीं है। एक गौरतलब बात जो नजरअंदाज कर दी जा रही है वह है बिहार के सतारूढ़ दल का दिल्ली में अंडरपरफारमेंस।
दिल्ली की राजनीति में नीतिश का पर्दापण 
नीतिश कुमार की जदयू ने दिल्ली विधानसभा 2013 के चुनावों में भागीदारी की है। रविवार को रिजल्ट भी आ गया। परंतु जदयू के प्रदर्शन को लेकर कोई खबर नहीं मिल पा रही थी। खैर रविवार देर रात इस संदर्भ में पुख्ता और प्रमाणित डाटा मिला। पेश है एक रिपोर्ट। 
दिल्ली विधानसभा चुनावों के रास्ते नीतिश कुमार ने दिल्ली में दस्तक दी है। चुनावों की पूर्वसंध्या पर दिल्ली की रैली में दंभ भरने वाले नीतिश कुमार को उनके उम्मीद के विपरीत परिणाम मिले हैं। 27 में से 26 सीटों पर जदयू उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई है। मटियामहल से जदयू को इकलौती जीत मिली है। सबसे गौर करने वाली बात रही की मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से जदयू प्रत्याशियों को जबर्दस्त निराशा हाथ लगी है।
अमूमन हर विधानसभा क्षेत्र में 1 लाख से 1.5 लाख वोट पड़े। जिसमें जदयू प्रत्याशियों को मात्र 100 वोट के आस-पास मिले। लक्ष्मीनगर और त्रिनगर में तो हद हो गई वहां नीतिश कुमार के प्रत्याशीयों को 91 वोट मिले। 

नीतिश कुमार ने अपनी पार्टी की ओर से दिल्ली विधानसभा के कुल 70 सीटों में 27 पर अपने उम्मीदवार खड़े किये थे। सेक्यूलर नीतिश ने यहाँ भी सेक्यूलर कार्ड खेला और लगभग आधी सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिये। परंतु जिस तरह से दिल्ली की जनता और मुस्लिम वोटरों ने इन्हें नकारा वह इनकी सेक्यूलर राजनीति को जबर्दस्त तमाचा है। 
साथ ही गौरतलब है कि जिन क्षेत्रों में बिहारियों की तादाद ज्यादा है वहाँ जदयू उम्मीदवारों को 100(एक सौ) वोट भी नहीं मिल सके। 
उदाहरणः- 
1. दिल्ली के लक्ष्मी नगर में अधिकांशतः लोग बिहार के हैं। कुल वोट पड़े 1,18,240 (1 लाख 18 हजार 240)। यहाँ जदयू प्रत्याशी जयराम को सिर्फ 91 वोट मिले। 
2. दिल्ली के त्रिनगर क्षेत्र में 1,03,335 (1 लाख 3 हजार 335 वोट पड़े। जदयू के सेक्यूलर राजनीति के उम्मीदवार मोहम्मद सुलेमान खान को भी मात्र 91 वोट ही मिले। 
3. मुस्लिम बहुल क्षेत्र मुस्तफाबाद में भी नीतिश के मुस्लिम उम्मीदवार चारो खाने चित गिरे। कुल वोट पड़े 1,47,082 (1 लाख 47 हजार 82). मोहम्मद शाकिब यूसूफ को मिले 164 वोट। जबकि यहाँ से कांग्रेस के एक मुस्लिम उम्मीदवार ने ही जीत दर्ज की। इसका अर्थ साफ- मुस्लिमों ने नीतिश से बेहतर कांग्रेस को समझा। 
4. मुस्लिमों की अच्छी जनसंख्या वाले क्षेत्र तुगलकाबाद से नीतिश ने मुस्लिम उम्मीदवार को खड़ा किया। इसका का सिर्फ एक ही कारण रहा होगा। परंतु जनता का निर्णय 'सेक्यूलर' राजनीति के विपरीत आया। जदयू के मोहम्मद शब्बीर को मात्र 640 वोट मिले जबकि कुल वोट पड़े 87,240। और जीत दर्ज की भाजपा के रमेश बिधूरी ने वह भी 34,000 से अधिक वोट लाकर। 

अब इतना तो तय हो गया है कि मुसलमानों को धर्म के नाम पर राजनीति में इस्तेमाल करना संभव नहीं है। अब मुस्लिम संप्रदाय भी विकास को महत्व देने लगा है। इसके साथ ही नीतिश कुमार के लिए यह खतरनाक संकेत है कि बिहार के लोग उनसे अत्यधिक नाराज है। दिल्ली के बिहारी बहुल इलाकों से बिहार के मुख्यमंत्री के अनुयायियों को 100 वोट का नहीं मिल पाना शर्मनाक है। यह संदेश है जो स्पष्ट कर रहा है कि आनेवाले आम चुनावों में नीतिश की स्थिति कांग्रेस से भी अधिक बदतर होनी तय है। इस स्थिति में नीतिश कुमार को फिर से राजनीति सीखने की जरूरत है।
Amit Sinha is a bilingual Columnist. He can be contacted at facebook.amit