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No Real JanPal In Parliament


लोकपाल विधेयक का जैसा हश्र लोकसभा और फिर राज्यसभा में हुआ उससे यह साफ हो गया कि राजनीतिक दल यह चाह ही नहीं रहे है कि यह विधेयक कानून की शक्ल ले। जहां सत्तापक्ष राज्यसभा में अपने अल्पमत होने की स्थित से बखूबी परिचित होने के बावजूद विपक्ष की आपत्तियों को न मानने के लिए अड़ा रहा वहीं विपक्ष के साथ-साथ सहयोगी दलों ने भी ऐसी चाल चली की मौजूदा रूप में यह बिल पास ही न हो पाये। लोकपाल के मुद्दे पर दोनों पक्षों में जो विरोधाभास था उनमें
एक- लोकायुक्त संबधी प्रावधान था और
दूसरा- सीबीआई की स्वायत्ता का और
तीसरा- लोकपाल के चयन और निष्कासन के अधिकार को लेकर था।

लोकायुक्त संबधी प्रावधान- कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस को छोड़कर भाजपा सहित सभी छोटे-बड़े दल एकजुट होकर राज्यों में लोकायुक्त के गठन का विरोध कर रहे थे। ये सभी दल इसे भारतीय लोकतंत्र के संघीय ढांचे के खिलाफ बता रहे थे। उनका कहना है कि केंद्र सरकार इस कानून का गलत इस्तेमाल उन राज्यों में जहां विपक्षी दलों की सरकारें हैं के खिलाफ करेंगी। हालांकि यह तकनीकी आधार आज के राजनैतिक स्तर मे सही भी साबित हो सकता है परंतु ऐसे बहुत से कानुन है, जिसका इस्तेमाल केंद्र सरकारें राज्यों के खिलाफ करती रहीं है। संघीय ढ़ांचे और राज्य के अधिकारो की दुहाई देकर भ्रष्टाचार विरोधी इस बिल को रोकना कतई उचित नहीं है क्योंकि भ्रष्टाचार का दानव एक सरर्वयापी रूप मे हैं। क्या उसकी प्रकृति केंद्र और राज्यों में बदल जाती है? नहीं। तो फिर उससे लड़ने वाले कानुन अलग-अलग प्रकृति के क्यों हों। कानून की एकरूपता उसके पालन में सुद्ढ़ता और शक्ति देता है। अन्यथा कार्यपालिका हमेशा ही कानुनी पचड़ो में पडी रह जाती है और दोषी कानून को मुँह चिढाता रहता है।

सीबीआई की स्वायत्ता - कांग्रेस का सीबीआई के स्वायत्ता को लेकर जो रूख है वह हैरान कर देने वाला है। वह किसी भी परिस्थिति में इस सर्वोच्च जाँच एजेंसी को केंद्रीय सत्ता के नियंत्रण से बाहर नहीं जाने देना चाहती हैं। जबकि विपक्षी दलों की यह आपत्ति सही है की सीबीआई का केंद्र सरकार के अधीन होने से लोकपाल निष्पक्ष जांच नहीं कर सकती। सीबीआई लोकपाल के दायरे में हो या नहीं यह बहस तो तर्कपूर्ण हो सकता है लेकिन सत्तारूढ.कांग्रेस सरकार की सीबीआई को अपने अधीन रखने की हठधर्मिता उसके दागदार दामन और भय को दर्शाता है, वर्ना देश की सर्वोच्च जाँच एजेंसी सरकार के अधीन काम क्यों करे? जबकि संसद के अदर से पक्ष-विपक्ष दोनों ने यह स्वीकार किया है कि सीबीआई का दुरूपयोग सत्तासीन दलों ने किया है। सीबीआई के पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह ने आन रिकार्ड स्वीकार किया था कि केंद्र सरकारे जाँच को प्रभावित करती रहीं हैं। कांग्रेस जहां सीबीआई को लोकपाल के दायरे में रखने के विरोध मे है वहीं वह सीबीआई को स्वात्तयता देने की बात तो करती है पर उसके लिए कतई तैयार नहीं है।

अभी हाल ही में कई पत्रिकाओं में यह बात आयी कि एक सांसद को नामांकन से लेकर चुनाव लडने और संसद तक पहुंचने में लगभग 10 करोड़ रूपये खर्च करने पड़ते है। ऐसे में संप्रग.2 के मात्र ढाई साल ही हुए हैं। इसलिए कांग्रेस किसी भी स्थिति में ऐसे कानून को हरी झंडी नही देना चाहती जहां जनता और जांच एजेंसीयो के हाथ उसके सांसदों और मंत्रियो के गिरेबान तक पहुँचे। उन स्थितयों में मध्यावधि चुनाव आवशयक हो जाएगा और कांग्रेस सत्ता से बाहर। अभी करीब 150 लोकसभा सांसदो पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप है जिनमे ज्यादातर सरकार और सहयोगी दलों के सदस्य ही हैं। ऐसे मे सत्तापक्ष का सीबीआई को अपने नियंत्रण से बाहर जाने देना उसके लिए राजनीतिक आत्महत्या ही कही जायेगी। इसकी पुष्टि सभापटल पर कई सांसदो के बयान से भी लगाया जा सकता है। कई ने कहा कि वर्तमान व्यवस्था ही ठीक है तो एक सांसद ने तो बहस के दौरान यहां तक कह दिया कि क्या हम अपने ही गले में फंदा लगा ले।

लोकपाल का चयन और निष्कासन – अण्णा हजारे और देश के लाखों लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ व्यापक सुधार की जो परिकल्पना कर रहें है उसमें लोकपाल के चयन और निष्कासन के अधिकार को लेकर जहां केंद्रीय सत्ता टीम अण्णा के सुझाये प्रस्तावों से खफा दिखती हैं वहीं वह इस मामले में सरकार की सर्वोच्चता चाहती है जो कि इस पुरे ऑदोलन की आत्मा है। इस प्रकार एक अस्वाभिक प्रस्ताव रखकर कांग्रेस देश को बहस और विरोधाभासों में उलझाकर समय काटना चाहती है। साथ ही कांग्रेस जानती है कि बीतते समय के साथ ऑदोलन के समर्थकों मे कमी होंगी और ऑदोलन की धार कुँद होगी। टीम अण्णा भी इस बात को समझती है और इसलिए उसके कुछ कदम जल्दबाजी मे लिए गए दिखते है। ऐसे में देश कि जनता को संयम से काम लेना होगा और भ्रष्टाचार के खिलाफ इस मुहिम के साथ लंबे समय तक साथ रहने की जिद रखनी होगी।

भ्रष्टाचार के विरूद्द आवाज को नयी दिशा की जरूरत

इस साल के आखिरी सप्ताह ने पूरे साल के भ्रष्टाचार विरोधी संघर्ष पर पानी फेर दिया है। इसी सप्ताह साल भर का यह संघर्ष जबरदस्त जोश के साथ चरम पर पहुँच गया और वहीं जाकर चकनाचूर भी हो गयाय़ इस त्रासदी का एक हिस्सा मुंबई के MMRDA मैदान और दूसरा हिस्सा हमारी संसद के दोनों सदनों में दिखाई दिया। दोनों जगहों से सुखद संभावनाओं के साथ देशवासी नए साल का इंतजार कर रहे थे, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि भ्रष्टाचार विरोधी जनभावना के लिहाज से ये असफलतायें अस्थायी सिद्ध हों। इन कड़वे अनुभवों से सबक लेकर सभी जनतांत्रिक शक्तियां आगे सावधानी से काम करें तो नए साल में भ्रष्टाचार विरोधी मुहीम शायद किसी मुकाम तक पहुंच सके। यह भी सही है कि लोकपाल के मामले पर बहुत जल्दबाजी में और बहुत ज्यादा पाने की आशा की गई थी, जो कि शायद उचित भी नहीं था।

2011 में देश के इतिहास में पहली बार सत्तारूढ़ सरकार ने पूरी संसद से इतर सिविल सोसायटी नाम के एक एनजीओ के पांच प्रतिनिधियों से बराबर के स्तर पर वार्ता करनी पड़ी। अण्णा की अगुआई में इस एनजीओ ने सरकार से बातचीत नाकाम होने पर 16 अगस्त 2011 को रामलीला मैदान में धरने पर बैठी। राजनीतिक हलकों में इस आंदोलन ने भूचाल खड़ा कर दिया। अण्णा के आमरण अनशन, व्यापक जनसमर्थन और मीडिया के स्वंय संज्ञान लेने के कारण ऑदोलन के प्रथम दिन ही सरकार घुटनों पर दिखी और अंततः प्रधानमंत्री और लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार के संसद के अंदर से अण्णा से उनका अनशन तोड़ने का अनुरोध किया। राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय मीडिया के सम्मुख संसद को तीन बिंदओं पर अपना संकल्प स्पष्ट करना पडा – और तत्पश्चात् ही अण्णा ने अनशन खत्म किया। हालांकि ऑदोलन जारी रहा और देश की जनता अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के आचरण को पढ़ती रही।


साल 2011 के इस आखिरी सप्ताह में मुंबइ और दिल्ली की नाटकीय घटनाओं ने यह सिद्ध कर दिया कि चमत्कार दोहराना हमेशा मुशिकल होता है। अन्ना हजारे के आंदोलन को मुंबई मे व्यापक जनसमर्थन नहीं मिलने के नाना कारण हे सकतें हैं जिसपर सत्तारूढ़ दल के लोग अपनी खुशी जता सकते हैं, परन्तु अन्ना के स्वास्थ को देखते हुए तीन दिनों के सांकेतिक अनशन को दूसरे दिन ही वापस लिया जाना भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई के लिए अच्छा ही माना जायेगा। जनलोकपाल के लिए शुरु हुई इस लडाई का अण्णा एक ऐसा चेहरा बन चुके है, जिसपर भारतीय जनमानस को सहज ही भरोसा हो जाता है। ऑदोलन के लंबे खिंचे जाने पर लोगों का भरोसा बना रहना बहुत जरुरी है, इसलिए अण्णा के स्वास्थय को लेकर ऐसे निर्णय निशिचत ही स्वागतयोग्य हैं।


भ्रष्टाचार विरोधी ऑदोलन के इस पडाव पर टीम अण्णा को निश्चित ही अत्यधिक संभल कर चलने की जरूरत है। कांग्रेस के रवैये से जहां लोकपाल बिल संसद के अंदर और बाहर लटकता रहा है और जिस प्रकार कांग्रेस के छुट्भैया नेता अण्णा के खिलाफ जहर उगल रहें है, अपशब्दों का प्रयोग कर रहें है – टीम अण्णा का कोई भी पलटवार भ्रष्टाचार विरोधी न रहकर कांग्रेस विरोधी हो जाता है – जो कतई इस पूरे ऑदोलन का मकसद नहीं है। हाँ यह सच है कि कांग्रेस का अहंकारी रवैया उसे आगामी पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में समस्या कर सकता है। वैसे सच कही जाये तो कांग्रेस इस बात को मानकर चल रही है कि युपी को छोडकर अन्य चार राज्यों में उसे नुकसान उठाना तय है। ऐसे में यह कांग्रेस जहां एक तरफ युपी में राहुल फैक्टर के भरोसे चुनाव रण में कुद रही है वहीं केंद्र की तर्ज पर राज्यों में भी गठबंधन सरकार बनाने के लिए सहर्ष तैयार दिख रही है। उत्तर प्रदेश में ऱाष्ट्रीय लोकदल से चुनाव पुर्व गठबंधन के एवज में इस पार्टी के अध्यक्ष और किसान नेता अजित सिंह को केंद्र में नागरिक उड्डयन मंत्रालय जैसा मलाईदार पद दिया जाना यह स्पष्ट कर देता है कि सत्ता में बने रहने के लिए गठबंधन के अलावा कांग्रेस वह सब कुछ करने के लिए तैयार है जिसे लोकतंत्र के लिए खतरा बताया जाता है।


उद्डंता और अभद्रता के सभी मापदंड को पार करती कांग्रेस अपने ही जाल में फंसती जा रही हैं। मीडिया के सर्वव्यापकता के कारण आज की सत्तारूढ़ कांग्रेस वह सब कुछ छुपा पाने में नाकाम है जो श्रीमती इंदिरा गांधी के समय किया जा सका था। इस सत्तारूढ़ संप्रग (कांग्रेस) की कार्य प्रणाली लगभग वही दशकों (पीढ़ीयों) पुरानी है लेकिन मीडिया के जागरण और सोशल मीडिया के प्रभाव के कारण आज वह सब कुछ छुपाना असंभव है। इसलिए प्रश्न सिर्फ लोकपाल या जनलोकपाल को लेकर नहीं है अथवा बात सिर्फ भ्रष्टाचार के दायरे में ही नही रह गया है। भारतीय जनमानस की संवेदनाओं को प्रभावित कर सकने वाली इन उपकरणों के कारण आज एक व्यापक जनजागरण हुआ है और सरकार को यह मानना होगा कि लोकशाही ही सर्वोच्च है और सभी को उसका सम्मान करना ही होगा।


इस पूरे ऑदोलन के गैर-राजनीतिक होने के कारण ही इसे व्यापक जनसमर्थन मिला। अब जब टीम अण्णा ने कांग्रेस से नाराज होकर आगामी पांच राज्यों के चुनाव में कांग्रेस के विरोध में प्रचार करने का मन बनाया है तो इस बात का आकलन करने का समय आ गया है कि चुनावों में टीम अन्ना के कांग्रेस विरोधी मुहिम का कितना प्रभाव पड़ेगा। वोटरों के लिये य़ह एक दुविधापूर्ण स्थित है। आम वोटर अगर कांग्रेस का विरोध करे तो समर्थन किसका करे? इसका सीधा फायदा जहां स्थानीय प्रमुख विपक्षी दलों को हो सकता है वहीं कई राज्यों में यह गणित सभी दलों और वोटरों को उलझा भी सकता है। अगर यह मान लिया जाये कि अण्णा कि मुहिम से प्रभावित होकर ज्यादातर मतदाता कांग्रेस को वोट नहीं देते हैं तो उनके पास विकल्प क्या बच जाते हैं? समाज के एक बहुत बड़े तबके में प्रमुख विपक्षी दल भाजपा की छवि अभी भी सांप्रदायिक एवं अविशवशनीय ही है- ऐसी स्थित में वोटर तीसरे विकल्प की तलाश में क्षेत्रीय दलों या फिर निर्दलीय नेता को वोट देंगे। इस प्रकार मुस्लिम बहुल और गैर भाजपाई क्षेत्रों से कुछ ऐसे लोग चुनकर विधान सभाओं में होंगे जो किसी के प्रति जिम्मेदार नहीं होंगें। इस प्रकार कोई भी एक पार्टी बहुमत में होगी यह सोचना भी बेमानी होगी। इस प्रकार 4-5 छोटी पार्टियों और निर्दलीय से मिलकर बनी सरकार न तो स्थायी होगी और न ही उनके पास विकास का कोई अजेंडा होगा। बनते बिगड़ते समीकरणों में सभी अपने निजी स्वार्थ साधने की कोशिस करेंगे और संबधित राज्यों में विधायकों के खरीद-फरोख्त का खेल चल पडेगा। इससे भ्रष्टाचार ब़ढेगा, अराजकता फैलेगी और शासन विफल होगा। फलतः जनता अपने को ठगी महसूस करेगी और ऐसी स्थिति की परिकल्पना शायद टीम अन्ना ने न की हो।


जब तक राइट टू रिजेक्ट और राइट टू रिकाँल जैसे कानून भारत में लागू नहीं हो जाते हैं तब तक विधानसभा या सांसद सदस्यों को आप जिम्मेदार नहीं बना सकते है। इसलिए वोटरों का किसी एक पक्ष में ध्रुवीकरण जहां असरकारक होगा वहीं किसी एक पक्ष के विरोध में वोटों का बंटवारा कर आप उस दल को सजा तो दे सकते हैं परंतु किसी मुकाम पर नहीं पहुंच सकते। एक स्वस्थ राजनीतिक उद्देश्य के लिए आपको वोटरों के सम्मुख एक विकल्प देना ही होगा अगर आप उनसे एक विकल्प वापस ले रहें है। हालांकि इससे टीम अन्ना का राजनीतिकरण हो जाएगा और हो सकता है इसके साईड इफेक्टस भी हों। इससे बचने के लिए कई उपाय हो सकते है जिसपर चर्चा और मंथन जरुरी है। हम कह सकते हैं कि भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का कांग्रेस के प्रति गुस्सा जहां एक तरफ नैसर्गिक है वहीं उसके तरीकों और उससे उपजे परिणाम की परिकल्पना भी जरुरी है।