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दोषी कौन - मुद्रा, मुद्रण या प्रणाली

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हिन्दी शब्दकोश में ‘मुद्रा’ शब्द की कई परिभाषा उल्लेखित है। मुद्रा का मतलब – अर्थ या करेंसी। जिससे बना है शब्द आर्थिक। आर्थिक अर्थात् धन से संबंधित पहलू। ‘मुद्रा’ से हम किसी व्यक्ति के ‘चेहरे’ का भी तात्पर्य निकालते हैं। नाट्य-प्रस्तुतियों में मुद्रा का अर्थ ‘भाव-भंगिमा’ होता है, जिसे हम अंग्रेजी में फेसियल-एक्सप्रेशन भी कहते है। जब कभी मुद्रा अर्थात् ‘चेहरे’ की प्रतिक्रिया परिस्थिति के प्रतिकूल हो तो इसे ‘मुद्रा दोष’ कहते हैं।

वैसे यहाँ हम भारतीय मुद्रा अर्थात् भारतीय करेंसी और उसके चेहरे पर उठे सवाल, मुद्रा-दोष की चर्चा कर रहे हैं। चिन्ह को भारत में पहली बार 2010 में आधिकारिक रूप से अपनाया गया। इससे पहले INR ही अंर्तराष्ट्रीय चिन्ह ISO के रूप में स्वीकृत थी। आज देश में 1, 2, 5, 10, के आलावा 20, 50, 75, 100, 150 और 1000 के सिक्के भी मान्य हैं। परंतु 20 या उससे अधिक मूल्य के सिक्कों का व्यावसायिक प्रचलन शुरू नहीं किया गया है और सिर्फ प्रतीकात्मक स्वरूप में ऐसे कुछेक सिक्के ही जारी किये गये हैं। 

वर्तमान में भारत में ₹5, ₹10, ₹20, ₹50, ₹100, ₹500 and 1000 रूपये के नोट छापे जाते हैं। भूटान और नेपाल भारतीय मुद्रा का सबसे बड़ा गैर-आधिकारिक अंतराष्ट्रीय बाजार है। वहाँ के अधिकतर बाजारों में भारतीय मुद्रा सर्वग्राहा हैं। 

पिछले दिनों भारतीय रिजर्व बैंक(आर.बी.आई.)की घोषणा के अनुसार बर्ष 2005 के बाद के छपे नोट जुलाई 2014 के बाद अस्वीकार्य हो जायेंगे और किसी भी मूल्य के 10 से अधिक नोट बैंक पहचान-पत्र सरीखे सबूतों के साथ ही लेंगे। कालेधन को सर्कुलेशन से बाहर रखने के इस नुस्खे के पक्ष में तर्क दिये जा रहे हैं कि नाजायज तरीके से कमाया पैसा प्राय: लोग नगद रूप में अपने पास ही रखते हैं। इसलिए पुराने नोटों का चलन बंद हो जाने के बाद लोग अपनी काली कमाई बाहर निकालना शुरू कर देंगे। इस तरह नकली नोटों का चलन भी बाजार में नहीं रह पाएगा। कालेधन को सर्कुलेशन से बाहर किये जाने के इस पद्धति से कमजोर आर्थिक वर्ग के लोग यकीनन परेशान हो जायेंगे। 

आर.बी.आई. खुद स्वीकारती है कि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों की पहुँच नहीं है। देश की एक बड़ी आबादी के आस-पास बैंक की शाखाएं नहीं है। देश के ग्रामीण दिहाड़ी मजदूर, जनजातीय आबादी, कृषि मजदूर, पहाड़ी क्षेत्रों के निवासी समेत एक बड़ी आबादी अपनी खून-पसीने की कमाई से बूंद-बूंद बचाकर अपनी नगदी कमाई अनाज की बोरियों में, बिस्तर में, पुरानी संदूकों आदि में सुरक्षित रखता है। दूर-दराज के ऐसे लोग अपनी पूरी जीवन की नगदी कमाई लेकर 10-20 किलोमीटर दूर बैंक की दहलीज तक पहुँचे, अपने पुराने नोट बदलवाये और सुरक्षित तरीके से वापस अपने घरों तक पहुँचे, यह एक बड़ा सवाल है। क्या यह सब काली कमाई है? 

भ्रष्ट रास्तों से अर्जित धन नगदी के रूप में हो यह तर्कसंगत है परंतु हर नगदी धन नाजायज हो यह जरूरी नहीं। भारत जैसे वृहद देश में हजारों की संख्या में ऐसे धर्मस्थल हैं जिनके दान-पात्रों में करड़ों-अरबों रूपये नगदी पड़े हैं। इनमें से ज्यादातर धर्मस्थलों का कोई बैंक अकाउंट नही है। क्या धर्मस्थलों की यह कमाई भी काली है? 

यदि यह सारी नगदी बैंकों तक पहुँचने लगे तो यकीन मानिये इतने बड़े पैमाने पर नये नोट छापने पड़ेंगे कि देश की आर्थिक सेहत ही बिगड़ सकती है। वक्त का तकाजा है कि पहले बैंकिग को सर्वसुलभ बनाया जाये। लोगों को अनिवार्य रूप से जोड़ा जाये। पूरी प्रणाली सरल की जाये ताकि शिक्षित-अशिक्षित सभी वर्ग उसमें यकीन कर सके। ताकि पैसा दीवारों और संदूकों में गुमसुम कैद न रहे। इसलिए ‘मुद्रा’ और उसके 'मुद्रण' को सुधारने के पहले भारतीय बैंकिग प्रणाली को अपनी ‘मुद्रा-दोष’ सुधारनी होगी।

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राहुल की चुनावी ईंधन

बारहमासी को अंग्रेजी में ऐवरग्रीन कहा जाता है। भाषा कोई भी हो अर्थ यह कि जो बर्ष के सभी 12 माह चले। परंतु बीते बर्षों में सब्सीडाइज्ड दर पर मिलनेवाले घरेलू ईंधन/एलपीजी सिलेंडरों की संख्या को 12 से कम कर दिया गया। इससे स्पष्ट हो गया कि वर्तमान सरकार इस देश में आम अवाम की रसोई को भी ऐवरग्रीन नहीं रहने देगी।

इस देश में नेताओं और जनता को सब्सीडी और राशनिंग से अत्यधिक प्रेम है। इसलिए सब्सीडी में फेरबदल कालांतर में भी ज्वलंत मुद्दा था और आज भी। हाँ, वक्त के साथ इसका आवेश कम जरूर हुआ है। फिर भी इस सब्सीडी की जादू का असर देखिए कि पिछले 2 बर्षों से यूपीए2 की सरकार घरेलू एलपीजी सिलेंडरों पर सब्सीडी देने और न देने के बीच पूरी तरह फंस चुकी है। असमंजस और अनिर्णय के हालात यह कि असीमित सिलेंडरों से साल में मात्र 6 सिलेंडर का कठिन निर्णय ले चुकी केंद्र चंद महीनों में ही इसे 9 तक ले आई।

फिर, अब लोकसभा चुनावों की दस्तक के साथ ही कांग्रेस को यह एहसास हुआ कि जनता का एक बड़ा वर्ग इस निर्णय से दुखी है, तो उसने राहुल गाँधी को जनता की हितैषी बताकर आगे कर दिया। बीते माह 17 जनवरी को तालकटोरा स्टेडियम में हुए कांग्रेस अधिवेशने में राहुल ने अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी। ओजस्वी भाषण दिया। और, वहीं बैठे प्रधानमंत्री से माँग कर दी की सालाना मिलनेवाले सब्सीडाईज्ड सिलेंडरों की संख्या बढ़ाकर 12 कर दी जाये, ताकि आमलोगों की ईंधन पर सालाना खर्च कुछ कम हो सके।

हालांकि यह पूरी नाट्य-प्रस्तुति मीडिया और जनता भी भांप रही थी और यह उसी वक्त तय माना गया कि संख्या बढ़ जायेगी। खैर, संख्या भी बढ़ गयी। और सालाना सब्सीडी बढ़ गई। अब देखना दिलचस्प रहेगा कि तीन सिलेंडरों का रियायती ईंधन राहुल के चुनावी सफर में कितना ईंधन डाल पाती है।

आजादी के शुरूआती बर्षों से ही देशवासियों को सब्सीडाईज्ड रेट पर गेहूँ, चावल, कपड़ा, कापी, किरासन आदि बाँटने की परंपरा शुरू हो गई थी। 1990 तक पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम या पीडीएस या बोलचाल की भाषा में कहें तो कंट्रोल की दुकानों पर लंबी कतार देखने को मिल जाती थी। धीरे-धीरे पीडीएस से सामानों को हटाया गया और बाद में पूरे मध्यम वर्ग को। फिर, पीडीएस सहित कई अन्य माध्यमों और योजनाओं से गरीबों को सब्सीडाईज्ड दर पर ये सामान उपलब्ध कराये गये।

2011 तक इस देश में पेट्रोल, डीजल और गैस पर भी सब्सीडी थी और ये तीन सब्सीडी सबसे बेहतरीन तरीके से आम लोगों तक बिना किसी धांधली के पहुँच रही थी। साथ ही यह आम आवाम को सबसे आसानी से असीमित उपलब्ध थी। यूपीए-2 के दौरान भ्रष्टाचार ने नये कीर्तिमान स्थापित किये। इस कारण सरकारी खजाने में भारी सेंध लगी। वैचारिक पक्षाघात से जूझती सरकार ने इस घाटे को सब्सीडी के कटौती से पाटना शुरू किया। पेट्रोल-डीजल से सब्सीडी हटायी जाने लगी। भारी विरोध होता रहा। जनता मिमियाती रही। परंतु सरकार ने बेहतर भविष्य और कठिन निर्णय का हवाला देकर मनमानी करती रही।

परंतु इन तीन सिलेंडरों से सरकार ने अपनी किरकिरी ही करवाई है। जिन्हें फायदा हुआ है वह भी सरकार को कोस रहे है। वैसे आम जनता में एक और भय यह कि चुनावी ईंधन की जरूरत खत्म होते ही कांग्रेस फिर उनकी रियायती ईंधन छीन लेगी।
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