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वैसे यहाँ हम भारतीय मुद्रा अर्थात् भारतीय करेंसी और उसके चेहरे पर उठे सवाल, मुद्रा-दोष की चर्चा कर रहे हैं।₹ चिन्ह को भारत में पहली बार 2010 में आधिकारिक रूप से अपनाया गया। इससे पहले INR ही अंर्तराष्ट्रीय चिन्ह ISO के रूप में स्वीकृत थी। आज देश में ₹1, ₹2, ₹5, ₹10, के आलावा ₹20, ₹50, ₹75, ₹100, ₹150 और ₹1000 के सिक्के भी मान्य हैं। परंतु ₹20 या उससे अधिक मूल्य के सिक्कों का व्यावसायिक प्रचलन शुरू नहीं किया गया है और सिर्फ प्रतीकात्मक स्वरूप में ऐसे कुछेक सिक्के ही जारी किये गये हैं।
वर्तमान में भारत में ₹5, ₹10, ₹20, ₹50, ₹100, ₹500 and ₹1000 रूपये के नोट छापे जाते हैं। भूटान और नेपाल भारतीय मुद्रा का सबसे बड़ा गैर-आधिकारिक अंतराष्ट्रीय बाजार है। वहाँ के अधिकतर बाजारों में भारतीय मुद्रा सर्वग्राहा हैं।
पिछले दिनों भारतीय रिजर्व बैंक(आर.बी.आई.)की घोषणा के अनुसार बर्ष 2005 के बाद के छपे नोट जुलाई 2014 के बाद अस्वीकार्य हो जायेंगे और किसी भी मूल्य के 10 से अधिक नोट बैंक पहचान-पत्र सरीखे सबूतों के साथ ही लेंगे। कालेधन को सर्कुलेशन से बाहर रखने के इस नुस्खे के पक्ष में तर्क दिये जा रहे हैं कि नाजायज तरीके से कमाया पैसा प्राय: लोग नगद रूप में अपने पास ही रखते हैं। इसलिए पुराने नोटों का चलन बंद हो जाने के बाद लोग अपनी काली कमाई बाहर निकालना शुरू कर देंगे। इस तरह नकली नोटों का चलन भी बाजार में नहीं रह पाएगा। कालेधन को सर्कुलेशन से बाहर किये जाने के इस पद्धति से कमजोर आर्थिक वर्ग के लोग यकीनन परेशान हो जायेंगे।
आर.बी.आई. खुद स्वीकारती है कि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों की पहुँच नहीं है। देश की एक बड़ी आबादी के आस-पास बैंक की शाखाएं नहीं है। देश के ग्रामीण दिहाड़ी मजदूर, जनजातीय आबादी, कृषि मजदूर, पहाड़ी क्षेत्रों के निवासी समेत एक बड़ी आबादी अपनी खून-पसीने की कमाई से बूंद-बूंद बचाकर अपनी नगदी कमाई अनाज की बोरियों में, बिस्तर में, पुरानी संदूकों आदि में सुरक्षित रखता है। दूर-दराज के ऐसे लोग अपनी पूरी जीवन की नगदी कमाई लेकर 10-20 किलोमीटर दूर बैंक की दहलीज तक पहुँचे, अपने पुराने नोट बदलवाये और सुरक्षित तरीके से वापस अपने घरों तक पहुँचे, यह एक बड़ा सवाल है। क्या यह सब काली कमाई है?
भ्रष्ट रास्तों से अर्जित धन नगदी के रूप में हो यह तर्कसंगत है परंतु हर नगदी धन नाजायज हो यह जरूरी नहीं। भारत जैसे वृहद देश में हजारों की संख्या में ऐसे धर्मस्थल हैं जिनके दान-पात्रों में करड़ों-अरबों रूपये नगदी पड़े हैं। इनमें से ज्यादातर धर्मस्थलों का कोई बैंक अकाउंट नही है। क्या धर्मस्थलों की यह कमाई भी काली है?
यदि यह सारी नगदी बैंकों तक पहुँचने लगे तो यकीन मानिये इतने बड़े पैमाने पर नये नोट छापने पड़ेंगे कि देश की आर्थिक सेहत ही बिगड़ सकती है। वक्त का तकाजा है कि पहले बैंकिग को सर्वसुलभ बनाया जाये। लोगों को अनिवार्य रूप से जोड़ा जाये। पूरी प्रणाली सरल की जाये ताकि शिक्षित-अशिक्षित सभी वर्ग उसमें यकीन कर सके। ताकि पैसा दीवारों और संदूकों में गुमसुम कैद न रहे। इसलिए ‘मुद्रा’ और उसके 'मुद्रण' को सुधारने के पहले भारतीय बैंकिग प्रणाली को अपनी ‘मुद्रा-दोष’ सुधारनी होगी।
Amit Sinha is a bilingual Columnist. He can be contacted at facebook.amit
