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राहुल की चुनावी ईंधन

बारहमासी को अंग्रेजी में ऐवरग्रीन कहा जाता है। भाषा कोई भी हो अर्थ यह कि जो बर्ष के सभी 12 माह चले। परंतु बीते बर्षों में सब्सीडाइज्ड दर पर मिलनेवाले घरेलू ईंधन/एलपीजी सिलेंडरों की संख्या को 12 से कम कर दिया गया। इससे स्पष्ट हो गया कि वर्तमान सरकार इस देश में आम अवाम की रसोई को भी ऐवरग्रीन नहीं रहने देगी।

इस देश में नेताओं और जनता को सब्सीडी और राशनिंग से अत्यधिक प्रेम है। इसलिए सब्सीडी में फेरबदल कालांतर में भी ज्वलंत मुद्दा था और आज भी। हाँ, वक्त के साथ इसका आवेश कम जरूर हुआ है। फिर भी इस सब्सीडी की जादू का असर देखिए कि पिछले 2 बर्षों से यूपीए2 की सरकार घरेलू एलपीजी सिलेंडरों पर सब्सीडी देने और न देने के बीच पूरी तरह फंस चुकी है। असमंजस और अनिर्णय के हालात यह कि असीमित सिलेंडरों से साल में मात्र 6 सिलेंडर का कठिन निर्णय ले चुकी केंद्र चंद महीनों में ही इसे 9 तक ले आई।

फिर, अब लोकसभा चुनावों की दस्तक के साथ ही कांग्रेस को यह एहसास हुआ कि जनता का एक बड़ा वर्ग इस निर्णय से दुखी है, तो उसने राहुल गाँधी को जनता की हितैषी बताकर आगे कर दिया। बीते माह 17 जनवरी को तालकटोरा स्टेडियम में हुए कांग्रेस अधिवेशने में राहुल ने अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी। ओजस्वी भाषण दिया। और, वहीं बैठे प्रधानमंत्री से माँग कर दी की सालाना मिलनेवाले सब्सीडाईज्ड सिलेंडरों की संख्या बढ़ाकर 12 कर दी जाये, ताकि आमलोगों की ईंधन पर सालाना खर्च कुछ कम हो सके।

हालांकि यह पूरी नाट्य-प्रस्तुति मीडिया और जनता भी भांप रही थी और यह उसी वक्त तय माना गया कि संख्या बढ़ जायेगी। खैर, संख्या भी बढ़ गयी। और सालाना सब्सीडी बढ़ गई। अब देखना दिलचस्प रहेगा कि तीन सिलेंडरों का रियायती ईंधन राहुल के चुनावी सफर में कितना ईंधन डाल पाती है।

आजादी के शुरूआती बर्षों से ही देशवासियों को सब्सीडाईज्ड रेट पर गेहूँ, चावल, कपड़ा, कापी, किरासन आदि बाँटने की परंपरा शुरू हो गई थी। 1990 तक पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम या पीडीएस या बोलचाल की भाषा में कहें तो कंट्रोल की दुकानों पर लंबी कतार देखने को मिल जाती थी। धीरे-धीरे पीडीएस से सामानों को हटाया गया और बाद में पूरे मध्यम वर्ग को। फिर, पीडीएस सहित कई अन्य माध्यमों और योजनाओं से गरीबों को सब्सीडाईज्ड दर पर ये सामान उपलब्ध कराये गये।

2011 तक इस देश में पेट्रोल, डीजल और गैस पर भी सब्सीडी थी और ये तीन सब्सीडी सबसे बेहतरीन तरीके से आम लोगों तक बिना किसी धांधली के पहुँच रही थी। साथ ही यह आम आवाम को सबसे आसानी से असीमित उपलब्ध थी। यूपीए-2 के दौरान भ्रष्टाचार ने नये कीर्तिमान स्थापित किये। इस कारण सरकारी खजाने में भारी सेंध लगी। वैचारिक पक्षाघात से जूझती सरकार ने इस घाटे को सब्सीडी के कटौती से पाटना शुरू किया। पेट्रोल-डीजल से सब्सीडी हटायी जाने लगी। भारी विरोध होता रहा। जनता मिमियाती रही। परंतु सरकार ने बेहतर भविष्य और कठिन निर्णय का हवाला देकर मनमानी करती रही।

परंतु इन तीन सिलेंडरों से सरकार ने अपनी किरकिरी ही करवाई है। जिन्हें फायदा हुआ है वह भी सरकार को कोस रहे है। वैसे आम जनता में एक और भय यह कि चुनावी ईंधन की जरूरत खत्म होते ही कांग्रेस फिर उनकी रियायती ईंधन छीन लेगी।
Amit Sinha is a bilingual Columnist. He can be contacted at facebook.amit