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‘सेक्यूलरिज्म’ का तड़का और पिछड़ता विकास

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हाशिये पर विकास और 'सेक्यूलरिस्म' की ऊँची होती मीनार - एक बानगी
पटना में हवाई अड्डा बेहद खतरनाक स्थिति में है। हवाई अड्ड़ा के विस्तार के लिए जमीन चाहिए लेकिन राज्य सरकार की दिलचस्पी नहीं। एक साथ 3 से ज्यादा प्लेन ऱखे नहीं जा सकते। विमानन प्राधिकरण दशकों से कम से कम इतना जमीन तत्काल माँग रही है जिससे पार्किंग की समस्या हल हो सके। इतनी जमीन वहाँ पर मौजूद भी है। पर राज्य सरकार ने केंद्र से इसके लिए 85 करोड़ रूपये माँग कर दी है। सभी राज्य बेहतर विकास के लिए जमीन मुफ्त देते हैं पर सुशासन बाबू प्रोटाकाल के खिलाफ अड़े हुए हैं। 

परंतु यही सुशासन बाबू किशनगंज में अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी की स्थापना के लिए 224 एकड़ जमीन उपलब्ध करा देते हैं। कई संगठनों ने इस विश्विधालय की स्थापना का विरोध किया था। केंद्र भी आनाकानी कर रही थी। सहयोगी भी अ़ड़ंगा लगा रहे थे। परंतु 'सेकुलर प्रेम' के आगे सारे विरोध के बाबजूद जमीन मुहैया करायी गयी। जबरन जमीने छीनी गई। इन समाचारों को प्रकाशित होने से रोका गया। 


बीते बर्ष नीतिश कुमार ने अपनी पूरी राजनीतिक कमाई ‘सेक्यूलरिज्म’ के नाम कर दी। इरादा तो था कि दिल्ली की राजनितिक गलियारे में दस्तक दी जाये। इनकी यह ‘दाल’ तो नही गली परंतु लगता है ‘सेक्यूलरिज्म’ के बार-बार तड़का लगाने से इनकी पूरी ‘दाल’ ही ‘जल’ गयी। तमाम सर्वे और टीवी चैनल वाले लगातार बता रहे हैं कि बिहार में डपोरशंखी सुशासन की गूँज बंद होने वाली है। आगामी लोकसभा चुनावों में 4-5 सीटों तक समेटा जा सकता है ‘सुशासनी कुनबा’। 

बिहार के लोग राजनीतिक 'परिपक्व'
पिछले बर्ष नीतिश कुमार ने कहा था कि बिहार के लोग राजनीतीक रूप से परिपक्व हैं। यहाँ की जनता बखूबी समझती है। फिर सड़कों, पुल-पुलियों से लेकर नेशनल हाईवे को अपने दम पर सुघार कर लेने का दावा और वादा करने वाले 'हूजूर' आप यह जान लें और मान लें कि पटना से किसी भी दिशा में 25 कि.मी. की दूरी तय करने में आज भी कम-से-कम 2 घंटे लगते हैं और इस आंकड़े में ट्रैफिक जाम का योगदान शामिल नहीं है। इस व्याख्या से पटना को दिल्ली से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण एन.एच.30 ‘रास्ते’ की स्थिति भी शामिल है। 

दस सिरों वाला राक्षस
भारतीय गणतंत्र में ‘गण’ की भूमिका सर्वोच्च हो इसके लिए ‘तंत्र’ से भिड़ने वाले जनप्रिय नेता जयप्रकाश नारायण ही थे। इसी कारण उन्हे ‘लोकनायक’ भी कहा गया। जयप्रकाश नारायण(जेपी) ने एक बार कहा था कि "कांग्रेस क्या है ?? कांग्रेस कई सिरों वाला एक राक्षस है"। 
जेपी को गुजरे तो अब 34 बर्ष हो चुके, लेकिन खुद को जेपी के अनुयायी कहने वाले कुछ लोग बिहार में मूलतः दो ध्रुवों में बंट चुके हैं। इसमें एक कुनबा है जो सतासीन है, ‘सुशासनी’ होने की प्रक्रिया में यूँ मसगूल है कि मानो सुशासन की व्याख्या ही बदल डाले। जेपी के शागिर्दों का जो दूसरा घटक है उसने ही बिहार में ‘जंगलराज’ स्थापित किया था।


अब जेपी के द्दारा घोषित कांग्रेसी ‘राक्षस’ के ‘हमसफर’ बनने के लिए जेपी के ये दोनों शागिर्द इनदिनों संघर्षरत हैं। इसके साथ ही ‘लालटेन’ की ‘मद्धिम रौशनी’ से उकताए जिस आम जनता ने ‘तीरंदाजी’ कर इस सुशासन को समर्थन दिया था वे अब खुद ही ‘संपूर्ण क्रांति’ के वर्तमान सतासीन शागिर्दों के शिकार हैं।

लालूजी के समय सबसे बड़े खलनायक बन कर उभरे थे बाबू सुशासनी। और, अबकी फिर ‘खलनायक’ ही बताये जा रहें हैं। फर्क बस इतना की अबकी ये बिहार की शांतिपूर्ण जनता के खिलाफ ही ‘खलनायक’ बन चुके हैं। 2005 में इन्हें लालू-विरोध का एकमुश्त वोट मिला था न कि इनकी सृजनतामक्ता का। जनता लालू के खिलाफ हो गई थी क्योंकि अपराध बेलगाम था। परंतु इस 8 बर्ष में राज्य में अफसरसाही बेलगाम हुई, भ्रष्टाचार अपने चरम पर है, ब्लाक आफिसर से लेकर किरानी तक करोड़ों में खेल रहे हैं, सरकारी अस्पतालों की स्थिति राजद सरकार से भी बदतर है, विधालयों में शिक्षक नहीं आते, जो आते हैं वे खुद ही शिक्षित नहीं।

यूँ आया प्रदेश में सुशासन
नीतिश कुमार जैसे नेता कभी कभार पैदा होते हैं, इसलिए आज के दौर में बिहार तो छोडिए देश में कहीं भी ‘सुशासन बाबू’ कहा जाता है तो यकींन मानिये वे नीतिश कुमार ही हैं। इनके बारे में मशहूर रहा है कि इनके 8 सालों के शासन में बिहार सरकार के सभी सरकारी दस्तावेजों में ‘शासन’ और ‘प्रशासन’ की जगह ‘सुशासन’ शब्द दर्ज कर दिया गया है- तो हुआ न पूरा प्रदेश में ‘सुशासन’!

बहरहाल, इस सुशासनवाद का तीर्थस्थल है नालंदा। हर वक्त जबर्दस्त जलसे के लिए तैयार रहता है नालंदा। राजगीर में तमाम सुख-सुविधाओं से लैस अंर्तराष्ट्रीय स्तर का ऐसा कन्वेंशन सेंटर बनाया गया है जो राजधानी तक को मयस्सर नहीं। 

तमाम व्यस्तताओं के बावजूद सुशासन बाबू का ‘नालंदा प्रवास’ बताता है कि सुशासनी सरकार का ‘दिल’ नालंदा और राजगीर में ही बसता है। आज बिहार के इस गांव में एक साथ आधा दर्जन हेलिकॉप्टर उड़-उतर सकते हैं।

खैर इसी बहाने सही भोले-भाले ग्रामीणों में अभी तक खुशफहमी है कि यह सुशासनी सरकार गांव-गिरांव की हितैषी है, और इसी कारण अभी भी इस धरती पुत्र की आभा थोड़ी बची हुई है। ये मासूम लोग अबतक अपने ‘तीर्थंकरों’ को शायद नहीं पहचान पाये हैं।
Amit Sinha is a bilingual Columnist. He can be contacted at facebook.amit