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हे गंगा मईया !!!

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बीते दिसंबर नरेंद्र मोदी ने वाराणसी में ऐतिहासिक रैली की और अभूतपूर्व भीड़ ने उनका उत्साह बढ़ाया। वाराणसी रैली में नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में गंगा नदी का जिक्र क्या किया, राजनीतीक मठों में मानो भूचाल आ गया। भाजपा विरोधी लगभग सभी दलों ने इसे नरेंद्र मोदी का राजनैतिक स्टंट करार दे दिया। 

मुद्दे के रूप में किसी ने इसकी तुलना अयोध्या से की तो किसी ने इसे भगवा नीति का नया अंक बता दिया। अगर ऐसा मान भी लिया जाये तो इस बहाने ही सही नरेंद्र मोदी ने गंगा जैसी प्राणदायिनी नदी में बढ़ते प्रदूषण की ओर राष्ट्रीय बहस को मोड़ा तो सही। अमूमन हर धर्म, प्रांत या जाति के लोग गंगा की वर्तमान दुर्दशा पर दुखी हैं। निर्विवाद रूप से गंगा से देश की एक बड़ी आबादी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित है। फिर गंगा सफाई पर इतना विवाद क्यूँ?

संयुक्त राष्ट्र संघ दुनिया भर में जल-संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने को लेकर बर्ष 2013 को “जल सहयोग के अंर्तराष्ट्रीय वर्ष” के रूप में मना रही है। इस कारण भी नदियों की भूमिका पर चर्चा अहम है। अपने अनेकानेक औषधिक गुणों के कारण गंगा नदी के जल को पूरे विश्व के अन्य सभी नदियों से अधिक पवित्र माना गया है। वैज्ञानिक शोधों में बार-बार साबित हुआ है कि गंगा के जल में डिसौल्वड आक्सीजन की मात्रा काफी अधिक है जिसके कारण दूषित बैक्टीरिया लगातार मरते रहते हैं। परंतु सरकारी दोहन, शोषण और उदासीनता के कारण देश की पाँच प्रमुख राज्यों से होकर गुजरने वाली मोक्षदायिनी गंगा आज खुद मृतप्राय है। 

बनारस हिंदू विश्र्वविधालय के नामी-गिरामी प्रोफेसर बी.डी.त्रिपाठी के बर्षों के अथक प्रयासों के कारण ही भारतीय संसद ने पहली बार 1980 में गंगा के प्रदूषण पर चर्चा की। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की अगुआई में अप्रैल 1986 में पहली बार गंगा एक्शन प्लान(गैप) को अमलीजामा पहनाया गया। हालांकि गैप, व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई, और लगभग 1000 करोड़ की धन राशि की बंदरबांट हुई। अंततः सरकार को 31 मार्च 2000 को योजना वापस लेनी पड़ी। गैप की सफलता की दुबारा की गई कोशिसें(गैप-फेस2) भी औंधे मुँह गिरी और कुछ खास नहीं हो सका। केंद्र की उपेक्षा हालाँकि पूरी योजना पर अच्छी शुरूआती पहल के बावजूद केंद्र सरकार की अकर्मण्यता भी झलकने लगी है। बर्ष 2010 और 2011 की बार्षिक मीटिंग के बाद तीसरी बार बर्ष 2012 की मीटिंग समाजसेवी और मीडिया के दबाब में औपचारिकता बस रह पाई। जबकि पूरी परियोजना के क्रियान्वयन रिपोर्ट पर चर्चा और समीक्षा के लिए हर बर्ष बैठक होनी तय की गई थी। 

हिंदू संगठनों का बेसुरा राग 
बर्ष 2009, में जब अंर्तराष्ट्रीय टीवी चैनल "फौक्स न्यूज" ने अपने एक कार्यक्रम के दौरान गंगा को "रोगग्रस्त" बताया तो पूरे विश्व में हंगामा मचा और तमाम हिंदु संगठनों ने कटु शब्दों में इसकी निंदा की। परंतु, यह निर्बाध सत्य है कि गंगा को माँ का दर्जा देने वाले भारतीय संस्कृति में गंगा की सफाई को लेकर कोई भी गंभीर नही है। विसर्जन के नाम पर मूर्तियों से लेकर, पूजा सामग्री और कचरे से भरी प्लास्टिक की थैली अमूमन प्रत्येक गंगा तट के आम दृश्य बन चुके हैं। शिक्षित और प्रबुद्ध नागरिक को भी परंपरा के नाम पर ऐसी आदतों से गुरेज नही है। लावारिस और अधलशी लाशों को अनेकों बार चोरी-छुपे गंगा में बहा दिया जाता है, जो गंगा के लिए सर्वाधिक दूषण का कारण बन चुका है। 
मृतकों को गंगा-निर्वाण 
अंधविश्वास कहें या धार्मिक आस्था, भारत में कुछेक धर्मों में 12 बर्ष से कम उम्र के बच्चे का दाह-संस्कार न कर उसे गंगा में प्रवाहित करने की प्रथा है। सर्प-दंश से हुई मृतकों के शव को दुबारा प्राण संचरण की आस में गंगा की गोद ही नसीब होती है। कई लोग अपने मृत पालतू पशुओं को भी गंगा में बहा देते हैं। लेकिन इन सब को रोकने के लिए न तो केंद्र ने और न ही बिहार सरकार ने अबतक कोई पहल की है। जरूरत है कि जागरूकता अभियान चलाकर ऐसी कुप्रथाओं को खत्म किया जाये। 

गंगा सफाई की आड़ में धन की गंगा 
केंद्र ने 23 अक्टूबर 2010 को सर्वोच्च न्यायालय में शपथ-पत्र दाखिल कर कहा कि बर्ष 2020 तक गंगा को प्रदूषण मुक्त कर लिया जायेगा। केंद्र की आर्थिक कैबिनेट कमिटी ने अप्रैल 2011 में गंगा की सफाई के लिए पूरी परियोजना पर 7000 करोड़ की भारी-भरकम राशि आवंटित की थी। पूरी राशि का 75% अंशदान केंद्र प्रायोजित था और राज्यों को उनके प्रदेश में होने वाली विश्व बैंक ने इस योजना पर एक बिलियन डालर(5600 करोड़ रूपये) की ऋण मंजूर की है। अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर नदियों की सफलतम सफाई योजनाओं से प्रेरित होकर इस परियोजना में यह भी ध्यान रखा गया कि उन गलतियों की पुनरावृति नहीं होने पाये जैसा गंगा एक्शन प्लान पर हो चुका है। इसके लिए प्रोजेक्ट में तय किया गया कि पहले पानी की सफाई की जायेगी। इसके लिए गंगा के उद्गम से लेकर बंगाल की खाड़ी तक पड़ने वाले छोटे-बड़े शहरों में सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट की स्थापना होनी थी। 

बिहार की स्थिति 
गंगा नदी की सफाई को लेकर केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के अंतर्गत, फरवरी 2009 में अत्यंत महत्वकांक्षी नेशनल गंगा रीवर बेसिन परियोजना(NGRBP) को किर्यान्यवित किया गया। जिसे बिहार सहित कुल पांच राज्यो में बर्ष 2009 में एक साथ लागू किया गया था। प्रधानमंत्री को NGRBP के अध्यक्ष बनाने के साथ ही बिहार समेत यूपी, उतराखंड, झारखंड और पं.बंगाल(गंगा के गुजरने वाले रास्ते) के मुख्यमंत्रियों को अथारिटी का सदस्य बनाया गया। ज्ञातत्व है कि योजना खर्च का सिर्फ 25% राशि ही राज्य सरकार को देना है और शेष भार केंद्र उठा रही है। परंतु बिहार में गंगा की सफाई को लेकर जो उदासीनता व्याप्त है वह हतप्रभ कर देने वाली है। इस परियोजना के अनुपालन में जहाँ देश के अन्य राज्यों की स्थिति कमोबेश ठीक है वहीं बिहार की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। 

बिहार में गंगा आज भी बदस्तूर मैली की जा रही है। साथ ही गंगा तटों पर गंदगी और बदबू से बुरा हाल है। छोटे-बड़े उद्दोगों से लेकर गाँव-शहरों की गंदगी बेरोकटोक गंगा में गिराई जा रही है। इससे राज्य सरकार की कार्यदक्षता सवालों के घेरे में है। राज्य शहरी विकास मंत्रालय के अंतर्गत आनेवाली इस पूरी परियोजना के क्रियान्वन की जिम्मेदारी बिहार शहरी आधारभूत विकास कारपोरेशन(BUIDCo) को सौंपी गई है। इस पूरी परियोजना का मकसद था कि शहरों से निकले सीवर के पानी ट्रीटमेंट के बाद ही गंगा में डाले जाये। इसके लिए बिहार में पटना, बेगूसराय, बक्सर, हाजीपुर, मुँगेर को में सीवरेज नेटवर्क और सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट(STP) बनने थे। पटना में सैदपुर, बेउर, पहाड़ी, कंकडबाग और करमलीचक में सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट(STP) बनाये गये जिनकी संयुक्त क्षमता 119 MLD(Million Litre per Day) है। इन सब पर 200 करोड़ रूपये भी खर्च हो गए और अत्यंत खराब नतीजों को छुपाने की कोशिसें की जाने लगी। बाद में उच्चाधिकारियों ने पूरी योजना को ही तकनीकी रूप से दोषपूर्ण बता दिया। इसके बाद इंजीनीयरों ने नया तरीका इजाद किया और फिर से डीपीआर(Detailed Project Report) तैयार करने का फार्मूला सुझाया। अब टेंडर निर्गत होने का इंतजार है। ज्ञातव्य है कि बिहार सरकार डीपीआर तैयार करने पर अन्य राज्यों की तुलना में दुगुनी-तिगनी राशि खर्च करती है, जिसपर कई सवाल पहले भी उठते रहे हैं। 
इस प्रकार बिहार में जिस संदिग्ध तरीके से इस योजना पर काम चल रहा है उसे लेकर पूरी परियोजना की असफलता अभी से तय माऩये। अधिकारियों के उदासीन रवैये और प्रबंधनीय नाकामी को देखकर यह कहना कतई मुश्किल नहीं है कि गंगा सफाई के इस अभियान में केंद्र से चली 'फंड की गंगा' बिहार में व्यापत 'भ्रष्टाचार की कई खाड़ियों' में समा रही है।
Amit Sinha is a bilingual Columnist. He can be contacted at facebook.amit