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Right To CORRECT

निर्वाचित प्रतिनिधियों को वापस बुलाने (राइट टू रिकॉल) और चुनाव में खङे किसी भी प्रतिनिधि को नही चुनने (राइट टू रिजेक्ट) के अधिकार के मुद्दे पर जहाँ आम जनता समर्थन करती दिख रही है वहीं मुख्य निर्वाचन आयुक्त का बयान चुनाव आयोग का नहीं वरन् कांग्रेस का विचार मालूम पङता है।

आम भारतीय जनमानस शायद कांग्रेस के कुकृत्यों को जल्दी भुल जाती है। फिर भी लोगों को याद होगा कि अगस्त 1996 में CBI ने कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व टेलीकॉम मंत्री सुखराम के घर से 4.25 करोड़ रुपये बरामद किए. आय से अधिक समाप्ति के मामले में फरवरी 200२ में दिल्ली की एक अदालत उन्हें तीन साल कैद और 2 लाख रुपये नगद की सजा सुना चुकी है. बड़े बड़े सूटकेसों में ठूंस कर रखे गए करोङों रुपये और संबंधित कागजात उस समय तक की CBI की सबसे बङी बरामदगी थी। क्या ऐसे सांसदो को वापस बुलाने का अधिकार जनता के पास नहीं होना चाहिए ?

चुँकि कांग्रेस ने भारत पर सर्वाधिक शासन किया है इसलिए नैसर्गिक रूप से यह उसकी जिम्मेदारी है कि देश में हुए घोटालों पर सफाई दे। चुँकि ज्यादातर घोटाले कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में हुए इसलिए आम मानसिकता जो भी भ्रष्टाचार के खिलाफ है - कांग्रेस के खिलाफ खङी दिखती है। जिसे कांग्रेस अपने प्रति विरोधियों कि घृणा समझती है।इस संदर्भ में महान समाजवादी ङा. लोहिया ने कहा था - "घृणा नहीं लक्ष्य - कांग्रेस के प्रति घृणा ही मेरा मूल लक्ष्य होता तो मैं एक हजार वर्ष पहले या पीछे के इतिहास के बारे में चिंतित क्यों होता?

व्यवस्था की असहजता और अनभिज्ञता ही जनता की उदासीनता का कारण होती है. राजनीति से आम लोगों की दूरी सत्ता को अनियमित, अनियंत्रित और अभिमानि बनाती है. बीते अगस्त महीने में भ्रष्टाचार के खिलाफ अण्णा के अनसन-आंदोलन के दौरान कांग्रेस का सत्ता अभिमान और उसकी हठधर्मिता भारत की आम जनता देख चुकी है. भारतीय राजनीती में कांग्रेस की हठधर्मिता बहुत पुरानी हैं और यह शायद उसे विरासत में मिली है। इन्हीं कारणों से आजादी के पहले एवं तुरंत बाद जवाहरलाल नेहरु का राष्ट्रीय स्तर के सभी दिग्गज नेताओं से मनमुटाव रहा। इन्हीं कारणों से मार्च 1948 कांग्रेस समाजवादी पार्टी का कांग्रेस से रिश्ता खत्म करने का निर्णय लिया गया। स्वतंत्र भारत के राजनैतिक इतिहास में दल खंडित होने की यह पहली घटना थी.

कांग्रेस सरकार आपने प्रारंभिक दौर से ही संभवतः दुनिया की सबसे असहिष्णु और संवेदनहीन लोकतान्त्रिक सरकार रही है। कांग्रेस की असहिष्णुता अरब और मिस्र की तानाशाही सरकारों को भी मात देनेवाली है। यही कारण है कि आ़ज के दौर में इस कांग्रेस सरकार के इशारे पर जहाँ बाबा रामदेव के शिविर पर रात के १ बजे दिल्ली पुलिस हमला कर एक निर्दोष महिला समर्थक राजबाला की हत्या कर देती है, वहीं 1960-70 के दौर में अपने तत्कालीन प्रबल विरोधी राम मनोहर लोहिया को सरकरी अस्पताल में मरने के लिए छोड़ देती है। राम मनोहर लोहिया जैसे दिग्गज समाजवादी नेता दिल्ली के वेलिंग़टन अस्पताल में उचित इला़ज के अभाव में दम तोङ देते हैं। उनकी मृत्यु की जांच कर रहे समिति के निष्कर्षो के मुताबिक रोगाणु विनाशक व्यवस्था के न होने और डॉक्टरों और अधिकारियों की लापरवाही के कारण ङा.लोहिया की मौत हुई.


कोई भी भ्रष्ट सरकार और उनका गठबंधन चाहे वह आंतरिक हो या बाह्य जल्दी नही टूटती हैं क्योंकि यहाँ उनके कारिंदों को लूट कि छूट होती है और इस प्रकार वे पाँच साल तक जनता का खून चुस्ती रहती हैं। प्रधानमंत्री का गठबंधन राजनीति की मजबूरी गिनाने के पीछे निशिचत ये तर्क ही हैं। परन्तु अन्ना के आंदोलन के बाद से भारतीय मानस ने ऐसे विक्लपों की तलाश शुरू कर दी है जिससे भ्रष्ट सरकारों को हटाने की प्रक्रिया आसान हो सके। निर्वाचित प्रतिनिधियों को वापस बुलाने(राइट टू रिकॉल) और चुनाव में खङे किसी भी प्रतिनिधि को नही चुनने(राइट टू रिजेक्ट)जैसे नागरिकों के अधिकार के विकल्प सांसदों के आचरण और उनकी जनता के प्रति जिम्मेदारी को सही मायनों में प्रतिबिंबित करेंगे। सही मायनों में ये अधिकार "right to recall" या "right to reject" नहीं बल्कि सांसदों और सरकार को "सुधारने वाला" यानी "right to CORRECT" होगा, वह भी बिना पाँच साल के इंतज़ार के.

Power Musings In Gujrat

विगत 30 सितम्बर को भारतीय पुलिस सेवा के 1988 बैच के निलंबित अधिकारी संजीव भट्ट को गुजरात पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया जाना भारतीय लोकशाही में प्रशासनिक तंत्र के राजनैतिक दुरूपयोग का नवीनतम उदाहरण है. गुजरात दंगो के दौरान संजीव् भट्ट राज्य के खुफिया विभाग में आंतरिक सुरक्षा उपायुक्त थे. सरकारी आंकड़ो के अनुसार लगभग 1200 लोग इस दंगे में मारे गए थे.
भारतीय पुलिस सेवा के निलंबित अधिकारी संजीव भट्ट उस समय मीडिया के सुर्ख़ियों में आ गए जब उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में एक हलफनामा दायर कर गुजरात के 2002 के सांप्रदायिक दंगो के लिए सीधे तौर पर मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को दोषी बताया. आरोपों के अनुसार, श्री संजीव भट्ट उन पुलिस पदाधिकारियों में से एक हैं जिन्हें दंगो के दौरान राजनैतिक दबाब के कारण उचित प्रशासनिक करवाई करने से रोका गया. संजीव भट्ट की पत्नी स्वेता का आरोप है की नरेन्द्र मोदी के खिलाफ खड़े होने के कारण उनके पति को अनर्गल आरोपों में फंसाया जा रहा है.

उन्होंने संजीव भट्ट को मारने की साजिश का आरोप गुजरात पुलिस पर लगाया है. गुजरात पुलिस की विश्वसनीयता को देखते हुए, अहमदाबाद के पुलिस कमिसनर सुदेश सिन्हा का बयान की श्री भट्ट की जान को कोई खतरा नहीं है, शायद ही श्री भट्ट की पत्नी को भरोसा दिला पाए. राजनीतिक गलिआरों में आम चर्चा है की श्री भट्ट को निर्भीक अधिकारी होने की सजा दी जा रही है. स्वेता का आरोप है की श्री भट्ट को रातों रात क्राईम ब्रांच शिफ्ट किया जाना उन्हें जान से मरने की कोशिश है. ज्ञातत्व है की क्राईम ब्रांच पेशेवर अपराधी एवं राष्ट्रीय सुरक्षा से सम्बंधित अपराधों के लिए ही बनी है, ऐसे में एक पुलिस अधिकारी जिसपर एक कनिष्ठ अधिकारी को धमकाने और शपथ पत्र पर जबरदस्ती हस्ताक्षर करने का आरोप है, को अचानक क्राईम ब्रांच में शिफ्ट किया जाना तर्कसंगत नहीं है और निश्चित तौर पर यह कदम प्रशासनिक कम और राजनीति से प्रेरित ज्यादा है. ऐसे में गुजरात क्राईम ब्रांच जिसकी पृष्ठभूमि फर्जी मुठभेड़ों से भरी पड़ी है पर भरोसा नहीं किया जा सकता है.

गुजरात प्रशासन का यह कदम उसकी दागदार छवि को और भी गंद आवरण से ढक देगा और मुख्यमंत्री मोदी के सदभावना उपवास के मूल उद्धेश्य को कुचल देगा. नरेन्द्र मोदी की सर्वग्रहता राष्ट्रीय और गुजरात के स्तर पर तभी संभव है जब वे सहिस्नुता का परिचय अपने आचरण में लागू करें. श्री भट्ट के आवास पर लगातार छापेमारी कर उन्हें और उनके परिवार को मानसिक तौर पर प्रताड़ित करना किसी बेहतर प्रशासनिक प्रबंधन का हिस्सा नहीं हो सकता. बदले की भावना से किये जाने वाले ये कार्यवाई निश्चित ही कुंद मानसिकता का प्रतीक हैं. मोदी को ऐसे प्रशासनिक हथकंडो को छोड़ कर लोकतान्त्रिक तरीकों से ही अपने को साबित करना होगा तभी उनकी सर्व्भोमिकता साबित होगी अन्यथा गुजराती मानस पटल पर भी वो अपनी छवि धूमिल कर बैठेंगे.