विगत 30 सितम्बर को भारतीय पुलिस सेवा के 1988 बैच के निलंबित अधिकारी संजीव भट्ट को गुजरात पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया जाना भारतीय लोकशाही में प्रशासनिक तंत्र के राजनैतिक दुरूपयोग का नवीनतम उदाहरण है. गुजरात दंगो के दौरान संजीव् भट्ट राज्य के खुफिया विभाग में आंतरिक सुरक्षा उपायुक्त थे. सरकारी आंकड़ो के अनुसार लगभग 1200 लोग इस दंगे में मारे गए थे. 
भारतीय पुलिस सेवा के निलंबित अधिकारी संजीव भट्ट उस समय मीडिया के सुर्ख़ियों में आ गए जब उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में एक हलफनामा दायर कर गुजरात के 2002 के सांप्रदायिक दंगो के लिए सीधे तौर पर मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को दोषी बताया. आरोपों के अनुसार, श्री संजीव भट्ट उन पुलिस पदाधिकारियों में से एक हैं जिन्हें दंगो के दौरान राजनैतिक दबाब के कारण उचित प्रशासनिक करवाई करने से रोका गया. संजीव भट्ट की पत्नी स्वेता का आरोप है की नरेन्द्र मोदी के खिलाफ खड़े होने के कारण उनके पति को अनर्गल आरोपों में फंसाया जा रहा है.
उन्होंने संजीव भट्ट को मारने की साजिश का आरोप गुजरात पुलिस पर लगाया है. गुजरात पुलिस की विश्वसनीयता को देखते हुए, अहमदाबाद के पुलिस कमिसनर सुदेश सिन्हा का बयान की श्री भट्ट की जान को कोई खतरा नहीं है, शायद ही श्री भट्ट की पत्नी को भरोसा दिला पाए. राजनीतिक गलिआरों में आम चर्चा है की श्री भट्ट को निर्भीक अधिकारी होने की सजा दी जा रही है. स्वेता का आरोप है की श्री भट्ट को रातों रात क्राईम ब्रांच शिफ्ट किया जाना उन्हें जान से मरने की कोशिश है. ज्ञातत्व है की क्राईम ब्रांच पेशेवर अपराधी एवं राष्ट्रीय सुरक्षा से सम्बंधित अपराधों के लिए ही बनी है, ऐसे में एक पुलिस अधिकारी जिसपर एक कनिष्ठ अधिकारी को धमकाने और शपथ पत्र पर जबरदस्ती हस्ताक्षर करने का आरोप है, को अचानक क्राईम ब्रांच में शिफ्ट किया जाना तर्कसंगत नहीं है और निश्चित तौर पर यह कदम प्रशासनिक कम और राजनीति से प्रेरित ज्यादा है. ऐसे में गुजरात क्राईम ब्रांच जिसकी पृष्ठभूमि फर्जी मुठभेड़ों से भरी पड़ी है पर भरोसा नहीं किया जा सकता है.
गुजरात प्रशासन का यह कदम उसकी दागदार छवि को और भी गंद आवरण से ढक देगा और मुख्यमंत्री मोदी के सदभावना उपवास के मूल उद्धेश्य को कुचल देगा. नरेन्द्र मोदी की सर्वग्रहता राष्ट्रीय और गुजरात के स्तर पर तभी संभव है जब वे सहिस्नुता का परिचय अपने आचरण में लागू करें. श्री भट्ट के आवास पर लगातार छापेमारी कर उन्हें और उनके परिवार को मानसिक तौर पर प्रताड़ित करना किसी बेहतर प्रशासनिक प्रबंधन का हिस्सा नहीं हो सकता. बदले की भावना से किये जाने वाले ये कार्यवाई निश्चित ही कुंद मानसिकता का प्रतीक हैं. मोदी को ऐसे प्रशासनिक हथकंडो को छोड़ कर लोकतान्त्रिक तरीकों से ही अपने को साबित करना होगा तभी उनकी सर्व्भोमिकता साबित होगी अन्यथा गुजराती मानस पटल पर भी वो अपनी छवि धूमिल कर बैठेंगे.

भारतीय पुलिस सेवा के निलंबित अधिकारी संजीव भट्ट उस समय मीडिया के सुर्ख़ियों में आ गए जब उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में एक हलफनामा दायर कर गुजरात के 2002 के सांप्रदायिक दंगो के लिए सीधे तौर पर मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को दोषी बताया. आरोपों के अनुसार, श्री संजीव भट्ट उन पुलिस पदाधिकारियों में से एक हैं जिन्हें दंगो के दौरान राजनैतिक दबाब के कारण उचित प्रशासनिक करवाई करने से रोका गया. संजीव भट्ट की पत्नी स्वेता का आरोप है की नरेन्द्र मोदी के खिलाफ खड़े होने के कारण उनके पति को अनर्गल आरोपों में फंसाया जा रहा है.
उन्होंने संजीव भट्ट को मारने की साजिश का आरोप गुजरात पुलिस पर लगाया है. गुजरात पुलिस की विश्वसनीयता को देखते हुए, अहमदाबाद के पुलिस कमिसनर सुदेश सिन्हा का बयान की श्री भट्ट की जान को कोई खतरा नहीं है, शायद ही श्री भट्ट की पत्नी को भरोसा दिला पाए. राजनीतिक गलिआरों में आम चर्चा है की श्री भट्ट को निर्भीक अधिकारी होने की सजा दी जा रही है. स्वेता का आरोप है की श्री भट्ट को रातों रात क्राईम ब्रांच शिफ्ट किया जाना उन्हें जान से मरने की कोशिश है. ज्ञातत्व है की क्राईम ब्रांच पेशेवर अपराधी एवं राष्ट्रीय सुरक्षा से सम्बंधित अपराधों के लिए ही बनी है, ऐसे में एक पुलिस अधिकारी जिसपर एक कनिष्ठ अधिकारी को धमकाने और शपथ पत्र पर जबरदस्ती हस्ताक्षर करने का आरोप है, को अचानक क्राईम ब्रांच में शिफ्ट किया जाना तर्कसंगत नहीं है और निश्चित तौर पर यह कदम प्रशासनिक कम और राजनीति से प्रेरित ज्यादा है. ऐसे में गुजरात क्राईम ब्रांच जिसकी पृष्ठभूमि फर्जी मुठभेड़ों से भरी पड़ी है पर भरोसा नहीं किया जा सकता है.
गुजरात प्रशासन का यह कदम उसकी दागदार छवि को और भी गंद आवरण से ढक देगा और मुख्यमंत्री मोदी के सदभावना उपवास के मूल उद्धेश्य को कुचल देगा. नरेन्द्र मोदी की सर्वग्रहता राष्ट्रीय और गुजरात के स्तर पर तभी संभव है जब वे सहिस्नुता का परिचय अपने आचरण में लागू करें. श्री भट्ट के आवास पर लगातार छापेमारी कर उन्हें और उनके परिवार को मानसिक तौर पर प्रताड़ित करना किसी बेहतर प्रशासनिक प्रबंधन का हिस्सा नहीं हो सकता. बदले की भावना से किये जाने वाले ये कार्यवाई निश्चित ही कुंद मानसिकता का प्रतीक हैं. मोदी को ऐसे प्रशासनिक हथकंडो को छोड़ कर लोकतान्त्रिक तरीकों से ही अपने को साबित करना होगा तभी उनकी सर्व्भोमिकता साबित होगी अन्यथा गुजराती मानस पटल पर भी वो अपनी छवि धूमिल कर बैठेंगे.
