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‘सेक्यूलरिज्म’ का तड़का और पिछड़ता विकास

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हाशिये पर विकास और 'सेक्यूलरिस्म' की ऊँची होती मीनार - एक बानगी
पटना में हवाई अड्डा बेहद खतरनाक स्थिति में है। हवाई अड्ड़ा के विस्तार के लिए जमीन चाहिए लेकिन राज्य सरकार की दिलचस्पी नहीं। एक साथ 3 से ज्यादा प्लेन ऱखे नहीं जा सकते। विमानन प्राधिकरण दशकों से कम से कम इतना जमीन तत्काल माँग रही है जिससे पार्किंग की समस्या हल हो सके। इतनी जमीन वहाँ पर मौजूद भी है। पर राज्य सरकार ने केंद्र से इसके लिए 85 करोड़ रूपये माँग कर दी है। सभी राज्य बेहतर विकास के लिए जमीन मुफ्त देते हैं पर सुशासन बाबू प्रोटाकाल के खिलाफ अड़े हुए हैं। 

परंतु यही सुशासन बाबू किशनगंज में अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी की स्थापना के लिए 224 एकड़ जमीन उपलब्ध करा देते हैं। कई संगठनों ने इस विश्विधालय की स्थापना का विरोध किया था। केंद्र भी आनाकानी कर रही थी। सहयोगी भी अ़ड़ंगा लगा रहे थे। परंतु 'सेकुलर प्रेम' के आगे सारे विरोध के बाबजूद जमीन मुहैया करायी गयी। जबरन जमीने छीनी गई। इन समाचारों को प्रकाशित होने से रोका गया। 


बीते बर्ष नीतिश कुमार ने अपनी पूरी राजनीतिक कमाई ‘सेक्यूलरिज्म’ के नाम कर दी। इरादा तो था कि दिल्ली की राजनितिक गलियारे में दस्तक दी जाये। इनकी यह ‘दाल’ तो नही गली परंतु लगता है ‘सेक्यूलरिज्म’ के बार-बार तड़का लगाने से इनकी पूरी ‘दाल’ ही ‘जल’ गयी। तमाम सर्वे और टीवी चैनल वाले लगातार बता रहे हैं कि बिहार में डपोरशंखी सुशासन की गूँज बंद होने वाली है। आगामी लोकसभा चुनावों में 4-5 सीटों तक समेटा जा सकता है ‘सुशासनी कुनबा’। 

बिहार के लोग राजनीतिक 'परिपक्व'
पिछले बर्ष नीतिश कुमार ने कहा था कि बिहार के लोग राजनीतीक रूप से परिपक्व हैं। यहाँ की जनता बखूबी समझती है। फिर सड़कों, पुल-पुलियों से लेकर नेशनल हाईवे को अपने दम पर सुघार कर लेने का दावा और वादा करने वाले 'हूजूर' आप यह जान लें और मान लें कि पटना से किसी भी दिशा में 25 कि.मी. की दूरी तय करने में आज भी कम-से-कम 2 घंटे लगते हैं और इस आंकड़े में ट्रैफिक जाम का योगदान शामिल नहीं है। इस व्याख्या से पटना को दिल्ली से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण एन.एच.30 ‘रास्ते’ की स्थिति भी शामिल है। 

दस सिरों वाला राक्षस
भारतीय गणतंत्र में ‘गण’ की भूमिका सर्वोच्च हो इसके लिए ‘तंत्र’ से भिड़ने वाले जनप्रिय नेता जयप्रकाश नारायण ही थे। इसी कारण उन्हे ‘लोकनायक’ भी कहा गया। जयप्रकाश नारायण(जेपी) ने एक बार कहा था कि "कांग्रेस क्या है ?? कांग्रेस कई सिरों वाला एक राक्षस है"। 
जेपी को गुजरे तो अब 34 बर्ष हो चुके, लेकिन खुद को जेपी के अनुयायी कहने वाले कुछ लोग बिहार में मूलतः दो ध्रुवों में बंट चुके हैं। इसमें एक कुनबा है जो सतासीन है, ‘सुशासनी’ होने की प्रक्रिया में यूँ मसगूल है कि मानो सुशासन की व्याख्या ही बदल डाले। जेपी के शागिर्दों का जो दूसरा घटक है उसने ही बिहार में ‘जंगलराज’ स्थापित किया था।


अब जेपी के द्दारा घोषित कांग्रेसी ‘राक्षस’ के ‘हमसफर’ बनने के लिए जेपी के ये दोनों शागिर्द इनदिनों संघर्षरत हैं। इसके साथ ही ‘लालटेन’ की ‘मद्धिम रौशनी’ से उकताए जिस आम जनता ने ‘तीरंदाजी’ कर इस सुशासन को समर्थन दिया था वे अब खुद ही ‘संपूर्ण क्रांति’ के वर्तमान सतासीन शागिर्दों के शिकार हैं।

लालूजी के समय सबसे बड़े खलनायक बन कर उभरे थे बाबू सुशासनी। और, अबकी फिर ‘खलनायक’ ही बताये जा रहें हैं। फर्क बस इतना की अबकी ये बिहार की शांतिपूर्ण जनता के खिलाफ ही ‘खलनायक’ बन चुके हैं। 2005 में इन्हें लालू-विरोध का एकमुश्त वोट मिला था न कि इनकी सृजनतामक्ता का। जनता लालू के खिलाफ हो गई थी क्योंकि अपराध बेलगाम था। परंतु इस 8 बर्ष में राज्य में अफसरसाही बेलगाम हुई, भ्रष्टाचार अपने चरम पर है, ब्लाक आफिसर से लेकर किरानी तक करोड़ों में खेल रहे हैं, सरकारी अस्पतालों की स्थिति राजद सरकार से भी बदतर है, विधालयों में शिक्षक नहीं आते, जो आते हैं वे खुद ही शिक्षित नहीं।

यूँ आया प्रदेश में सुशासन
नीतिश कुमार जैसे नेता कभी कभार पैदा होते हैं, इसलिए आज के दौर में बिहार तो छोडिए देश में कहीं भी ‘सुशासन बाबू’ कहा जाता है तो यकींन मानिये वे नीतिश कुमार ही हैं। इनके बारे में मशहूर रहा है कि इनके 8 सालों के शासन में बिहार सरकार के सभी सरकारी दस्तावेजों में ‘शासन’ और ‘प्रशासन’ की जगह ‘सुशासन’ शब्द दर्ज कर दिया गया है- तो हुआ न पूरा प्रदेश में ‘सुशासन’!

बहरहाल, इस सुशासनवाद का तीर्थस्थल है नालंदा। हर वक्त जबर्दस्त जलसे के लिए तैयार रहता है नालंदा। राजगीर में तमाम सुख-सुविधाओं से लैस अंर्तराष्ट्रीय स्तर का ऐसा कन्वेंशन सेंटर बनाया गया है जो राजधानी तक को मयस्सर नहीं। 

तमाम व्यस्तताओं के बावजूद सुशासन बाबू का ‘नालंदा प्रवास’ बताता है कि सुशासनी सरकार का ‘दिल’ नालंदा और राजगीर में ही बसता है। आज बिहार के इस गांव में एक साथ आधा दर्जन हेलिकॉप्टर उड़-उतर सकते हैं।

खैर इसी बहाने सही भोले-भाले ग्रामीणों में अभी तक खुशफहमी है कि यह सुशासनी सरकार गांव-गिरांव की हितैषी है, और इसी कारण अभी भी इस धरती पुत्र की आभा थोड़ी बची हुई है। ये मासूम लोग अबतक अपने ‘तीर्थंकरों’ को शायद नहीं पहचान पाये हैं।
Amit Sinha is a bilingual Columnist. He can be contacted at facebook.amit

The Roadies

This story is protected under Google product Licence. Appeared originally at The Patna Daily

Every year five lakh people come to this landlocked state called Delhi in search of jobs and livelihood. There is continuous pressure to develop NCR, especially Noida and Gurgaon, and form a common economic and development zone for overall development. If this happens, Delhi will surpass any other state in terms of development. But it is the plurality of agencies, the lack of a unified command system and little administrative control with the state government are some of the real causes of the pain of this city.

The ringside observers of the Indian political system in Independent India are failing to gauge Kejriwal again and again. This unusual politician with a 2 day 1 night stay outside the power bank of the country, the Parliament, has unearthed the veracity of ‘democracy’. It was for the first time in the history of India or perhaps the world that the head of a democratically chosen provincial government slept on the street in a severe cold night.

Now, as Kejriwal relented, withdrew his dharna within 36 hours of tussle with partial success, it is needed to understand that all this mayhem was not just to suspend the 3-4 policemen. It was more than that. It may be the first step of the strategy to help Delhi get a full statehood.

There is a perpetual pitching for a single command system in the national capital if the Central government could not grant full statehood. It is difficult to make coordination among a host of authorities in the city. The issue becomes more if some rests with the center and some with the state. This poses the biggest challenge for the growth and development of the city. It is the special status of Delhi that is posing hurdle to Kejriwal for him to deliver better.
Statement of Objects and Reasons appended to the Constitution (Seventy-fourth Amendment) Bill, 1991 which was enacted as THE CONSTITUTION (Sixty-ninth Amendment) Act, 1991 says that the question of re-organization of the Administrative set-up in the Union territory of Delhi came to the Union of India for some time. A committee was set up to inquire the issue with most possible dimensions recommended that Delhi should continue to be a Union territory and provided with a Legislative Assembly and a Council of Ministers responsible to deal with matters of concern to the common man.

But the committee recommendation failed to provide the power and authority to the legislature to deliver its responsibilities. With the insertion of article 239A of the Constitution some interesting facts surfaced like: a) It be called the National Capital Territory of Delhi or just NCT; b) The administrator there after are called Lieutenant Governor; c) It is this 239A that goes for a Legislative Assembly for the NCT. And the seats in such Assembly shall be filled by members chosen by direct election from territorial constituencies in the NCT.

At present, all financial matters require the approval of the Union government before they are placed in the Assembly and any matter discussed and approved by the Assembly cannot become a law unless approved by the Government of India.

Furthermore, it is not possible for the Delhi government to take over the police as Delhi is the center of diplomatic enclaves and the home of various installations like the Parliament, North Block and South Block. Policing remains the most contentious issue between the Union of India and the State of Delhi. With a law enforcement agency out of the gamut of Delhi government, how a democratically chosen government is expected to deliver a better law and order situation?
Perhaps Kejriwal has gone through all this and, as he found himself, he is caught between the center’s intention to embarass his government and the people's expectation, this product(man) of Dharna and Andolan found another ‘dharna’ as the best tool to broadcast the center apathy in a single effort.
In my opinion, the Roadies achieved more than what they actually expected with this 2 Day 1 Night power pack drama. Someone whispers but what a roadies to do? For them, Roadies have travel, adventure, drama and a touch of tumultuousness. Got it!!!
Amit Sinha is a bilingual writer and research Journalist. He can be contacted at facebook.amit

सड़कों पर उतरी दिल्ली की बेचैनी

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बार-बार यह प्रशन सामने आ रहे हैं कि अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली पुलिस के खिलाफ जो मोर्चा खोला है वह कितना जायज है? क्या यह शोभनीय है कि एक मुख्यमंत्री खुद ही अनशन पर बैठ जाये? सवाल हर दूसरा दल खड़ा कर रहा है पर यह सुझाव कहीं से नहीं आ रहे कि केंद्र के अधीन रहने वाली दिल्ली पुलिस को दिल्ली सरकार के हवाले कैसे किया जाये। संवैधानिक नियमावली का हवाला हर कोई दे रहा है। परंतु इस प्रशासनिक गुत्थी को सुलझाने के लिए आगे कोई नहीं बढना चाहता।

दूसरी ओर केंद्र में येन-केन-प्रकारेण लंबे समय तक कुंडली मार बैठी कांग्रेस स्वाभवतः यह कतई नहीं चाहेगी कि दिल्ली की प्रशासनिक लगाम उसके हाथ से निकल जाये। परंतु अरविंद पर आरोपों की झड़ी लगाने वाले तमाम दल क्या यह चाहेंगे कि उन राज्यों में जहाँ उनकी सरकारे हैं वहाँ की राज्य पुलिस खुद उनके अधीन न हो? कतई नहीं।
यह चर्चा दरअसल केजरीवाल के अनशन और उसे 'अराजक' कह दिये जाने भर का नहीं है। यह चर्चा उस ‘अराजक’ और ‘कानूनी मकड़जाल’ का है जिसके अंतर्गत दिल्ली को पूर्ण राज्य का अधिकार नहीं दिया जा रहा है। जब दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ शिकायतों की लंबी फेहरिस्त में लगभग 80 प्रतिशत शिकायतें दिल्ली पुलिस को लेकर है ऐसे में आवश्यक है कि दिल्ली की प्रशासनिक लगाम भी दिल्ली सरकार के हाथों में हो।

केजरीवाल हमेशा के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे यह निश्चित है। काल के साथ कुछ भी स्थाई नहीं है। याद करें कि राज्य पर पहला शासन भाजपा ने ही किया था, फिर कांग्रेस ने और अब केजरीवाल की बारी है। परंतु दिल्ली की हर सरकार और मुख्यमंत्री की यह सरदर्दी है कि दिल्ली पुलिस उनके नियंत्रण में नहीं है। इस पीड़ा को दिल्ली की मुख्यमंत्री सुषमा स्वराज ने भी दुहराया था और शीला दीक्षित ने भी। और अब केजरीवाल दुहरा रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि केजरीवाल ने इस पुरे मुद्दे को आंदोलन का रंग देकर राष्ट्रीय बहस बना दिया है।


दिल्ली की यह बेचैनी हम सब भी महसूस कर सकते हैं। बस ईमानदारी से अपने दिल से पूछना होगा कि हम सब अपने स्थानीय थानों में जाने भर से कितना घबराते हैं? मीडिया के क्राईम रिपोर्टर तक थानों में सब कुछ मिला जुला कर चलने की बात करते हैं। बड़े से बड़े गैर प्रशासनिक अफसरों से किसी भी थाने का एक अदना कांस्टेबल भी कितनी बुरी तरह व्यवहार करता है, इसका हम सब को बेहतर अहसास है। फिर कैसे हो ऐसी व्यवस्था का विरोध और फिर क्या तरीका हो विरोध का? 
निश्चित ही यह एक वैचारिक मतभेद का मामला हो सकता है। लेकिन लोकतंत्र में आंदोलन ही अहिंसक विरोध का सबसे बेहतरीन माध्यम है। फिर सरकार या व्यवस्था के लिए जो 'कम्फर्टेबल', हो वह विरोध ही क्या? वह तो विरोध नहीं, दिखावा है। फिर क्यों वक्त और जगह का निर्धारण वह पक्ष करे जिसके खिलाफ आंदोलन है? ब्लकि आंदोलन के लिए उसी वक्त और जगह का चुनाव होना चाहिए जो सरकार के लिए सर्वाधिक चुनौती पेश करे, जो रहनुमाओं के लिए सर्वाधिक अनकंफर्टेबल हो। 

दिल्ली पुलिस के खिलाफ केजरीवाल के घरना-आंदोलन की भर्तस्ना से कम-से-कम भाजपा को कुछ लाभ नहीं होने जा रहा है। केजरीवाल हमेशा कुछ करते रहेंगे और मीड़िया उनके पीछ भागती रहेगी। चंद महीने पहले तक मीडिया मोदी की हर छींक के पीछे कैमरे के साथ दौड रही थी परंतु केजरीवाल ने इस दृश्य को बदल दिया। इस बदलते परिदृश्य में मोदी मिशन +272 के लिए एक वेबसाईट बना लेना पर्याप्त नहीं है। हाँ इधर भाजपा की युवा ब्रिगेड बीजेएमवाई (BJMY) ने दिल्ली के मलिन बस्तियों में कुछ हलचल जरूर की है जिसकी सुकबुकाहट आनलाईन पोर्टल्स पर भी दिखी है। इसी तर्ज पर उन सभी प्रदेशों में ग्रास-रूट लेवल पर काम करना जरूरी है जहाँ भाजपा के लिए थोड़ी भी संभावनाएं है। चूँकि लोकसभा चुनावों के लिए वक्त कम है इसलिए मीडिया की करवट एकबार फिर भाजपा की ओर हो यह उसकी जीत के लिए आवश्यक है।
Photo - Reuters
पंचतारा होटलों की आभिजात्य संस्कृति की जगह आम आदमी पार्टी ने सड़क की संस्कृति स्थापित कर दी है यह मानना ही होगा। वातानुकूलित कमरों में बैठ कर राजनीतिक आंकड़ों का जोड़-तोड़ करने वाले कांग्रेस पुत्र भी खुद को धरतीपुत्र साबित करने में पसीना बहा रहे है। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी भी सड़क से फुटपाथ की चाय दुकान से चलते हुए यहाँ तक पहुँचे हैं। इसलिए सड़क की महिमा इस गणतंत्र में सर्वोपरि है। 

जनता सड़क पर हुई आंदोलनों से खुद को जोड़ पाती है। इसीलिए जनता ने विचारधारा और घोषणाओं से इतर yes-no और do-die पर यकींन करने लगी है। राजनीति के एक नए दौर की शुरुआत हुई है। लंबे अंतराल के बाद राजनीति रोड़ पर दिख रही है और उसमें मिशन की भावना का समावेश हो रहा है। नरेंद्र मोदी को 7, रेस कोर्स रोड़ तक पहुँचाने मे झिझक नही तो फिर इस मिशन को रोड़ (सड़क) से ही शुरू करने में झिझक कैसी?
Amit Sinha is a bilingual Columnist. He can be contacted at facebook.amit

Gandhis after Gandhi

This article is Originally appeared at  Beyond Headlines.
कांग्रेस की दूसरी पंक्ति की कद्दावर नेताओं में तमिलनाडु की जयंती नटराजन का नाम इन दिनों सुर्खियों में है। राहुल के इशारे पर जयंती से पर्यावरण मंत्रालय छीन लिया गया जो जुलाई 2011 से ही इस मंत्रालय में जमी हुई थी। सूत्रों की माने तो पर्यावरण मंत्रालय में जयंती नटराजनके पदार्पण के साथ ही मंत्रालय का काम काज मंद पड़ गया था। मंत्रालय के ‘हाँ’ की भारी-भरकम फीस ‘जयंती टैक्स’ से पूरे महकमे में हड़कंप था। बीते सप्ताह गोवा में नरेंद्र मोदी ने अपनी रैली में सीधे-सीधे कांग्रेस पर हमला किया और जयंती नटराजन की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिये।

सूत्रों की मानें तो ‘जयंती टैक्स’ पेमेंट के इंतजार में 65 से अधिक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट इंनवायरमेंट क्लीरेंस के इंतजार में रूके पड़े थे जिसे नए मंत्री वीरप्पा मोईली ताबड़-तोड़ निपटाने में लगे हैं। पुष्ट खबर है कि पिछले 18 दिनों में 70 प्रोजेक्टस को मंजूरी दे दी गई। यह तो मानो कोई विंटर डिस्काउंट आफर चल रहा हो। हालांकि राहुल गाँघी के इशारे पर जयंती नटराजन को पद से हटाकर वापस पार्टी की जिम्मेदारी सौपना भ्रष्टाचार पर हमला नहीं ब्लकि भ्रष्टाचार को छुपाने का प्रयास कहना ज्यादा सटीक होगा। पार्टी सूत्र राहुल को लगातार आगाह करते रहे कि पर्यावरण मंत्रालय में सब-कुछ ठीक ठाक नही चल रहा है।

परंतु इन सब विवादों में नरेंद्र मोदी का स्वेच्छा से कूदना कुछ लोगों को समझ नहीं आया। दरअसल केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय और नरेंद्र मोदी के आमने-सामने होने का कारण मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ को लेकर है। कांग्रेस का पूरा कुनबा एकजुट है कि किसी तरह इस प्रोजेक्ट को रोका जाये। कांग्रेस को जब मोदी की इस मुहिम की काट नहीं दिखी तो उसने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के द्धारा पूरे प्रोजेक्ट पर ग्रहण लगाने की कोशिस की है। नर्मदा नदी में सरदार सरोवर डैम और सूलपनेश्वर अभ्यारण्य से निकटता को कारण बताकर प्रोजेक्ट को रोकने की कवायद जोरों पर है। 

बीते पंद्रह दिसंबर को जब देश के पांच सौ से अधिक स्थानों से ‘रन फॉर यूनिटी’ कार्यक्रम का आयोजन हुआ तो विभिन्न दलों की ओर से इसे भाजपा का राजनैतिक हथकंडा बताया गया। वैसे तो मोदी की यह पूरी कवायद सरदार पटेल की महानता और देश के प्रति उनके योगदान को नये सिरे से उकेरने को लेकर है। परंतु यह इतना भर नही है, यह मोदी भी जानते हैं और कांग्रेस भी। कहीं न कहीं यह देश को गाँधी परिवार की जद से बाहर निकालने का प्रयास भी है। आजादी के 66 बर्षों के बाद भी आज देश में ‘गांधीस् आफ्टर गाँघी’ की परंपरा जिस कदर हावी है उसकी हवा निकालने की कवायद है यह स्टैच्यू आफ यूनिटी। 

भारत में 565 पृथक रियासतों को समाहित करने का भगीरथ प्रयास करके सरदार पटेल ने अखंड भारत का निर्माण किया था। इसी कारण लौह पुरूष सरदार वल्लभ भाई पटेल के समानांतर व्यक्तित्व भारतीय राजनीति में दुसरा कोई नहीं है, शायद इस बात पर हम सब सहमत हैं। परंतु जिस प्रकार एक परिवार विशेष के द्धारा साजिश के तहत पटेल को इतिहास के पन्नों से बाहर ढकेला गया है वह शर्मनाक है। इस प्रकार तो भारत के गौरान्वित इतिहास को बदरंग किया जा रहा है और उसे महात्मा, नेहरू, इंदिरा और राजीव तक सीमित कर दिया गया है। अमूमन हर सरकारी योजना का नाम गाँधी परिवार से जोड़ा जाना तर्कहीन है।
सूचना के अधिकार के तहत प्रदत्त सूचना के अनूसार आज देश भर में 12 केंद्रीय और 52 राज्य प्रायोजित परियोजनाओं का नामकरण ‘गाँधी’ पर किया गया है। देश में 5 एअरपोर्ट के नाम पर इसी ‘गाँधी’ पंच को देखा जा सकता है। देश के 100 से अधिक प्रमुख शिक्षा संस्थानों का नामकरण भी ‘गाँधी’ प्रभाव के घेरे में है। नेहरू, इंदिरा और राजीव गाँधी नामकरण ट्रेंड के इस त्रिकोण ने देश में चुतुर्मुख विकास किया है और कुल मिलाकर देखें तो ‘गाँधीस् आफ्टर गाँधी’ का कथन बिलकुल सटीक प्रतीत होता है। 

नर्मदा नदी के बीचों बीच ‘साधु बेट’ नामक द्धीप पर 182 मीटर (लगभग 600 फीट) उंचे इस विशालतम मूर्ति का निर्माण किया जा रहा है। यह द्धीप सरदार सरोवर डैम से 3.2 किमी. की दूरी पर है। द्दीप पर पहुँचने के लिए पर्यटकों को छोटे-बड़े जहाज उपलब्ध रहेंगे। गुजरात सरकार द्दारा विशेष अधिकार प्राप्त ‘सरदार वल्लभ भाई पटेल राष्ट्रीय एकता ट्रस्ट’ ही पूरे निर्माण और देखभाल के लिए जिम्मेदार होगी। इस प्रस्तावित मूर्ति का अमेरिका स्थित स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी से दुगुनी होना इसके अविसवसनीय विशालतम आकार को परिलक्षित करता है। 

नर्मदा नदी के बीचों बीच सरदार सरोवर डैम से 3.2 किमी. की दूरी पर बननेवाले इस विशालकाय मूर्ति का निर्माण अमेरिका की टर्नर कन्स्ट्रक्शन कंपनी करेगी। इसी कंपनी ने दुबई की शानदार 830 मीटर उंची बुर्ज खलीफा जैसी विशाल इमारत बनाई है और वह भी मात्र 5 साल में। स्टैच्यु आफ यूनिटी की पूरी परियोजना पर लगभग पचीस सौ करोड़ रुपए की राशि खर्च होने का अनुमान है। इस स्मारक के पास सरदार पटेल के जीवन से जुड़े पहलुओं पर बना संग्रहालय और एक शोध केंद्र भी होगा। 

‘स्टैच्यु आफ यूनिटी’ के निर्माण के लिए देशभर के किसानों से कम-से-कम एक लौह-यंत्र के योगदान का आह्वान किया गया है। इस मुहिम को संघ परिवार की दो दशक पहले इसी किस्म की एक व्यापक मुहिम से तुलना किया जाना वाकई मूर्खतापूर्ण है। अयोध्या में 1990-92 में संघ परिवार ने पांच सौ साल पुरानी बाबरी मस्जिद के स्थान पर राम मंदिर के निर्माण में योगदान देने के लिए लोगों से र्इंटें इकट्ठा की थीं। आज की तारीख में ये तमाम र्इंटें और साजो-सामान आज भी हिंदुत्ववादी संगठनों के गोदामों में पड़ी हैं। और कमोबेश हर कोई इस तथ्य से परिचित है। इन सब के बाबजूद दोनों संप्रदायों ने इतने लंबे वक्त तक धैर्य रखा है क्या यह प्रशंसनीय नही है? 

दरअसल अयोध्या के मुद्दे को स्टैच्यू आफ यूनिटी से तुलना कर कांग्रेस पूरे मुद्दे को सांप्रदायिक रंग देना चाहती है और मोदी के कांग्रेस मुक्त भारत के मुहिम को भटकाना चाहती है। विरोधियों के अनुसार मोदी के इस ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ को एक व्यक्तिविशेष की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए महिमामंडित किया जा रहा है। परंतु कांग्रेस कैंप से आती इन टिप्पणीकारों के पास क्या कोई जबाब है कि आज देश के लगभग 90 प्रतिशत योजनाओं पर ‘गांधी’ नाम का ग्रहण क्यों चढ़ा है? 

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हे गंगा मईया !!!

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बीते दिसंबर नरेंद्र मोदी ने वाराणसी में ऐतिहासिक रैली की और अभूतपूर्व भीड़ ने उनका उत्साह बढ़ाया। वाराणसी रैली में नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में गंगा नदी का जिक्र क्या किया, राजनीतीक मठों में मानो भूचाल आ गया। भाजपा विरोधी लगभग सभी दलों ने इसे नरेंद्र मोदी का राजनैतिक स्टंट करार दे दिया। 

मुद्दे के रूप में किसी ने इसकी तुलना अयोध्या से की तो किसी ने इसे भगवा नीति का नया अंक बता दिया। अगर ऐसा मान भी लिया जाये तो इस बहाने ही सही नरेंद्र मोदी ने गंगा जैसी प्राणदायिनी नदी में बढ़ते प्रदूषण की ओर राष्ट्रीय बहस को मोड़ा तो सही। अमूमन हर धर्म, प्रांत या जाति के लोग गंगा की वर्तमान दुर्दशा पर दुखी हैं। निर्विवाद रूप से गंगा से देश की एक बड़ी आबादी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित है। फिर गंगा सफाई पर इतना विवाद क्यूँ?

संयुक्त राष्ट्र संघ दुनिया भर में जल-संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने को लेकर बर्ष 2013 को “जल सहयोग के अंर्तराष्ट्रीय वर्ष” के रूप में मना रही है। इस कारण भी नदियों की भूमिका पर चर्चा अहम है। अपने अनेकानेक औषधिक गुणों के कारण गंगा नदी के जल को पूरे विश्व के अन्य सभी नदियों से अधिक पवित्र माना गया है। वैज्ञानिक शोधों में बार-बार साबित हुआ है कि गंगा के जल में डिसौल्वड आक्सीजन की मात्रा काफी अधिक है जिसके कारण दूषित बैक्टीरिया लगातार मरते रहते हैं। परंतु सरकारी दोहन, शोषण और उदासीनता के कारण देश की पाँच प्रमुख राज्यों से होकर गुजरने वाली मोक्षदायिनी गंगा आज खुद मृतप्राय है। 

बनारस हिंदू विश्र्वविधालय के नामी-गिरामी प्रोफेसर बी.डी.त्रिपाठी के बर्षों के अथक प्रयासों के कारण ही भारतीय संसद ने पहली बार 1980 में गंगा के प्रदूषण पर चर्चा की। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की अगुआई में अप्रैल 1986 में पहली बार गंगा एक्शन प्लान(गैप) को अमलीजामा पहनाया गया। हालांकि गैप, व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई, और लगभग 1000 करोड़ की धन राशि की बंदरबांट हुई। अंततः सरकार को 31 मार्च 2000 को योजना वापस लेनी पड़ी। गैप की सफलता की दुबारा की गई कोशिसें(गैप-फेस2) भी औंधे मुँह गिरी और कुछ खास नहीं हो सका। केंद्र की उपेक्षा हालाँकि पूरी योजना पर अच्छी शुरूआती पहल के बावजूद केंद्र सरकार की अकर्मण्यता भी झलकने लगी है। बर्ष 2010 और 2011 की बार्षिक मीटिंग के बाद तीसरी बार बर्ष 2012 की मीटिंग समाजसेवी और मीडिया के दबाब में औपचारिकता बस रह पाई। जबकि पूरी परियोजना के क्रियान्वयन रिपोर्ट पर चर्चा और समीक्षा के लिए हर बर्ष बैठक होनी तय की गई थी। 

हिंदू संगठनों का बेसुरा राग 
बर्ष 2009, में जब अंर्तराष्ट्रीय टीवी चैनल "फौक्स न्यूज" ने अपने एक कार्यक्रम के दौरान गंगा को "रोगग्रस्त" बताया तो पूरे विश्व में हंगामा मचा और तमाम हिंदु संगठनों ने कटु शब्दों में इसकी निंदा की। परंतु, यह निर्बाध सत्य है कि गंगा को माँ का दर्जा देने वाले भारतीय संस्कृति में गंगा की सफाई को लेकर कोई भी गंभीर नही है। विसर्जन के नाम पर मूर्तियों से लेकर, पूजा सामग्री और कचरे से भरी प्लास्टिक की थैली अमूमन प्रत्येक गंगा तट के आम दृश्य बन चुके हैं। शिक्षित और प्रबुद्ध नागरिक को भी परंपरा के नाम पर ऐसी आदतों से गुरेज नही है। लावारिस और अधलशी लाशों को अनेकों बार चोरी-छुपे गंगा में बहा दिया जाता है, जो गंगा के लिए सर्वाधिक दूषण का कारण बन चुका है। 
मृतकों को गंगा-निर्वाण 
अंधविश्वास कहें या धार्मिक आस्था, भारत में कुछेक धर्मों में 12 बर्ष से कम उम्र के बच्चे का दाह-संस्कार न कर उसे गंगा में प्रवाहित करने की प्रथा है। सर्प-दंश से हुई मृतकों के शव को दुबारा प्राण संचरण की आस में गंगा की गोद ही नसीब होती है। कई लोग अपने मृत पालतू पशुओं को भी गंगा में बहा देते हैं। लेकिन इन सब को रोकने के लिए न तो केंद्र ने और न ही बिहार सरकार ने अबतक कोई पहल की है। जरूरत है कि जागरूकता अभियान चलाकर ऐसी कुप्रथाओं को खत्म किया जाये। 

गंगा सफाई की आड़ में धन की गंगा 
केंद्र ने 23 अक्टूबर 2010 को सर्वोच्च न्यायालय में शपथ-पत्र दाखिल कर कहा कि बर्ष 2020 तक गंगा को प्रदूषण मुक्त कर लिया जायेगा। केंद्र की आर्थिक कैबिनेट कमिटी ने अप्रैल 2011 में गंगा की सफाई के लिए पूरी परियोजना पर 7000 करोड़ की भारी-भरकम राशि आवंटित की थी। पूरी राशि का 75% अंशदान केंद्र प्रायोजित था और राज्यों को उनके प्रदेश में होने वाली विश्व बैंक ने इस योजना पर एक बिलियन डालर(5600 करोड़ रूपये) की ऋण मंजूर की है। अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर नदियों की सफलतम सफाई योजनाओं से प्रेरित होकर इस परियोजना में यह भी ध्यान रखा गया कि उन गलतियों की पुनरावृति नहीं होने पाये जैसा गंगा एक्शन प्लान पर हो चुका है। इसके लिए प्रोजेक्ट में तय किया गया कि पहले पानी की सफाई की जायेगी। इसके लिए गंगा के उद्गम से लेकर बंगाल की खाड़ी तक पड़ने वाले छोटे-बड़े शहरों में सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट की स्थापना होनी थी। 

बिहार की स्थिति 
गंगा नदी की सफाई को लेकर केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के अंतर्गत, फरवरी 2009 में अत्यंत महत्वकांक्षी नेशनल गंगा रीवर बेसिन परियोजना(NGRBP) को किर्यान्यवित किया गया। जिसे बिहार सहित कुल पांच राज्यो में बर्ष 2009 में एक साथ लागू किया गया था। प्रधानमंत्री को NGRBP के अध्यक्ष बनाने के साथ ही बिहार समेत यूपी, उतराखंड, झारखंड और पं.बंगाल(गंगा के गुजरने वाले रास्ते) के मुख्यमंत्रियों को अथारिटी का सदस्य बनाया गया। ज्ञातत्व है कि योजना खर्च का सिर्फ 25% राशि ही राज्य सरकार को देना है और शेष भार केंद्र उठा रही है। परंतु बिहार में गंगा की सफाई को लेकर जो उदासीनता व्याप्त है वह हतप्रभ कर देने वाली है। इस परियोजना के अनुपालन में जहाँ देश के अन्य राज्यों की स्थिति कमोबेश ठीक है वहीं बिहार की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। 

बिहार में गंगा आज भी बदस्तूर मैली की जा रही है। साथ ही गंगा तटों पर गंदगी और बदबू से बुरा हाल है। छोटे-बड़े उद्दोगों से लेकर गाँव-शहरों की गंदगी बेरोकटोक गंगा में गिराई जा रही है। इससे राज्य सरकार की कार्यदक्षता सवालों के घेरे में है। राज्य शहरी विकास मंत्रालय के अंतर्गत आनेवाली इस पूरी परियोजना के क्रियान्वन की जिम्मेदारी बिहार शहरी आधारभूत विकास कारपोरेशन(BUIDCo) को सौंपी गई है। इस पूरी परियोजना का मकसद था कि शहरों से निकले सीवर के पानी ट्रीटमेंट के बाद ही गंगा में डाले जाये। इसके लिए बिहार में पटना, बेगूसराय, बक्सर, हाजीपुर, मुँगेर को में सीवरेज नेटवर्क और सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट(STP) बनने थे। पटना में सैदपुर, बेउर, पहाड़ी, कंकडबाग और करमलीचक में सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट(STP) बनाये गये जिनकी संयुक्त क्षमता 119 MLD(Million Litre per Day) है। इन सब पर 200 करोड़ रूपये भी खर्च हो गए और अत्यंत खराब नतीजों को छुपाने की कोशिसें की जाने लगी। बाद में उच्चाधिकारियों ने पूरी योजना को ही तकनीकी रूप से दोषपूर्ण बता दिया। इसके बाद इंजीनीयरों ने नया तरीका इजाद किया और फिर से डीपीआर(Detailed Project Report) तैयार करने का फार्मूला सुझाया। अब टेंडर निर्गत होने का इंतजार है। ज्ञातव्य है कि बिहार सरकार डीपीआर तैयार करने पर अन्य राज्यों की तुलना में दुगुनी-तिगनी राशि खर्च करती है, जिसपर कई सवाल पहले भी उठते रहे हैं। 
इस प्रकार बिहार में जिस संदिग्ध तरीके से इस योजना पर काम चल रहा है उसे लेकर पूरी परियोजना की असफलता अभी से तय माऩये। अधिकारियों के उदासीन रवैये और प्रबंधनीय नाकामी को देखकर यह कहना कतई मुश्किल नहीं है कि गंगा सफाई के इस अभियान में केंद्र से चली 'फंड की गंगा' बिहार में व्यापत 'भ्रष्टाचार की कई खाड़ियों' में समा रही है।
Amit Sinha is a bilingual Columnist. He can be contacted at facebook.amit