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इसका खुलासा पटना सीरियल ब्लास्ट में पकड़े गए आतंकियों ने किया है। सरकार की खुफिया विभाग के खास अफसरों की मानें तो पटना ब्लास्ट के मुख्य आरोपी इम्तियाज ने पुछताछ में कूबूल किया है कि आईएम से जु़ड़े हैदर ने उसे बर्मा और गुजरात दंगो के विडियो फुटेज दिखाये थे। दरअसल ये विडियो क्लिप असली नहीं थे और इनमें भारत में मुसलमानों पर हो रहे जुल्म को तकनीकी सहारे से फर्जी तरीके से फिल्माया गया था। ऐसे फर्जी विडिया क्लिप दिखाकर मुस्लिम युवाओं के मन-मस्तिष्क में नफरत पैदा किया जा रहा है। ऐसे में बेरोजगारी से जुझ रहे युवा आसानी से चंद पैसों के लालच में आतंक और नफरत के रास्ते पर बढ़ रहे हैं।
पटना हमले के बाद सख्त पूछताछ में गिरफ्तार आतंकियों ने कूबूल किया है कि भटकल के बाद आईएम की दूसरी पंक्ति के आतंकवादी बिहार की जमीं से ही सारी गतिविधियों को अंजाम दे रहें है। मालूम हो कि हैदर और मोनू मेनन ने इस जिम्मेदारी को लेते ही काफी सक्रिय हो गए थे। जेहादी पुस्तकों की तुलना में विडियो क्लिप के मार्फत् युवकों का ब्रेनवाश करना ज्यादा आसान है। साथ ही जेहादी पुस्तकों के लिए अक्षर ज्ञान होना जरूरी है वहीं विडियो क्लिप से बिलकुल निरक्षर मुस्लिम किशोरों को भी भड़काया जाना आसान है। इसलिए आजकल ऐसे भड़काउ एमएमएस भी इन भटके युवकों के मोबाईलों में मौजूंद है जिसे देखकर भारत के मुस्लिम युवा और किशोर अपने ही देश के प्रति नफरत करने लगे हैं।
खुफिया विभाग के अफसरों के अनुसार आतंकी कार्रवाई के लिए आईएम तीन स्तरों पर काम करती है। पहले स्तर पर आतंकी घटना के बाद आतंकवादियों को पनाह देने के लिए जगह-जगह पर सेफ जोन बनाए जाते हैं। दूसरे स्तर में घटना के लिए विस्फोटक पहुँचाने वाले आतंकियों की टोली तैयार होती है। तीसरे और अंतिम स्तर पर आतंकी सबसे खतरनाक आतंकीयों की भर्ती कर उन्हे निर्णायक अंजाम के लिए तैयार करते हैं।
दिल्ली के आंतरिक सुरक्षा विशेषज्ञों की माने तो आतंकी पटना ब्लास्ट के बाद खुफिया और केंद्रीय गृह विभाग की सक्रियता के कारण आगामी लोकसभा चुनावों के पहले की तैयारियों में आतंकियो ने तब्दीली कर ली है। और इस कारण विस्फोट करने में नाकाम होते देखकर आतंकियों का नया पैंतरा है कि उतर भारत में बड़े पैमाने पर धार्मिक उन्माद फैलाया जाये, दंगे भड़काए जायें।
एक नई बात जो सामने आई है वह यह कि इन घटनाओं में हिंदु युवाओं का नाम भी सामने आया है जो पाकिस्तान में बैठे आकाओं के दिशा-निर्देंश में स्थानीय स्तर पर फंडिंग का काम कर रहे थे। यह दृश्य दुःखद तो है ही साथ ही चेतावनी है कि बेरोजगारी के भीषण संकट से जूझते बिहार को सरकारी रोजगार मेले के ढकोसलों से आगे निकलने की सख्त जरूरत है। अन्यथा हम सभी जानते हैं भूख की दस्तक धर्म और आदर्शों की परवाह नहीं करती।
Amit Sinha is a bilingual journalist. You can join him on facebook.amit.
