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बीते सप्ताह बिहार में नीतिश सरकार ने अपने 8 साल पूरे किये और अपनी उपलब्धियों का रिपोर्ट कार्ड जारी किया। इसके तीन दिनों बाद बिहार में 15 साल राज कर चुके लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल ने सरकार के खिलाफ अपना रिपोर्ट कार्ड(आरोप-पत्र) जारी किया। उसी दिन बिहार की राजनीति का तीसरा प्रमुख चेहरा रामविलास पासवान ने अपने दल लोक जनशक्ति पार्टी की 13वीं बर्षगांठ मनायी, जिसमें अमूमन हर बिषय पर चर्चा हुई। परंतु इन तीनो दलों के इतने प्रमुख आयोंजनों में हुई चर्चाओं में आतंकवाद का जिक्र तक नही हुआ।
यहां यह गौर करना होगा कि बिहार में जदयू, राजद, लोजपा और कांग्रेस कि राजनीती पूरे तौर पर बिहार के 11 प्रतिशत मुसलमानों की करवट अपने पक्ष में करने के लिए बेचैन है। बिहार में मुस्लिम तुष्टीकरण की जर्बदस्त होड़ मची है जो सारे तर्कों को पीछे छोड़ रही है। ये दल कभी भी मुस्लिम समाज को आतंकवाद से पृथक नहीं देख पा रहे हैं। इसी कारण आतंक का पनाहगार बन चुके बिहार में आतंकवाद आज भी इन दलों के लिए एक मुद्दा नहीं बन सका है।

पटना में रैली के दौरान हुए आतंकी हमले और तत्पश्चात राँची से ताबड़तोड़ गिरफ्तारी और गिरफ्तार आतंकियों के कूबुलनामे ने सब कुछ स्पष्ट कर दिया। निःसंदेह बिहार-झारखंड में आतंकवाद की जड़ें गहरी हो चुकी है। इन सब के बावजूद बिहार में आतंकवाद को लेकर राजनीति दलों की चुप्पी खतरनाक है। यह उनकी मानसिक पक्षाघात का नतीजा है या फिर राजनीतिक साजिश?
NIA और उसकी सफलता के राज
देश में आतंकवादी कारवाईयों को रोकने के उद्देश्य से 2008 में गठित नेशनल इंनवेस्टीगेशन एजेंसी, NIA के पास आज देश के सबसे बेहतरीन आफिसर्स की लाईनअप है। इनके काम करने के तरीके सटीक और रिजल्ट ओरियेंटेड है। विकास वैभव उन चुनिंदा आफिसर्स में से एक है जो आज NIA की सफलता की वजह है। विकास वैभव दरभंगा के एसएसपी भी रह चुके हैं और इन्हें मिथिलांचल क्षेत्र की जमीनी हकीकत बखूबी पता है। अपनी ईमानदारी और बेहतर कार्यकुशलता से इन्होने दरभंगा के आम-अवाम के दिल में अपनी जगह बनायी। इन्हीं कारणों से इन्हें NIA की टीम में रखा गया। मालूम हो की NIA की जिस टीम ने रक्सौल से यासिन भटकल को गिरफ्तार किया उसकी अगुआई विकास वैभव ही कर रहे थे।
इस बर्ष 2013 जनवरी के अंतिम पखवाड़े में NIA के ऐसे ही अधिकारी गुपचुप तरीके से पटना आये और दरभंगा की ओर रूख कर गये। झटपट में हुई उनकी कारवाई की भनक मीडिया और बिहार प्रशासन तक को नहीं लग सकी और आतंकी दानिश की गिरफ्तारी भी कर ली गई। इन्हीं तीव्रतम कारवाईयों कि बदौलत पिछले कुछ वर्षों में बिहार के विभिन्न भागों से दर्जनों दुर्दांत आतंकीयों को दबोचने में NIA को कामयाबी मिली है। इसके पूर्व अंडरवर्ल्ड डान दाउद का करीबी जम्मो खाँ और फर्जुर्रल रहमान की गिरफ्तारी भी बिहार से हो चुकी है।
बर्ष 2000 में जब बिहार के सीतामढ़ी जिले में पहली बार आतंकियों की गिरफ्तारी हुई तब सभी को हैरानी हुई थी। तब हिजबुल मुजाहिदिन के सदस्य मकबूल और जहीर की गिरफ्तारी से भारतीय खुफिया तंत्र भी सर्तक हुआ था। लेकिन फिर सब कुछ शांत लगने लगा। फिर 2006 से मानो आतंकी कुनबा फिर से सक्रिय हो गया। तब से आज तक बिहार(खासकर मिथिलांचल) से लगातार आतंकियो के जुड़ते तार ने बिहार को आतंकियों का सेफ जोन बना दिया है। कैसे, कब और क्यों यह प्रदेश आतंकियो का ठिकाना बन गया। आईये डालें एक पैनी नजर।
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2006
• मुंबई में हुए श्रृंखलाबध्द बम विस्फोटों के मामले में 20 जुलाई 2006 को एटीएस की टीम ने मधुबनी जिले के बासोपटटी गांव से मो. कमाल अंसारी को दबोचा।
2007 • 12 नवंबर 2007 को मधुबनी के रहने वाले मोहम्मद सबाउद्यीन उर्फ फरहान को जयपुर में हुए विज्ञान सम्मेलन के दौरान रामपुर के सीआरपीएफ कैंप पर गोलीबारी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया।
2008
• 9 जुलाई 2008 को यूपी एटीएस ने लखनउ से मधुबनी के ही पप्पू खान को गिरफ्तार किया। दिल्ली के सरोजनी नगर इलाके में हुए बम विस्फोट के मामले में खुफिया तंत्र को उसकी तलाश थी।
• 14 अक्तूबर 2008 को ही यूपी की एटीएस ने मो. खलील को पकड़ा।
2009
• 17 अगस्त 2009 को सुरक्षा तंत्र को तब मिली जब लश्करे तोयबा के आतंवादी उमर मरदानी को दिल्ली में ही दबोच लिया गया जो मधुबनी जिले के बासोपटटी का निवासी था।
2010
• मधुबनी के गंधवारी गांव से मो. शबाउद्यीन को गिरफ्तार किया गया। उसपर रामपुर सीआरपीएफ कैंप पर गोलीबारी करने के आरोप थे।
• अलकायदा के मिर्जा खान को पूर्णिया रेलवे स्टेशन पर पकड़ लिया गया।
2011
• 17 अगस्त 2011 को हुजी के आतंकवादी रियाजुल को सीमांचल के किशनगंज में दबोचा गया।
• 24 नवंबर 2011 को इंडियन मुजाहिदीन के आतंकवादी अहमद जलील और मोहम्मद अजमल को गिरफ्तार किया ।
• नवंबर 2011 में ही समस्तीपुर में चेन्नै की स्पेशल सेल पुलिस ने इंडियन मुजाहिदीन के आतंकवादी इरशाद खान को गिरफ्तार किया।
2012
• 12 जनवरी 2012 को इसी संगठन के नकवी और नदीम को दरभंगा में दबोचा गया। • 6 मई 2012 को कर्नाटक पुलिस ने आतंकी घटनाओं के आरोप में कफील अख्तर को पकड़ा।
2013
• 21 जनवरी को दरभंगा से कुख्यात आतंकी भटकल के सहयोगी दानिश को दबोच लिया गया। दानिश पर मुंबई बम ब्लास्ट के अलावा दो अन्य मामलों की संलिप्तता के आरोप हैं।
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पटना में आतंकी हमले के बाद तो NIA ने जो ताबड़तोड़ गिरफ्तारियाँ की वे सभी सही पायी गयीं। जिनके नाम सामने आये हम सबने उसे जाना। इससे सेक्यूलर राजनीतिज्ञ बेचैन हो उठे। इसी कारण राजनीतज्ञो का एक खास वर्ग NIA को बदनाम करने में लगा हुआ है। इसी कड़ी में गृहमंत्री का आदेश आया था कि "निर्दोष अल्पसंख्यकों को पुलिस गिरफ्तार न करे"। परंतु शिंदे साहब निर्दोष या दोष तो गिरफ्तारी के बाद ही सिद्ध होगा। तब गृहमंत्री के इस आदेश की जबर्दस्त भर्तस्ना हुई थी और इसे सीधे अल्पसंख्यक तुष्टीकरण से जोड़ा गया था। साजिश के तहत अल्पसंख्यकों के मन-मस्तिष्क मे NIA के विरुद्ध मनगढ़ंत तर्क भरे जा रहे है। ये लोग इंडियन मुजाहिद्दीन जैसे खतरनाक आतंकवादी संगठन को भी NIA की परिकल्पना मानते हैं।नरेन्द्र मोदी की रैली के दौरान हुए आतंकी हमलों के बाद सूबे की सियासी फिजा ने एक बड़ी करवट ली है। बिहार के आम आवाम के दिलो-दिमाग में आतंकवाद का मुद्दा हावी हो चुका है। आम चुनावों की दहलीज पर इतने बड़े करवट की आहट शायद बिहार के राजनीतिज्ञ समझ ही नहीं पा रहे। मेरा व्यक्तिगत आकलन है कि बिहार से जदयू को निराशा मिलनी तय है और इसके लिए नीतिश की नासमझी ही जिम्मेदार होगी। इन राजनीतिज्ञों को अल्पसंख्यक और आतंकवाद का फर्क समझना होगा। मुस्लिम समाज का भी एक बड़ा वर्ग इस तथाकथित सेक्युलर राजनीति से निराश है। इनके अनुसार आरोपियों को अल्पसंख्यक होने का लाभ मिल रहा है और इस कारण अपने ही देश में उनकी छवि खराब हो रही है।
Amit Sinha is a bilingual Columnist. He can be contacted at facebook.amit
