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पिछले सप्ताह राजधानी के श्रीकृष्ण मेमोरियल सभागार में "इंजीनीयर" होने का घमंड मुख्यमंत्री के दिल से चलकर जुबां तक आ गया। जोश में यह भी कहने से नहीं चूके की राज्य में कभी इतने पुलों का निर्माण हुआ था। मगर इंजीनियर साहब, जब आप 8 बर्षों में गाँधी सेतु की मरम्मत नहीं करा सके तो पुलों का सब्जबाग मत दिखाईये। बिहार पुल निर्माण निगम के दूसरी पंक्ति के अधिकारियों की मानें तो मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के शासन में गैर-जरूरी पुलों की बाढ़ आ चुकी है। ठेकेदारों और आला अधिकारियों ने निजी स्वार्थों के कारण ऐसी-ऐसी जगहों पर पुल बनवा दिये है जिनपर चढ़ना लोगों की मजबूरी बन गई है। और जहाँ मजबूरी थी वहाँ पुल आज भी नदारद। परंतु बात जब गाँधी सेतु की मरम्मती की आती है तो सब चुप। और जो बोलते हैं वे केंद्र को कोसते हैं। बात सीधी है। बात राजनीतिक है। बात राज्य सरकार के निजी जिद की है। दरअसल बिहार सरकार गाँधी सेतु को एक राजनैतिक मुद्दे के रूप में बने रहना देना चाहते हैं। पिछले बर्ष तक राष्ट्रीय राजमार्ग की नजरअंदाजी को लेकर केंद्र को कोसते आपके बयान अखबारों की सुर्खियाँ हुआ करते थे। हर दूसरे दिन हर राजनैतिक और गैर-राजनैतिक मंच से इतना दंभ भरा जाता था कि बिहार जैसा अल्पआय वाला राज्य अपने दम पर एनएच की चौड़ाई और निखार बढ़ा लेगा। जिला मुख्यालयों से राजधानी की सड़क दूरी को समय की इकाई में बाँधने वाले "हूजूर" क्या बता पायेंगे कि क्यूँ पूरे पर्व के दौरान 6 घंटो में रेंगते रूकते वाहन गांधी सेतु को भी पार न कर सके।
दीवाली और छठ के दौरान दूर-दूर से अप्रवासी बिहारी अपने घरों को आये थे। उनके पास सीमित समय था। उनके पास पैसा था पर आपने संसाधन नहीं दिया। क्या गुजरात, महाराष्ट्र, चंडीगढ़ जैसे बेहतर सड़क संसाधन वाले राज्यों से बमुश्किल छुट्टी निकालकर, रेलवे के रेलमपेल के बाबजूद पटना पहुँचने पर आपने उन्हें निराश नहीं किया?
सप्ताहांत तक गाँधी सेतु पर 8-9 घंटे तक भीषण जाम लगता रहा। पुराने फटेहाल बसों में बच्चे दूध तक के लिए तरस गये। 10 रूपये की बोतल पानी 60-70 रूपये में बिकी। बीच पुल पर वाहनों में फँसी महिलाओं के लिए स्थिति शर्मनाक हो गई। 2-3 घंटों के बाद लोग वाहन छोड़ 3-4 किमी. की लंबी दूरी सर पर सामान ढोते देखे गए।
वाकई यह ऐसा दृश्य था जो उद्देलित करता था कि ऐसी सरकारों पर मुकदमें हो और इन्हें जेल में डाल दिया जाये। रिलायंस, महिन्द्रा और आपके इंवेस्टर्स जब आयें तो आयें - परंतु ये अप्रवासी बिहारी ही हमारे रीयल इंवेस्टर है। आपके शासन ने इन्हें बार-बार निराश किया है और इन्हें खीझ इस बात की "आपने किया क्या"?
Amit Sinha is a bilingual journalist. You can join him on facebook.amit.

