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मेरी मजबूरियों को इल्जाम न दो

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मुहब्बत और नफरत के अफसाने

अगर तूमने देखी नहीं है इन आँखो की दहकती गर्मी
तो आकर मेरी जमीं पर इस नफरत का इम्तहान न लो
मेरी मजबूरियों को इल्जाम न दो

इतनी आसानी से नफरत के अफसाने रूकते नहीं
इसलिए इन धमाकों से बताया है तुम्हें
हमारी मोहब्बत का यूँ इम्तहान न लो

मुझपर उनकी रहमत को तुम बर्खास्त न करो
मझे सता से बेदखल कर देंगे, तुम ऐसे दर्खास्त न करो
अब जैसा भी है, उसे तुम बदनाम न करो

सिर्फ एहसास करो, और रूह से महसूस करो
उनके लिए मेरी मुहब्बत या कहूँ मजबूरी
पर तुम यूँ इम्तहान न लो

मेरी मजबूरी को प्यार ही कहने दो, कोई और नाम न दो
उनके लिए मेरी मुहब्बत का तुम यूँ इम्तहान न लो

होठ कहना चाहते तो बहुत कुछ, पर जिगर न हुआ
इसलिए काँपते होठों से कभी मैने तेरा नाम न लिया, बस हर बार इशारा ही किया
मेरी मजबूरियों को इल्जाम ना दो

Amit Sinha is a bilingual journalist. He can be contacted at facebok.amit