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The 24*7 Indian media

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पोलिंग बूथों पर वोटरों की लंबी कतार की तस्वीरें एक स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है। परंतु बेहतर लोकतंत्र को प्रतिबिंबित करते इन दृश्यों का रोमांच तब काफूर हो जाता है जब यही कतार राशन-किराशन और पानी के टैंकरों के पीछे दूगनी होती दिखती है। एक दिनी रोमांच को पूरे पांच साल तक भुगतती आम अवाम लगातार ठगी गई है। ऐसे में प्रासंगिक है कि विकल्पों को तवज्जो मिले।
अब चूँकि केजरीवाल ने बतौर मुख्यमंत्री दिल्ली की सता संभाल ली है और उनके मंत्रियों ने सोमवार को दिल्ली की सर्द सुबह 9:15 बजे दिल्ली सचिवालय पहुँच कर अफसरशाही को स्पष्ट संकेत दे दिया है कि अब आवो- हवा बदलने वाली है। सोमवार सुबह डायरिया और तेज बुखार के कारण अरविंद सचिवालय नहीं जा सके हालांकि दिल्ली जल बोर्ड के बड़े अधिकारियों के साथ अपने घर पर एक मैराथन मीटिंग कर 5 बजते-बजते मुफ्त पानी की घोषणा कर दी गई। इस प्रकार केजरीवाल ने अपने पहले वादे को पूरा किया। परंतु जिस प्रकार पूरे दिन मीडिया और विशलेषक पंडितों ने सोशल मीडिया पर अपरिपक्वता दिखाई वह शर्मनाक है। 

इसके पहले शनिवार को शपथ लेने के साथ ही छुट्टी का दिन होने के बाबजूद केजरीवाल कैबिनेट की पहली मीटिंग हूई और वीआईपी गाडियों और लाल बत्तियों पर रोक लगाने के आदेश पारित किये गये। 

दिल्ली, एक ऐतिहासिक शहर है। एक राष्ट्रीय राजधानी है। मैट्रोपोलिटन सिटी है। इतिहास, राजनीति और आधुनिकता का अद्भुत संगम है दिल्ली। आजादी के बाद भारत की इस नगरी ने कई ऐतिहासिक मोड़ देखे है। परंतु शुरूआती दिनों से कांग्रेस ने ही यहाँ अपना आधिपत्य रखा है। हालांकि भाजपा को दिल्ली राज्य में शासन का पहला मौका 1992 में मदन लाल खुराना के रूप में मिला। परंतु 5 साल में तीन मुख्यमंत्री बदल कर विभिन्न आरोपों के बीच पार्टी ने अपनी पकड़ खो दी।

इतिहास गवाह है कि दिल्ली ने कांग्रेस और भाजपा के अलावे किसी अन्य दल को गंभीरता से नहीं लिया। अण्णा के विशुद्ध गैर-राजनैतिक आंदोलन की पृष्ठभूमि में उभरे अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने जिस मजबूती से इन दो ध्रुवों को चुनौती दी है वह दिलचस्प तो है ही, एक वृहद राजनैतिक करवट की आहट भी है। दिल्ली चुनाव परिणामों में केजरीवाल की ताकत मात्र सीटों के आंकड़ों में देखना समकालीन राजनैतिक मठाधीशों की गंभीर चूक होगी। केजरीवाल सिर्फ राजनीति और चुनावों तक सीमित नहीं हैं। वे एक ऐसे शख्स के रूप में उभर चुके हैं जहाँ उन्होने भ्रष्ट राजनीतिक परिदृश्यों में एक ईमानदार एवं मजबूत विकल्प प्रस्तुत की है 

निःसंदेह ‘आप’ ने भारतीय राजनीति में नैतिक मानदंडो को इतना उँचा कर दिया है कि दिल्ली चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी सिर्फ चार विधायकों का जुगाड़ करने से परहेज करने लगी। हालांकि केंद्र में वाजपेयी सरकार का विश्वास मत सिर्फ एक वोट से गिर जाना भाजपा के इस दावे का समर्थन करते हैं कि वह जुगाड़ में यकीन नहीं करती। परंतु झारखंड में झामुमो, यूपी में मायावती की बसपा, कर्नाटक में यदुरप्पा प्रकरण के कारण बार-बार भाजपा की छवि को नुकसान हुआ है और सता के प्रति उसके आकर्षण को भी प्रतिबिंबित करता है।

बीते 8 दिसंबर को दिल्ली चुनावों के परिणाम घोषित होने के साथ ही जो सियासी हलचल शुरू हुई थी वह थमने 
को तैयार नहीं। मीडिया में लगातार प्रश्न खड़े किये जा रहे है कि केजरीवाल ने जो लोक-लुभावन वादे जनता से किये है, वह मिथक है, अवास्तविक हैं और उन्हे जमीं पर नहीं उतारा जा सकता। मुख्यधारा मीडिया में पूरे महीने केजरीवाल के समर्थन या विरोध में खबरें चलती रही, विशेषज्ञों के पैनल उल-जूलूल काल्पनिक प्रश्नों पर तकरीर करते दिखे। 

भारत की 24*7 मीडिया केजरीवाल के पीछे 24*7 कुछ यूँ पड़ गयी कि अन्य सभी खबरें दम तोड़ती दिखी। पड़ुचेरी में 21 बर्षीय युवती के साथ क्रिसमस की रात दो बार बलात्कार, नांदेड एक्सप्रेस में 26 लोगों के जिंदा जलने, मुजफ्फरनगर में राहत कैंपों पर बुलडोजर चलाये जाने जैसी खास खबरें प्रमुखता से नही आ पाई। इन सब के बीच लगातार मीडिया ट्रायल के बाबजूद केजरीवल ने अबतक इसे अबतक खुद पर हावी नहीं होने दिया है। यह एक शुभ संकेत है और आशान्वित करता है कि आम आदमी से किये गये वादे कम से कम अपने न्यूनतम रूप में जरूर पूरे किये जायेंगे।
Amit Sinha is a bilingual Columnist. He can be contacted at facebook.amit