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स्वच्छ राजनीति की रूमानी तस्वीर

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अरविंद केजरीवाल का यह विश्वास है कि 28 सीट के साथ 'आप' अपना मनिफेस्टो लागू नहीं कर पायेगी और जब भी वह कोई विधेयक पास करना चाहेगी तो 8 विधायकों के साथ बाहरी समर्थन देती कांग्रेस उनकी सरकार गिरा देगी। कांग्रेस का ऐसा इतिहास भी रहा है, इसमें कोई दो मत नहीं है। लेकिन चूँकि दिल्ली मीडिया और राजनीति के केंद्र में है, इसलिए कांग्रेस के लिए ऐसा करना कतई आसान नहीं होगा। फिर, लोकसभा चुनावों की दहलीज पर कांग्रेस ऐसी कोई चूक नहीं करना चाहेगी जिससे उसकी छवि और बदतर हो जाये।

दिल्ली में सरकार बनाकर बतौर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल वह सब कुछ कर सकते हैं जो बाहर रह कर नहीं किया जा सकता। बतौर मुख्यमंत्री वे दिल्ली सचिवालय के उन गोपनीय दस्तावेजों तक पहुँच सकते है जो उन्हें भ्रष्ट कांग्रेसी राज-काज से रूबरू करायेगी। वे पिछले सरकारों के ऐसे संवेदनशील निर्णयों तक पहुँच पायेंगे, उनकी समीक्षा कर पायेंगे जो सता के बाहर रहकर असंभव है। जो इनपुट्स और सूत्र वे बतौर मुख्यमंत्री स्थापित कर पायेंगे वह सबकुछ बिना सता में आये संभव नही है। माना की कांग्रेस के 8 विधायकों की बाहरी मदद से चलती सरकार में इन संवेदनशील सूचनाओं के रहते केजरीवाल कुछ निर्णायक कदम नहीं ले पायेंगे। परंतु कम से कम पिछली भ्रष्ट सरकारों की लूट का रहस्य तो वे समझ ही पायेंगे।

वर्तमान परिस्थितियों में जरूरत है कि दिल्ली में ‘आप’ सरकार बनाये, सटीक सूचनाएं जुटाये, उन्हें श्रृंख्लाबद्ध करे। भ्रष्ट शासन तंत्र की कमजोर कड़ियों को पहचाना जाये। फिर सरकार का क्या है, आप जब चाहे विधानसभा भंग करवा दें। पुर्नचुनाव में जायें। जोरदार वापसी करें और इन भ्रष्ट तंत्र की चूलें हिला दें। 

राजधानी दिल्ली में देश के बेहतरीन उच्च शिक्षण संस्थान हैं। इन संस्थानों पर नामांकन का अत्यधिक दबाब है और 99 प्रतिशत की कट-आफ मार्क्स सामान्य बात हो गई है। इसी कारण जेएनयू, डीयू, जामिया जैसे दिग्गज संस्थानों के रहते दिल्ली के युवा नामांकन से वंचित रह जाते है। परंतु एक हैरत करने वाली बात यह है कि दिल्ली के कई कालेजों में सीट खाली रह जाती है, परंतु विधार्थी ही नही आते। ऐसे ज्यादातर कालेज दिल्ली सरकार के अधीन हैं। दीन दयाल उपाध्याय कालेज, सुखदेव कालेज, इंदिरा गाँधी इस्टीच्यूट समेत 12 ऐेसे उच्च शिक्षण संस्थान हैं जिसकी पूरी जिम्मेदारी दिल्ली सरकार की है, और इनमें हर सेशन में कुछ सीटें खाली रह जाती हैं। 


दरअसल, विधार्थियों के इस मिजाज के पीछे दिल्ली सरकार की अकर्मण्यता ही है। क्लासें ढंग से नहीं चलती हैं। विज्ञान के लिए प्रयोगशालायें बंद पड़ी है। दिल्ली सरकार की ओर से मिलने वाले विशेष मद Grant-In-Aid (GIA) की भारी-भरकम राशि हर बर्ष खर्च भी हो जाती है परंतु नतीजा सिफर। यूजीसी से मिलनेवाली फंड का इस्तेमाल नहीं हो पाता। बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था कायम कर इन कालेजों की तस्वीर बदली जा सकती है। दिल्ली के गुरू तेग बहादुर विश्र्वविधालय की स्थापना 1998 में दिल्ली सरकार ने ही की थी जो काफी अच्छी स्थिति में है। फिर दिल्ली सरकार के बाकी कालेज भी जीटीबी की तर्ज पर बेहतर संचालित क्यों नहीं किये जा सकते। 'आप' यदि सरकार बनाती है तो इस मुद्दे को भी एक चुनौती के रूप में ले सकती है।
यदि स्वास्थय सेवाओं की बात करें तो दिल्ली में 40 ऐसे बड़े अस्पताल हैं जो दिल्ली सरकार चलाती है। दिल्ली कैंसर संस्थान, अंबेदकर अस्पताल तथा राजीव गाँधी सुपर स्पेशियलीटी अस्पताल इनमें से कुछ बड़े नाम है। इन चार-पांच को छोड़कर बाकी सभी की स्थिति दयनीय है। पुर्नविकास और अन्यमदों में आनेवाली धनराशि की बंदरबांट जारी है। बतौर सरकार ‘आप’ इसपर लगाम लगा सकती है। शिक्षा और स्वास्थय का सिर्फ यह दो मुद्दा व्यापक जनहित का है। ‘आप’ अपने मेनिफस्टो से दिगर इन जनहित के मुद्दों को आधार बना कर काम शुरू कर सकती है। बिजली बिल, पानी जैसे वे मुद्दे जिसपर कांग्रेस उनकी सरकार का समर्थन नहीं करे उसे टाला जा सकता है। जब 1992 में दिल्ली राज्य बनने के बाद से अबतक 22 बर्षों तक दिल्लीवासियों ने इतना कुछ झेला है तो 6 माह और सही। 

‘आप’ देश की राजनीती में स्थापित भ्रष्ट परंपराओं को तो़ड़ने की दहलीज पर है। आप ने अपने मनीफस्टो में जिक्र भी किया है कि उनका कोई भी विधायक लालबत्ती की गाड़ी नहीं लेगा, बड़ा सरकारी बंगला नहीं लेगा, भारी-भरकम सिक्योरीटी नहीं लेगा। बीते सप्ताह दिल्ली पुलिस ने अरविंद केजरीवाल को विशेष सुऱक्षा मुहैया कराने का प्रस्ताव रखा जिसे उन्होने उसी वक्त ठुकरा दिया। यह अत्यंत प्रशंसनीय और उदाहरणीय है। अगर केजरीवाल सरकार बनाते है तो ऐसे कई मौके आने निश्चित हैं जो कि कई जनप्रिय मान्यताओं को जन्म देंगे। 

कुछेक पलों के लिए फर्ज कीजिए की ‘आप’ सरकार बनाती है और केजरीवाल मुख्यमंत्री बनते हैं। मुख्यमंत्री केजरीवाल दिल्ली में आम आदमी की तरह सड़क पार करते हैं और मेट्रो से सफर करते है। सिर्फ 2-4 सादी वर्दीधारी उनके सुरक्षा में होते है। उनका मंत्रिमंड़ल डीटीसी बसों से सफर करता है। यह परिकल्पना सिर्फ एक रूमानी तस्वीर नहीं है। वर्तमान भारतीय राजनीतीक परिदृश्य में सिर्फ केजरीवाल ही वे शख्स है जो इस दृश्य को फलक से जमीं पर उतार सकते हैं। इस तरह 'आप' आगामी 6 महीने में एक ऐसा मानदंड स्थापित कर सकती है जो सिर्फ दिल्ली ही नहीं पूरे देश की सियाशी फिंजा बदल सकेगी। इन सबके लिए न तो विधानसभा में बिल पास करने होंगे और न ही कांग्रेस के 8 विधायकों पर निर्भर रहना होगा।
Amit Sinha is a bilingual Columnist. He can be contacted at facebook.amit