इस साल के आखिरी सप्ताह ने पूरे साल के भ्रष्टाचार विरोधी संघर्ष पर पानी फेर दिया है। इसी सप्ताह साल भर का यह संघर्ष जबरदस्त जोश के साथ चरम पर पहुँच गया और वहीं जाकर चकनाचूर भी हो गयाय़ इस त्रासदी का एक हिस्सा मुंबई के MMRDA मैदान और दूसरा हिस्सा हमारी संसद के दोनों सदनों में दिखाई दिया। दोनों जगहों से सुखद संभावनाओं के साथ देशवासी नए साल का इंतजार कर रहे थे, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि भ्रष्टाचार विरोधी जनभावना के लिहाज से ये असफलतायें अस्थायी सिद्ध हों। इन कड़वे अनुभवों से सबक लेकर सभी जनतांत्रिक शक्तियां आगे सावधानी से काम करें तो नए साल में भ्रष्टाचार विरोधी मुहीम शायद किसी मुकाम तक पहुंच सके। यह भी सही है कि लोकपाल के मामले पर बहुत जल्दबाजी में और बहुत ज्यादा पाने की आशा की गई थी, जो कि शायद उचित भी नहीं था।
2011 में देश के इतिहास में पहली बार सत्तारूढ़ सरकार ने पूरी संसद से इतर सिविल सोसायटी नाम के एक एनजीओ के पांच प्रतिनिधियों से बराबर के स्तर पर वार्ता करनी पड़ी। अण्णा की अगुआई में इस एनजीओ ने सरकार से बातचीत नाकाम होने पर 16 अगस्त 2011 को रामलीला मैदान में धरने पर बैठी। राजनीतिक हलकों में इस आंदोलन ने भूचाल खड़ा कर दिया। अण्णा के आमरण अनशन, व्यापक जनसमर्थन और मीडिया के स्वंय संज्ञान लेने के कारण ऑदोलन के प्रथम दिन ही सरकार घुटनों पर दिखी और अंततः प्रधानमंत्री और लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार के संसद के अंदर से अण्णा से उनका अनशन तोड़ने का अनुरोध किया। राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय मीडिया के सम्मुख संसद को तीन बिंदओं पर अपना संकल्प स्पष्ट करना पडा – और तत्पश्चात् ही अण्णा ने अनशन खत्म किया। हालांकि ऑदोलन जारी रहा और देश की जनता अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के आचरण को पढ़ती रही।
साल 2011 के इस आखिरी सप्ताह में मुंबइ और दिल्ली की नाटकीय घटनाओं ने यह सिद्ध कर दिया कि चमत्कार दोहराना हमेशा मुशिकल होता है। अन्ना हजारे के आंदोलन को मुंबई मे व्यापक जनसमर्थन नहीं मिलने के नाना कारण हे सकतें हैं जिसपर सत्तारूढ़ दल के लोग अपनी खुशी जता सकते हैं, परन्तु अन्ना के स्वास्थ को देखते हुए तीन दिनों के सांकेतिक अनशन को दूसरे दिन ही वापस लिया जाना भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई के लिए अच्छा ही माना जायेगा। जनलोकपाल के लिए शुरु हुई इस लडाई का अण्णा एक ऐसा चेहरा बन चुके है, जिसपर भारतीय जनमानस को सहज ही भरोसा हो जाता है। ऑदोलन के लंबे खिंचे जाने पर लोगों का भरोसा बना रहना बहुत जरुरी है, इसलिए अण्णा के स्वास्थय को लेकर ऐसे निर्णय निशिचत ही स्वागतयोग्य हैं।
भ्रष्टाचार विरोधी ऑदोलन के इस पडाव पर टीम अण्णा को निश्चित ही अत्यधिक संभल कर चलने की जरूरत है। कांग्रेस के रवैये से जहां लोकपाल बिल संसद के अंदर और बाहर लटकता रहा है और जिस प्रकार कांग्रेस के छुट्भैया नेता अण्णा के खिलाफ जहर उगल रहें है, अपशब्दों का प्रयोग कर रहें है – टीम अण्णा का कोई भी पलटवार भ्रष्टाचार विरोधी न रहकर कांग्रेस विरोधी हो जाता है – जो कतई इस पूरे ऑदोलन का मकसद नहीं है। हाँ यह सच है कि कांग्रेस का अहंकारी रवैया उसे आगामी पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में समस्या कर सकता है। वैसे सच कही जाये तो कांग्रेस इस बात को मानकर चल रही है कि युपी को छोडकर अन्य चार राज्यों में उसे नुकसान उठाना तय है। ऐसे में यह कांग्रेस जहां एक तरफ युपी में राहुल फैक्टर के भरोसे चुनाव रण में कुद रही है वहीं केंद्र की तर्ज पर राज्यों में भी गठबंधन सरकार बनाने के लिए सहर्ष तैयार दिख रही है। उत्तर प्रदेश में ऱाष्ट्रीय लोकदल से चुनाव पुर्व गठबंधन के एवज में इस पार्टी के अध्यक्ष और किसान नेता अजित सिंह को केंद्र में नागरिक उड्डयन मंत्रालय जैसा मलाईदार पद दिया जाना यह स्पष्ट कर देता है कि सत्ता में बने रहने के लिए गठबंधन के अलावा कांग्रेस वह सब कुछ करने के लिए तैयार है जिसे लोकतंत्र के लिए खतरा बताया जाता है।
उद्डंता और अभद्रता के सभी मापदंड को पार करती कांग्रेस अपने ही जाल में फंसती जा रही हैं। मीडिया के सर्वव्यापकता के कारण आज की सत्तारूढ़ कांग्रेस वह सब कुछ छुपा पाने में नाकाम है जो श्रीमती इंदिरा गांधी के समय किया जा सका था। इस सत्तारूढ़ संप्रग (कांग्रेस) की कार्य प्रणाली लगभग वही दशकों (पीढ़ीयों) पुरानी है लेकिन मीडिया के जागरण और सोशल मीडिया के प्रभाव के कारण आज वह सब कुछ छुपाना असंभव है। इसलिए प्रश्न सिर्फ लोकपाल या जनलोकपाल को लेकर नहीं है अथवा बात सिर्फ भ्रष्टाचार के दायरे में ही नही रह गया है। भारतीय जनमानस की संवेदनाओं को प्रभावित कर सकने वाली इन उपकरणों के कारण आज एक व्यापक जनजागरण हुआ है और सरकार को यह मानना होगा कि लोकशाही ही सर्वोच्च है और सभी को उसका सम्मान करना ही होगा।
इस पूरे ऑदोलन के गैर-राजनीतिक होने के कारण ही इसे व्यापक जनसमर्थन मिला। अब जब टीम अण्णा ने कांग्रेस से नाराज होकर आगामी पांच राज्यों के चुनाव में कांग्रेस के विरोध में प्रचार करने का मन बनाया है तो इस बात का आकलन करने का समय आ गया है कि चुनावों में टीम अन्ना के कांग्रेस विरोधी मुहिम का कितना प्रभाव पड़ेगा। वोटरों के लिये य़ह एक दुविधापूर्ण स्थित है। आम वोटर अगर कांग्रेस का विरोध करे तो समर्थन किसका करे? इसका सीधा फायदा जहां स्थानीय प्रमुख विपक्षी दलों को हो सकता है वहीं कई राज्यों में यह गणित सभी दलों और वोटरों को उलझा भी सकता है। अगर यह मान लिया जाये कि अण्णा कि मुहिम से प्रभावित होकर ज्यादातर मतदाता कांग्रेस को वोट नहीं देते हैं तो उनके पास विकल्प क्या बच जाते हैं? समाज के एक बहुत बड़े तबके में प्रमुख विपक्षी दल भाजपा की छवि अभी भी सांप्रदायिक एवं अविशवशनीय ही है- ऐसी स्थित में वोटर तीसरे विकल्प की तलाश में क्षेत्रीय दलों या फिर निर्दलीय नेता को वोट देंगे। इस प्रकार मुस्लिम बहुल और गैर भाजपाई क्षेत्रों से कुछ ऐसे लोग चुनकर विधान सभाओं में होंगे जो किसी के प्रति जिम्मेदार नहीं होंगें। इस प्रकार कोई भी एक पार्टी बहुमत में होगी यह सोचना भी बेमानी होगी। इस प्रकार 4-5 छोटी पार्टियों और निर्दलीय से मिलकर बनी सरकार न तो स्थायी होगी और न ही उनके पास विकास का कोई अजेंडा होगा। बनते बिगड़ते समीकरणों में सभी अपने निजी स्वार्थ साधने की कोशिस करेंगे और संबधित राज्यों में विधायकों के खरीद-फरोख्त का खेल चल पडेगा। इससे भ्रष्टाचार ब़ढेगा, अराजकता फैलेगी और शासन विफल होगा। फलतः जनता अपने को ठगी महसूस करेगी और ऐसी स्थिति की परिकल्पना शायद टीम अन्ना ने न की हो।
जब तक राइट टू रिजेक्ट और राइट टू रिकाँल जैसे कानून भारत में लागू नहीं हो जाते हैं तब तक विधानसभा या सांसद सदस्यों को आप जिम्मेदार नहीं बना सकते है। इसलिए वोटरों का किसी एक पक्ष में ध्रुवीकरण जहां असरकारक होगा वहीं किसी एक पक्ष के विरोध में वोटों का बंटवारा कर आप उस दल को सजा तो दे सकते हैं परंतु किसी मुकाम पर नहीं पहुंच सकते। एक स्वस्थ राजनीतिक उद्देश्य के लिए आपको वोटरों के सम्मुख एक विकल्प देना ही होगा अगर आप उनसे एक विकल्प वापस ले रहें है। हालांकि इससे टीम अन्ना का राजनीतिकरण हो जाएगा और हो सकता है इसके साईड इफेक्टस भी हों। इससे बचने के लिए कई उपाय हो सकते है जिसपर चर्चा और मंथन जरुरी है। हम कह सकते हैं कि भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का कांग्रेस के प्रति गुस्सा जहां एक तरफ नैसर्गिक है वहीं उसके तरीकों और उससे उपजे परिणाम की परिकल्पना भी जरुरी है।
2011 में देश के इतिहास में पहली बार सत्तारूढ़ सरकार ने पूरी संसद से इतर सिविल सोसायटी नाम के एक एनजीओ के पांच प्रतिनिधियों से बराबर के स्तर पर वार्ता करनी पड़ी। अण्णा की अगुआई में इस एनजीओ ने सरकार से बातचीत नाकाम होने पर 16 अगस्त 2011 को रामलीला मैदान में धरने पर बैठी। राजनीतिक हलकों में इस आंदोलन ने भूचाल खड़ा कर दिया। अण्णा के आमरण अनशन, व्यापक जनसमर्थन और मीडिया के स्वंय संज्ञान लेने के कारण ऑदोलन के प्रथम दिन ही सरकार घुटनों पर दिखी और अंततः प्रधानमंत्री और लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार के संसद के अंदर से अण्णा से उनका अनशन तोड़ने का अनुरोध किया। राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय मीडिया के सम्मुख संसद को तीन बिंदओं पर अपना संकल्प स्पष्ट करना पडा – और तत्पश्चात् ही अण्णा ने अनशन खत्म किया। हालांकि ऑदोलन जारी रहा और देश की जनता अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के आचरण को पढ़ती रही।
साल 2011 के इस आखिरी सप्ताह में मुंबइ और दिल्ली की नाटकीय घटनाओं ने यह सिद्ध कर दिया कि चमत्कार दोहराना हमेशा मुशिकल होता है। अन्ना हजारे के आंदोलन को मुंबई मे व्यापक जनसमर्थन नहीं मिलने के नाना कारण हे सकतें हैं जिसपर सत्तारूढ़ दल के लोग अपनी खुशी जता सकते हैं, परन्तु अन्ना के स्वास्थ को देखते हुए तीन दिनों के सांकेतिक अनशन को दूसरे दिन ही वापस लिया जाना भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई के लिए अच्छा ही माना जायेगा। जनलोकपाल के लिए शुरु हुई इस लडाई का अण्णा एक ऐसा चेहरा बन चुके है, जिसपर भारतीय जनमानस को सहज ही भरोसा हो जाता है। ऑदोलन के लंबे खिंचे जाने पर लोगों का भरोसा बना रहना बहुत जरुरी है, इसलिए अण्णा के स्वास्थय को लेकर ऐसे निर्णय निशिचत ही स्वागतयोग्य हैं।
भ्रष्टाचार विरोधी ऑदोलन के इस पडाव पर टीम अण्णा को निश्चित ही अत्यधिक संभल कर चलने की जरूरत है। कांग्रेस के रवैये से जहां लोकपाल बिल संसद के अंदर और बाहर लटकता रहा है और जिस प्रकार कांग्रेस के छुट्भैया नेता अण्णा के खिलाफ जहर उगल रहें है, अपशब्दों का प्रयोग कर रहें है – टीम अण्णा का कोई भी पलटवार भ्रष्टाचार विरोधी न रहकर कांग्रेस विरोधी हो जाता है – जो कतई इस पूरे ऑदोलन का मकसद नहीं है। हाँ यह सच है कि कांग्रेस का अहंकारी रवैया उसे आगामी पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में समस्या कर सकता है। वैसे सच कही जाये तो कांग्रेस इस बात को मानकर चल रही है कि युपी को छोडकर अन्य चार राज्यों में उसे नुकसान उठाना तय है। ऐसे में यह कांग्रेस जहां एक तरफ युपी में राहुल फैक्टर के भरोसे चुनाव रण में कुद रही है वहीं केंद्र की तर्ज पर राज्यों में भी गठबंधन सरकार बनाने के लिए सहर्ष तैयार दिख रही है। उत्तर प्रदेश में ऱाष्ट्रीय लोकदल से चुनाव पुर्व गठबंधन के एवज में इस पार्टी के अध्यक्ष और किसान नेता अजित सिंह को केंद्र में नागरिक उड्डयन मंत्रालय जैसा मलाईदार पद दिया जाना यह स्पष्ट कर देता है कि सत्ता में बने रहने के लिए गठबंधन के अलावा कांग्रेस वह सब कुछ करने के लिए तैयार है जिसे लोकतंत्र के लिए खतरा बताया जाता है।
उद्डंता और अभद्रता के सभी मापदंड को पार करती कांग्रेस अपने ही जाल में फंसती जा रही हैं। मीडिया के सर्वव्यापकता के कारण आज की सत्तारूढ़ कांग्रेस वह सब कुछ छुपा पाने में नाकाम है जो श्रीमती इंदिरा गांधी के समय किया जा सका था। इस सत्तारूढ़ संप्रग (कांग्रेस) की कार्य प्रणाली लगभग वही दशकों (पीढ़ीयों) पुरानी है लेकिन मीडिया के जागरण और सोशल मीडिया के प्रभाव के कारण आज वह सब कुछ छुपाना असंभव है। इसलिए प्रश्न सिर्फ लोकपाल या जनलोकपाल को लेकर नहीं है अथवा बात सिर्फ भ्रष्टाचार के दायरे में ही नही रह गया है। भारतीय जनमानस की संवेदनाओं को प्रभावित कर सकने वाली इन उपकरणों के कारण आज एक व्यापक जनजागरण हुआ है और सरकार को यह मानना होगा कि लोकशाही ही सर्वोच्च है और सभी को उसका सम्मान करना ही होगा।
इस पूरे ऑदोलन के गैर-राजनीतिक होने के कारण ही इसे व्यापक जनसमर्थन मिला। अब जब टीम अण्णा ने कांग्रेस से नाराज होकर आगामी पांच राज्यों के चुनाव में कांग्रेस के विरोध में प्रचार करने का मन बनाया है तो इस बात का आकलन करने का समय आ गया है कि चुनावों में टीम अन्ना के कांग्रेस विरोधी मुहिम का कितना प्रभाव पड़ेगा। वोटरों के लिये य़ह एक दुविधापूर्ण स्थित है। आम वोटर अगर कांग्रेस का विरोध करे तो समर्थन किसका करे? इसका सीधा फायदा जहां स्थानीय प्रमुख विपक्षी दलों को हो सकता है वहीं कई राज्यों में यह गणित सभी दलों और वोटरों को उलझा भी सकता है। अगर यह मान लिया जाये कि अण्णा कि मुहिम से प्रभावित होकर ज्यादातर मतदाता कांग्रेस को वोट नहीं देते हैं तो उनके पास विकल्प क्या बच जाते हैं? समाज के एक बहुत बड़े तबके में प्रमुख विपक्षी दल भाजपा की छवि अभी भी सांप्रदायिक एवं अविशवशनीय ही है- ऐसी स्थित में वोटर तीसरे विकल्प की तलाश में क्षेत्रीय दलों या फिर निर्दलीय नेता को वोट देंगे। इस प्रकार मुस्लिम बहुल और गैर भाजपाई क्षेत्रों से कुछ ऐसे लोग चुनकर विधान सभाओं में होंगे जो किसी के प्रति जिम्मेदार नहीं होंगें। इस प्रकार कोई भी एक पार्टी बहुमत में होगी यह सोचना भी बेमानी होगी। इस प्रकार 4-5 छोटी पार्टियों और निर्दलीय से मिलकर बनी सरकार न तो स्थायी होगी और न ही उनके पास विकास का कोई अजेंडा होगा। बनते बिगड़ते समीकरणों में सभी अपने निजी स्वार्थ साधने की कोशिस करेंगे और संबधित राज्यों में विधायकों के खरीद-फरोख्त का खेल चल पडेगा। इससे भ्रष्टाचार ब़ढेगा, अराजकता फैलेगी और शासन विफल होगा। फलतः जनता अपने को ठगी महसूस करेगी और ऐसी स्थिति की परिकल्पना शायद टीम अन्ना ने न की हो।
जब तक राइट टू रिजेक्ट और राइट टू रिकाँल जैसे कानून भारत में लागू नहीं हो जाते हैं तब तक विधानसभा या सांसद सदस्यों को आप जिम्मेदार नहीं बना सकते है। इसलिए वोटरों का किसी एक पक्ष में ध्रुवीकरण जहां असरकारक होगा वहीं किसी एक पक्ष के विरोध में वोटों का बंटवारा कर आप उस दल को सजा तो दे सकते हैं परंतु किसी मुकाम पर नहीं पहुंच सकते। एक स्वस्थ राजनीतिक उद्देश्य के लिए आपको वोटरों के सम्मुख एक विकल्प देना ही होगा अगर आप उनसे एक विकल्प वापस ले रहें है। हालांकि इससे टीम अन्ना का राजनीतिकरण हो जाएगा और हो सकता है इसके साईड इफेक्टस भी हों। इससे बचने के लिए कई उपाय हो सकते है जिसपर चर्चा और मंथन जरुरी है। हम कह सकते हैं कि भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का कांग्रेस के प्रति गुस्सा जहां एक तरफ नैसर्गिक है वहीं उसके तरीकों और उससे उपजे परिणाम की परिकल्पना भी जरुरी है।
