पटना विश्विद्यालय में 28 बर्षों बाद
हुए छात्र संगठन चुनाव के शांतिपूर्ण समापन पर सभी ने राहत की सांस ली है। लगभग एक
महीने तक युवा उर्जा से लवरेज इस पुरे चुनावी प्रकरण से विश्विधालय के शैक्षणिक
आभामंडल पर पड़ने वाले प्रभावो पर कयास चाहे जो भी लगायें जायें एक बात तय है कि
इस चुनाव में कोई भी गंभीर और वैचारिक दृढ उम्मीदवार नजर नहीं आया। यहां तक की वाम
दलों की राजनीति में भी परिपक्वता का अभाव स्पष्ट दिखा।
लगभग तीन दशकों के बाद हुए इन
छात्र संघ चुनाव परिणामों पर किसी गंभीर विश्लेषण की आवशयकता हो न हो, यह कतई
महत्वपूर्ण है कि निकट भविष्य में इस चुनाव की सार्थकता पर ही गंभीर प्रश्न खड़ा न
होने लगे। चूँकि छात्र संगठन के प्रमुख पदों पर पृथक पार्टियों के समर्थित
उम्मीदवारों ने जीत हासिल की है, इसलिए विश्विधालय में उनके
एकत्रित प्रयास से ही कोई बदलाव संभव है। वर्तमान राजनीतिक या सामाजिक परिदृश्य
में एकता का अभाव सर्वविदित है, फलत: इन छात्र नेताओं के
प्रयास संगठित होगें- ऐसी उम्मीद करना बेमानी है। फिर अकेले किसी एक छात्र या
संगठन के प्रयास से कोई उल्लेखनीय घनात्मक परिवर्तन होगी- ऐसा एक बर्ष के अल्पकाल
में तो संभव नजर नहीं आता है। इसके अलावे एक-दूसरे को नीचा दिखाने कि होड़ मे कहीं
छात्र हितों का ही नुकसान नहीं हो जाए- यह भी गौर करने वाली बात है। राज्य के बाहर
और दिल्ली विश्विद्यालय तक में ऐसे आचरण वक्त-वक्त पर दिखते रहे हैं।
क्या है "राजनीति"
और "राजनेता"
वर्तमान राजनैतिक परिस्थिति
में "राजनेता" एक ऐसा इकलौता शब्द बन चुका है जिसे पर्यायवाची के रुप
में आप किसी भी ऋणात्मक व्यक्तित्व के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। "दबंग", "बाहुबली",
"फरेबी","ठेकेदार",
"बेईमान", "भ्रष्ट",
"अनैतिक", "ठग" और यहाँ
तक की "अपराधी" और "चमचा" भी। एक सफल राजनेता या नेता शब्द से
आज एक ऐसे व्यक्ति की छवि ही उभरती है जो शारीरिक रूप से सबल हो, डरावनी शक्ल हो, सफेद वस्त्रधारी हो और जिसके आस-पास
हमेशा लठैतों की टोली हो - और हाँ, वह किसी बड़ी गाड़ी पर
लाव-लश्कर के साथ ही चलता हो। अधिक गहराई से मनन करें तो इनकी गाड़ी ही ट्रैफिक
नियमों को निर्धारित करती होती है, जिसपर काला शीशा चढा हो।
दरअसल, सबसे पहले तो
यह समझना जरूरी है कि राजनीति है क्या? आज जब हम राजनीति की
बात करते हैं तो जो रूप हमारे सामने आता है वह है भ्रष्टाचार और पतन के दलदल में
आकंठ डूबा, येनकेन
प्रकारेण सत्ता प्राप्ति का जूगाड़ बैठाता एक ऐसा वर्ग जिसके लिए आदर्श केवल
किताबी शब्द है और झूठ-फरेब ही आदर्श। लेकिन क्या राजनीति का बस यही अर्थ होता है?
नहीं - सत्ता की इस पतित राजनीति के बरक्स एक और राजनीति होती है
रचनात्मक परिवर्तन की। अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए संघर्ष ही
राजनीति है।इतिहास को छोड़ भी दें तो क्या कुछ समय पहले तक बिहार के युवा, नीतिश कुमार को अपना आदर्श नहीं मानने लगे थे- यह और बात है कि ओछी
राजनीतिज्ञों और भ्रष्ट पदाधिकारियों की संगत उनके व्यक्तित्व पर भी हावी हूई और
आज उनपर लगने वाले आरोप कमोबेश सही भी साबित हो रहे है। बिहार के राजनैतिक शीर्ष
पर पिछले 22 बर्षो से काबिज लालू और नीतीश छात्र राजनीति की
ही उपज हैं।
क्यों हो छात्र राजनीति?
प्राय: हर प्रजातांत्रिक
राष्ट्र कि यह विडम्बना रही है कि लोग राजनीति और राजनीतज्ञों को बुरा मानते है।
अभी हाल के हुए अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव भी इससे फितर नहीं है। भारतीय राजनीतिक
पृष्ठभूमि पर गौर करें तो पायेंगे कि देश की स्वतंत्रता के ओजपूर्ण निर्णायक
संघर्षपूर्ण संग्राम में भी अनेकानेक भारतीय परिवारों ने अपनी युवा पी़ढी को इससे
पृथक रखने की कोशिश की है। राजनीति से एक सुरक्षित दूरी बनाये रखने मानसिकता ने
हमेशा से अभिभावकों को अपने बच्चों को राजनीति मे आने से रोका है। बुद्धिजीवी वर्ग
का एक बड़ा घटक यह मानता है कि छात्र जीवन सिर्फ और सिर्फ अध्धयन के लिए है और
राजनीति एवं राष्ट्र निर्माण जैसी बातें महाविद्यालय या विश्वविद्यालय प्रांगण के
बाहर ही होनी चाहिए।
भारतीय युवाओं की क्रांतिकारी
चेतना के प्रतीक “शहीद भगत सिंह ने ‘विद्यार्थी और राजनीति’ नामक लेख लिखकर भारतीय मानसपटल पर फैले इन विचारों का बेहतरीन प्रतिकार
किया था। उनका लेख जहां युवाओं को झकझोर देने में सफल रहा, वहीं
अभिभावकों में उसका प्रभाव सीमित ही रहा। इस मुद्दे पर पृथक विचार हो सकते हैं
परंतु इस संदर्भ में यह जान लेना आवश्यक है कि जिन राष्ट्रों की बुनियाद में युवा
उर्जा या आक्रोश नहीं है वे शिथिल राष्ट्र हैं और अंतराष्ट्रीय परिदृश्य पर उनकी
कोई पहचान नहीं है। ऐसा इसलिए है कि
लोकतांत्रिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए संघर्ष ही “राजनीति”
है, और संघर्ष से ही पहचान बनती है।
इस संदर्भ में एक और बात जान
लेनी बेहद जरूरी है कि कि छात्रसंघ और छात्र राजनीति का अधिकार हमें किसी खैरात
में नहीं मिला है। इसे हमारे पूर्ववर्ती पीढ़ियों ने लम्बे संघर्ष के बाद अपने
खून-पसीने की कीमत पर हासिल किया है। कालांतर में भले ही मुख्यधारा के राजनीतिक
दलों ने इस “संघर्ष की राजनीति” को ‘स्वार्थ
के ट्रेनिंग सेंटर’ में बदल दिया हो लेकिन अपने मौलिक रूप
में यह विरोध और प्रखरता की राजनीति है जिसमें एक छात्र आरंभ से ही अपने लोकतांत्रिक
अधिकारों के लिये संघर्ष करना सीखता है। किताबों के साथ यह भी एक जरूरी पढ़ाई है
जो कहीं और नहीं सीखी जा सकती। इसलिए नवनियुक्त छात्रनेता, “राजनीति”
की वर्तमान व्याख्या को सिरे से खारिज करें और पढ़ाई तथा पढ़ाई के
अधिकार के लिये लड़ाई करें तब ही इन चुनावों की सार्थकता है।
सामाजिक संवेदनहीनता
अपने अधिकारों के लिए लड़ाई
नहीं करने की सीख ही हमारी वर्तमान कुव्यवस्था के लिए उत्तरदायी है। चुप रहने की
इस आदत को हम भले ही अपनी सहिष्णुता का शाब्दिक मुखौटा दें पर यह निशचित ही कायरता
एवं संवदेनशून्यता ही है। सड़क नहीं है तब चुप है, बिजली नही है तब भी चुप हैं। अपराधी
शोषण करे तब चुप हैं, पुलिस अत्याचार करे तब भी चुप है।
अधिकारी काम न करे तब चुप हैं, अधिकारी काम करने के लिए पैसे
माँगे तब भी चुप है। यह खामोश रहने की कैसी ट्रेनिंग मिली है आम भारतीयों को आजादी
के 65 बर्षों मे?
ऐसे दमघोंटू मौहाल में छात्र राजनीति ही एक ऐसा विकल्प दे
सकने में समर्थ है जिससे व्यापक मूलभूत रचनात्मक परिवर्तन हो सकता है जिससे देश
में हर तरह का शोषण समाप्त हो सके और एक जातिविहीन, धर्मविहीन
और वर्गविहीन समाज की स्थापना हो सके। यह तो निश्चित है कि क्रांति के लिए बंदूकों
की नहीं परिवर्तन विचारों की जरूरत है और इसके लिए युवाओं को राजनीति में लाना
आवश्यक है ताकि वे नये आधार से राजनीति की व्याख्या कर सकें क्योंकि पुराने
जीर्ण-शीर्ण व्यक्तिगत स्वार्थ के आधार पर बनाए गए राजनैतिक इमारतों को भ्रष्टाचार
के दीमकों ने संपुर्णत: निगल लिया है।
राजनैतिक अपरिपक्वता
आजा मेरी गाड़ी में बैठ जा की
संस्कृति में पले-बढे इन नव कोपलित राजनीतज्ञों से ज्यादा उम्मीद रखना
बेमानी ही होगा। 2012 छात्रसंघ चुनाव जीतने वाले युवा और संगठन अभी तक विश्विद्यालय प्रशासन मे
अपने प्रभाव को लेकर सशंकित है एवं स्वंय अपने अधिकारों से अनभिज्ञ भी हैं,
इसलिए इन्हे पग-पग पर उचित मार्ग-दर्शन की आवशयकता है। पटना
विश्विघालय छात्र संघ चुनाव में प्रचार के दौरान छात्राओं नें अपने गाल और छाती पर
समर्थित उम्मीदारों का टैटू बनवाकर, नि:संदेह, छायाकारों की पहली पसंद बनी रही, पर ऐसे हथकंड़ो से
उन्होनें अपनी मानसिक संकीर्णता एवं अपरिपक्वता का परिचय ही दिया है जिससे वे आगे
निश्चित ही निराश ही होंगी।