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Delhi: Mall Culture Vs Mind Culture


बीते 16 दिसंबर 2012 की देर शाम दक्षिणी दिल्ली में एक चलती चार्टड बस में सामुहिक बलात्कार की घटना ने एकबारगी पूरे देश को स्तबध कर दिया है। इसी साल जुलाई में हुए गुवाहाटी में लड़की से छेड़खानी प्रकरण ने जो तुल पकड़ा, वह कहीं खो गया था और सनसनी फैलाने की वजह से इलेक्ट्रानिक मीडिया की भूमिका पर सवाल भी उठे थे। चुँकि इस बार की घटना दिल्ली की है फलत: मी़डिया से लेकर नारी संगठनों ने बेहतरीन एवं सराहनीय भूमिका निभाई। इसी का प्रभाव रहा कि 48 घंटे के अंदर इस घटना की गूंज लोकसभा के अंदर भी पुरर्जोर ढंग से सुनी गई। आरोपियों की घर-पकड़ हुई और दिल्ली उच्च न्यायालय ने खुद ही मामले का संज्ञान लिया। शीला दीक्षित की स्थिति शर्मनाक हुई और आनन-फानन में उन्होने कुछ ऐसे बयान भी दिए जो खुद ही इस बात की पुष्टि करते हैं कि अभी तक दिल्ली में सुरक्षा को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के पहले के निर्देशों की अवमानना हो रही है।  ज्ञात्तव है कि 40 मिनट तक दिल्ली की मुख्य सडकों पर दौड़ती इस बस मे काला शीशा और पर्दा चढा होता है जो कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का खुला उल्लंघन है। खैर, तेजी से हुई प्रशासनिक  कार्यवाही का दंभ भरनेवाली दिल्ली पुलिस और सरकार के लिए जो एक बात राहत देने वाली रही कि इस केस में एक भी आरोपी बड़े घराने से ताल्लुक नहीं रखता है वरना अबतक इस सिस्टम को समझ चुकी जनता के गाल पर दुसरा तमाचा भी पड चुका होता और हमारे सामने इस केस की कुछ और ही तस्वीर होती।
जब इंडिया गेट पर 18 और 19 नवंबर को स्वत: जुड़ी भीड़ ने कैंडिल लाईट मार्च निकालकर इस घटना का लेकर अपना जबर्दस्त विरोध प्रकट किया तो सामाजिक जागरुकता को लेकर हर्ष हुआ। अब इसे बेहतर ढंग से एक मुकाम तक पहुंचाने की जरूरत है। देश की सबसे सुरक्षित मानेजाने वाली राष्ट्रीय राजधानी में हुए इस जघन्य अपराध के बाद पूरे देश मे यह बहस चली कि इस मुश्किल दौर मे जबकि नारी के सुरक्षित जीने-चलने के अधिकार पर भी हमले तेज हो चुके है, प्रतिरोध की चेतना का एकजुट होना जरूरी है। हालांकि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अन्ना के आंदोलन के दूसरे अंक के दौरान हिंन्दुस्तान का आम आवाम य़ह महसूस कर चुका है कि प्रतिरोध की भावना सोशल मीडया पर "लाईक", "शेयर", "पोस्ट" और "'ट्वीट" तक ही सीमित न रह जाये। इसके लिए चेतना और एकजुट भावना का संगठित रुप में जमीं पर आना जरूरी है। इतिहास की गहराईयों में न भी जायें हाल के दिनों में मिस्र के तहरीर चौक के "सत्ता परिवर्तन की मांग" से लेकर न्यूयार्क का "आक्यूपाई वाल स्ट्रीट" जैसे आंदोलन कुछ और नहीं बल्कि दुनिया के फलक पर जनसंघर्ष और जनभावना का समग्र ध्रुवीकरण का बेहतरीन नमुना रहा है। कई बार ऐसा हुआ है कि जनांदोलनों ने ही संघर्षों को शुरू किया और मुक्कमल अंजाम तक पहुँचाया है। ऐसा होता रहा हे कि नेताओं से पृथक वृहत्तर एकांकी मुद्दो का संदर्भ लेकर आम अवाम ने ऐसी पटकथा लिख डाली है जिससे तब वे खुद अपरिचित थे। भारत में 1975 के दौर में हुआ जयप्रकाश नारायण के आंदोलन को इतिहासकारों ने इसका बेहतरीन उदाहरण माना है।

औरत के आत्मनिर्णय के अधिकार पर मर्द दबंगई को किनारा दे देने की वर्तमान भारतीय सामाजिक परिस्थिति एक संक्रमण काल से गुजर रही है(हालांकि यह अभी तक महानगरों और कुछ चुनिंदा प्रांतो तक ही सीमित है)। सत्ता की दुकानदारी, राजनैतिक दुर्बलता और कार्यपालिक अकर्मण्यता ने अभी तक हिंदुस्तान में पुरुषों की नारी के प्रति मानसिकता को दशकों पीछे ही ठेल रखा है। शारीरिक तुलना में नैसर्गिक रुप से सबल पौरूष-सौष्ठव अपने पौरूष्तव(या पशुत्व) को तबतक आजमाता रहेगा जब भी एकांतत्व में उसे नारी दिखेगी। अगर हमें इस पौरूष मन-मष्तिष्क को बदलना है तो यह खुलेपन से ही आयेगी। आप नारी को कपड़ों मे लपेटकर पशुओं के बीच उसके स्त्रीत्व कि रक्षा नहीं कर सकते हैं।

इस पुरे प्रकरण पर मशहूर एड-मेकर प्रह्लाद कक्कर का ब्यां स्पष्ट है। उनका कहना है कि आज अगर रात के 8-9 बजे एक अकेली लड़की जिंस या कोई मार्डन कपड़े पहनकर किसी बस या आटो का इंतजार कर रही होती है तो पुलिस वाले और आम अवाम के बीच यही संदेश जाता है कि यह कोई वेश्या है। वे आगे कहते है, कि अब इस मानसिकता से कोई कैसे करेगा मदद- फिर हम पुलिसवाले को ही दोष क्यों दे। और निचले स्तर पर काम करने वाले कांस्टेबल और बीट आफिसर जो सबसे अधिक इन परिस्थितयों से दो-चार होते हैं उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि क्या होती है? क्या खाप-पंचायतो के क्षेत्र में पला-बढा एक युवा अचानक से एक परीक्षा और 2-3 माह की ट्रेनिंग पास कर पुलिस सेवा ज्वाइन करते ही अपनी मानसिकता बदल पायेगा? 

स्पष्ट है कि जब हमारे समाज में स्त्री भ्रूण-हत्या के सर्वाधिक केस बड़े शहरों से आते हैं और भारतीय प्रशासनिक सेवा, वरिष्ठ मेडिकल अफसर और दिल्ली विश्विद्यालय के प्रोफेसर जैसे समाज के सम्मानीय लोग स्त्री भ्रूण-हत्या के दोषी पाये जाते हैं तो हमारा अक्स हमारे सामने है। हमारे समाज में स्त्रीयो को आज भी दोयम दर्जे का ही माना जाता है। कालेज परिसर और शापिंग माल में दिन के उजाले में हॅाट-पैंट कल्चर को अपनाती लड़कियाँ भी जानती है कि वे बस-स्टैंड पर सुरक्षित(उस वेश-भूषा) नहीं है। घनाढ्य घरों की लड़कियां तो व्यक्तिगत वाहनों से आवाजाही कर और अन्य संसाधनों से अपने को एक हद तक सुरक्षित रख कर "प्ले" और "डिस्प्ले" कर लेती हैं, परंतु सामान्य घरों की लड़कियों को अपने इर्द-गिर्द की सामाजिक मानसिकता और वास्तविकता को समझना होगा।