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Changing Perception And Social Media


अमेरिका के डा. किम मेसन, के अनुसार आज 8 बर्ष के बच्चे भी इंटरनेट से जुड़ चुके है और 8-18 बर्ष के बच्चे औसतन 7 घंटे समय आनलाईन मीडिया पर व्यतीत कर रहें है। हैरानी की बात यह है कि इन सात घंटो में वे किसी एक वेबसाईट से जुडे न रहकर विभिन्न पेजों पर विजीट करते रहते हैृ- इस कारण वे कुछ ऐसी वेबसाईट या पेजों के बारे में जान जाते है जो उनके बालमन को कुप्रभावित करती है। भारत में इंटरनेट का उपयोग करने वालों मे सर्वाधिक संख्या य़ुवाओं की है। हालांकि कंप्यूटर, लैपटाप, गेमिंग डिवाईस ने जहां इंटरनेट की पहुंच को सीमाओं मे रखा था टेबलेट और मोबाईल के आने से यह सर्वसुलभ हो गया है। अब तो पटना, मुजफ्फरपुर और मोतीहारी तक मे आपको युवाओं का मोबाइल-इंटरनेट प्रेम राह चलते दिख जायेगा। आये दिन ये प्रचलन सड़क दुर्धटनाओं का कारण भी बन रही हैं।
अमेरिका के "जर्नल आफ द अमेरीकन मे़डिकल ऐसोसिएशन" द्वारा एकत्रित किये गए आंकड़ो के अनुसार फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया को लेकर युवाओं मे नशा जैसा असर है, और उनकी मानसिक अवस्था को लेकर अमेरिकी प्रशासन और अभिभावकों में चिंता है। इसके लिए कई संस्थाओं ने सार्थक पहल भी किए हैं परंतु इंटरनेट के व्यापक रचनात्मक उपयोग को देखते हुए एकमत होना कठिन है।
क्या है साईबरबुलिंग
मोबाईल अथवा इंटरनेट पर उपलब्ध तकनीकों का इस्तेमाल कर के किसी व्यक्ति, ग्रुप या समूह को बदनाम करना, उत्तेजक सामग्री भेजना अथवा अपशब्दों का प्रयोग कर परेशान करना ही साईबरबुलिंग है। आज साईबरबुलिंग को कम ही लोग समझ पा रहे है क्योंकि यह वह अनुभव है जिसे दनिया पहली बार महसूस कर रही है। आप इसे कालेज की रैगिंग कह सकते है परंतु चुंकि इसका दायरा असीमित है इसलिए इसका शिकार कोई भी हो सकता है। उदाहरण के तौर पर लगातार किसी लड़की या महिला को उसके मोबाइल या इ-मेल या फेसबुक अकाउंट पर अशलील कमेंट या तस्वीर भेजना ही साईबरबुलिंग है। चुँकि मोबाईल की तुलना मे इंटरनेट पर पहचान छुपाये रखना आसान है इसलिए गलत किस्म के लोग लगातार काफी दिनों तक जबर्दस्ती किसी से संपर्क बनाये रखते है। अन्य शब्दों मे एकतरफा प्रयास है साईबरबुलिंग। पहचान छुपाये रखकर किसी को लगातार परेशान करते रहना है साईबरबुलिंग।
युवाओं में सर्वाधिक लोकप्रिय है यह तकनीक
गुगल-गुरु जैसे सर्वज्ञानी के सानिध्य मे खुलेपन का यह दौर भारतीय युवाओं में घटती जिम्मेदारी का प्रमुख कारण बनता जा रहा है। एक रिसर्च के मुताबिक मात्र 8 प्रतिशत भारतीय युवा इंटरनेट और गुगल का प्रयोग रचनात्मक कार्यों जैसे प्रोजेक्ट बनाना, लेख-आलेख या किसी कला को सीखने के लिए करते हैं। इस आलेख को सजीव करने के उद्देश्य से हमने पटना विश्विद्यालय का दौरा किया तो नाम न बताने की शर्त पर ज्यादातर युवा छात्रों ने खुलासा किया की वे इंटरनेट का प्रयोग मनोरंजन और पोर्न सामग्री के लिए करते है। 60 प्रतिशत छात्र सिर्फ दोस्तों से जुडे रहने के लिए इन तकनीकों का इस्तेमाल करते है। हालांकि छात्राओं का मत कुछ भिन्न रहा और सिर्फ 35 प्रतिशत ल़डकियों ने कहा कि वे दोस्तों से जुडे रहने के लिए इंटरनेट और फेसबुक का प्रयोग करती है।
क्या-क्या है इंटरनेट पर
आज के दौर मे यह आवशयक है कि अभिभावक भी इस तकनीक को समझें, और इंटरनेट को बेहतर समझने के लिए जरुरी है कि आप पहले कुछ दिनों तक इसे इस्तेमाल करें- ठीक उसी तर्ज पर "पहले इस्तेमाल करें फिर विश्वास करें"। क्या आपका अचार खराब हो जाता है? संजीव कपूर और तरला दलाल की रेसिपी चाहिए? कप़ड़ो पर लगे ग्रीस के दाग छुड़ाना चाहती है। इससे आगे यदि किसी भी तरह की चिकित्सकीय जानकारी चाहिए जैसे एचआईवी और ब्रेस्ट कैंसर से संबंधित बाते पूछने मे हिचकिचाहट होती है तो इंटरनेट पर जुडें। सेक्स समस्या है तो क्या करें? ब्लड प्रेशर, दिल का दौरा जैसे गंभीर परिस्थितयों में क्या हो आपका फर्श्ट रियेक्शन। इंटरनेट पर इन सभी का पलभर में जबाव आप पा सकते है। मुझे आज भी वह दौर याद है जब मेरी माँ पेपर और मैगजीन में छपे "नानी माँ के नुस्खे" या समानांतर टिप्स के कतरन काटकर सुरक्षित रख लेती थी, परंतु अफसोस की ज्यादातर परिस्थितयों में या तो वह कतरन मिलती ही नहीं थी या याद नहीं रहता था कि फलां टापिक पर आपके पास सामग्री मौजूद है।
आज के दौर मे आप इंटरनेट से दुर नहीं रह सकते है। इसकी मदद से घंटो मे होने वाले काम पलक झपकते ही हो जाते हैं। जैसे गैस का नंबर लगाना हो या ट्रेन में टिकट आरक्षण करना हो। बिजली का बिल, फोन या मोबाईल का बिल सहित तमाम यूटीलिटी बिल जमा करने में जहां पहले आपको 3-4 दिन लग जाते थे आज आप 10-15 मिनटों में कर सकते है। अमेरिका, कनाड़ा या आस्ट्रेलिया मे बैठे अपने बच्चों से आप लाईव तस्वीरें के माध्यम से अपने मोबाईल या पीसी पर जुड़ कर बात कर सकते है। अब इन अनगिनत सुविधाओं का लाभ पाने के लिए अगर महीने के दो-तीन सौ रूपये खर्च भी करने पड़े तो डेफ्नेटली नाट ए बैड डील।
बच्चो के लिए क्यों जरूरी है इंटरनेट
आज 8-9 बर्ष के बच्चे भी अभिभावकों से इंटरनेट इनेबल्ड मोबाईल, टेबलेट या पीसी की मांग करने लगे है। ऐसे में यह आवशयक है कि अभिभावक बच्चो की आवश्यकता को समझे। दिल्ली जैसे शहर मे रहनेवाली मेरी बहन अपने बच्चो को इंटरनेट देने के पक्ष मे नहीं थी परंतु जब केंद्रीय विद्यालय मे पढनेवाले उसके 8 बर्षीय बेटे को प्रोजेक्ट और असांइनमेंट पूरा करने में दिक्कत होने लगी तो मैने उसे इंटरनेट और गूगल गूरू (इंटरनेट पर उपलब्ध सर्च इंजन) की मदद लेने का सूझाव दिया। अब चाहे एटलस हो, इंगलिस डिक्सनरी हो या फिर देशों की राजधानी के नाम। प्रधानमंत्री का कार्यकाल या कोई लेख लिखने कि चुनौती 8 बर्षीय मोहित खुद ही सारी सामग्री ढूंढ लेता है और उसके असांइनमेंट समय से पहल पूरे हो जाते है।
अभिभावक हो रहे गुमराह
इंटरनेट पर बातचीत करने के लिए कीबोर्ड की मदद से टेक्सट टाईप करना होता है। चुंकि लोग कम शब्दों या लेटर में अपने को व्यक्त करना चाहते है इसलिए प्राय: शब्दों को संक्षेप मे लिखते और भेजते है, जैसे OK के लिए सिर्फ K और Take Care  के लिए TC. कालांतर मे यह आदत एक भाषा का रुप ले चुकी है जिसे net lingo कहा गय़ा। 1990 के दौर तक ILU शब्द को युवाओं में भरपूर प्रसार मिला हालांकि तब के दौर के अभिभावक इसके पीछे के अर्थ को समझते थे और इसलिए यह प्रेमी युगलों के खतों के अंदर की बात रही। परंतु फेसबुक, ट्वीटर और I-messaging के वर्तमान दौर मे अनगिनत ऐसे आदिवर्णिक(acronym) शब्द हैं जिसे देखकर भी हमें-आपको उसका गूढ जल्दी नहीं समझ आ सकता।