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India's Security Challenged By Social Media

पिछले एक महीने से भारत की एक बड़ी आबादी एक घिनौनी साजिश का शिकार हूई है। इससे सिर्फ आसाम ही नहीं बल्कि संपुर्ण भारत की संप्रभुता खतरे में है। गृह सचिव आर के सिंह का यह बयान कि हम अब जान चुके हैं कि भारत के संप्रभुता को इस तरह भी चुनौती दी जा सकती है, काफी हैरान कर देने वाला है और भारत के खुफिया तंत्र की विफलता को दर्शाता है। सवाल बिलकूल स्पष्ट है कि अगर पाकिस्तान की जमीं पर इतनी बड़ी साजिश रची जा रही थी तो हमारी आईबी क्य़ा कर रही थी। उदय भास्कर जो कि भारत के सुरक्षा मामलों के जानकार हैं कहते हैं कि पाकिस्तान में रची गयी यह साजिश एक बड़ी योजना का हिस्सा थी अन्यथा अफवाह के SMS उन मोबाईल नंबरों पर ही कैसे अग्रसारित किये गए जो कि आसाम और उत्तर-पूर्व के लोगों के थे। इसका अर्थ है कि भारतीय दूरसंचार कंपनियों के डाटा को गोपनीय तरीके से चुराया गया है। वैसे हमारे देश मे ऐसे देशभक्तों की भी कोई कमी नहीं है जो बहूत कम कीमत पर इस तरह के डाटा किसी को भी सौंपने को तैयार हैं।

भारत के गृह मंत्रालय ने 19 अगस्त को बताया कि सोशल मिडिया, इंटरनेट और वेबसाईटों के द्वारा 13 जुलाई(एक महीने से अधिक समय) से साजिश की जा रही थी। इसके बाद सरकार की ओर से य़ह खबर आय़ी की 100 से ज्यादा वेव साईट्स और वेवपेजस् पर रोक लगा दी गई है। 16 अगस्त से केंद्र सरकार ने एसएमएस और एमएमएस सर्विस पर भी शिकंजा कसा और 24 घंटो में 5 से ज्यादा एसएमएस भेजने पर प्रतिबंध लगा दिय़ा। सूचना प्रौधौगिकी की मदद से पता चला कि 150 से ज्यादा वेबसाइटों पर ऐसी भ्रामक तस्वीरों और खबरों को सबसे पहले पाकिस्तान से अपलोड किया गया था जिसके बाद(20 अगस्त तक) कुल 245 वेबसाइटों का एक्सेस भारत से रोक दिया गया। हमेशा की तरह भारत ने पाकिस्तान पर आरोप लगाया और हमेशा की ही तरह पाकिस्तान ने आरोपों से इंकार किया और भारत से पुख्ता सबूतों की मांग की है। वैसे भारत के आरोपों की पुष्टि उस वक्त हो गई जब 21 अगस्त को फेसबुक और ट्वीटर के सर्वर मैनेजमेंट टीम ने इस बात पर मुहर लगा दी कि वैसे तमाम अफवाही फोटोग्राफ और भड़काउ समाचार सामाग्री पाकिस्तान से ही अपलोड किये गए थे।

एक ग्राउँड रिपोर्ट के अनुसार आसाम के चिरांग प्रांत के भवानीपुर गाँव जहाँ मुसलिम बड़ी संख्या में रहते थे आज बिलकुल सुनसान पडा है। वर्तमान में इस पूरे गाँव की आबादी शरणार्थी कैंपों में रह रही है एक अनिशिचत भविष्य की ओर देख रही है। कौन बोड़ो है और कौन मुसलिम(बांग्लादेशी) य़ह सवाल आज पूरे भारत के लिए एक ज्वलंत मुद्दा बनकर रह गय़ा है। उत्तर-पूर्व में प्रतिशोध की चली लहर से आसाम से सर्वाधिक प्रभावित चार जिले कोकाराझार, उदालगूडी, बकसा और चिरांग में दबी आग और बुझी राख से ज्यादा कुछ भी नजर नहीं आता है। 2 बांग्लादेशी(अवैध मुस्लिम शरणार्थी) की हत्या के बदले 4 बोड़ो आदिवासियों(आसाम मूल के भारतीय नागरिक) की हत्या हूई और इसके बाद प्रतिशोध की आग इतनी अधिक गति से ब़ढी की तीन दिनों के अंदर चार जिले बुरी तरह हिंसा की चपेट में आ गये। बोड़ो टेरीटोरियल ओटोनोमस बाडी जो कि बोडो लोगों की आवाज है, दंगे का कारण बोड़ो बनाम गैर-बो़डो मानने से साफ इंकार करती है। बोड़ो नेताओं का कहना है कि यह लड़ाई वास्तव में बांग्लादेश से आये गैर-भारतीय मुसलमानों की वजह से है। इनामुल हक जो कि असम गण परिषद् के स्थानीय नेता है, मुस्लिम बनाम गैर-मुस्लिम की लड़ाई और तत्पश्चात् फैले दंगो को तत्काल नियंत्रण करने की वकालत तो करते है परंतु बोड़ो लोगों को उनके ही प्रांत में अल्पसंख्यक बनाने की साजिश जैसे किसी भी चीज से इंकार करते हैं।

समस्या की जड़ तक पहुँचने का माकूल वक्त अभी नहीं है परंतु 130 किमी लंबे सीमा से हमारी संप्रभुता को जो खतरा है उसपर एक सरसरी निगाह तो ड़ालनी ही होगी। भारत-बांग्लादेश सीमा पर बहने वाली तोरशा नदी बांग्लादेश से भारत में आती है और इस नदी के तट पर सुरक्षा के कोई पुख्ता प्रबंध तो छोडि़ए, बीएसएफ का एक जवान तक नहीं है। भारत-बांग्लादेश सीमा पर तारबंदी का कोई मकसद ही नहीं है जब तोरशा नदी पर बने पुल के नीचे से लगातार दिन के समय में घुसपैठ होती रहती है। हमारी सरकार कि सीमा सुरक्षा के प्रति संवेदनहीनता इस बात से स्पष्ट है कि रात्रि गश्ती के लिए 1 साल पहले 130 किमी. लंबी पुरी फेनसिंग के साथ ही पोल और लाईटिंग की व्यवस्था की गई थी लेकिन आज तक उसमें बिजली नहीं दौडाई गई। इस कारण आज भी सीमा सुरक्षा बल के जवान अंधेरे में रात्रि-गश्ती करने को मजबूर हैं। हालांकि दिल में सुलगती अंगारों की खबरों के बीच उम्मीद के कुछ दिये भी जल रहे हैं। एक इलेक्ट्रानिक टीवी चैनल पर विजुअल के साथ आयी यह खबर काफी सुकून देने वाली रही कि दंगों के दौरान आसाम के चिरांग जिले के भवानीपुर गाँव के मस्जिद को नहीं जलाया गया जबकि उसके पास के ही भवन राख में तबदील हो चुके है। इससे स्पष्ट है कि आसाम के लोग या बोड़ो मुसलमान विरोधी नहीं बल्कि बांग्लादेशी घुसपैठ के विरोधी हैं। अब चँकि लगभग सभी बांग्लादेशी घुसपैठिय मुसलमान ही हैं इसलिए इस पूरे बोड़ो बनाम बांग्लादेशी आक्रोश को मुसलमान और आसाम मूल के बीच दंगा बताकर देश भर के मुसलमानों को आसामियों के विरूद्ध भड़काया जा रहा है।

मलेशिया के भुकंप पीड़ित लोगों के पलायन के फोटोग्राफ (चुँकि आसाम के लोगों और मलेशिया के लोगों का चेहरा मंगोल प्रभावित फलत: एक जैसा दिखता है) को सोशल वेबसाइटों पर अपलोड किया गया और अफवाह फैलायी गयी कि यह भारत के विभिन्न जगहों कि तस्वीरें है जहां से उत्तर-पुर्व मुल के लोग हिंसा से प्रभावित होकर अपने प्रांत लौट रहे हैं। चूँकि तस्वीरों पर इंसान स्वतः विश्वास कर लेता है, फलतः इसका व्यापक असर हूआ और बैंगलोर, मुँबई और अन्य प्रांतो से पलायन शुरू हो गया। अब सोशल मिडिया का काम पूरा हो चुका था और वास्तविक पलायन की वास्तविक तस्वीरें भारत के सभी छोटे-बड़े चैनलों और अखबारों में आने लगी जिसे देखकर उत्तर-पुर्व के लोग घबरा गए और अपने घर लौटने लगे। अचानक हुए इस भीड़ को मैनेज करने के लिए रेलवे को विशेष रेलगाडि़याँ चलानी पड़ी। खैर गृह मंत्रालय के स्पष्टीकरण और वास्तविक हिंसा न होने की खबरों ने सूकून दिया और धीरे-धीरे अफवाहों का प्रभाव कम हुआ परंतु इस घटना ने हमारी खुफिया तंत्र कि कमजोरी को बखूबी शर्मिंदा किया है।