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Seven Crore Extortion Demanded For Nitish Rally

ऐसा प्रतीत होता है बिहार को विशेष राज्य दिलाने की नीतिशिया मुहिम बिहार की आम जनता पर ही भारी पड़ने लगी है। मुजफ्फरपुर के पाटलिपुत्र इंजीनियरिंग कालेज(निजी कालेज) के प्रबंध निदेशक संतलाल यादव से अधिकार रैली को फंडिंग करने के लिए 7 करोड़ की रंगदारी माँगी गई है और पैसे की सप्लाई नहीं होने पर जान से मारने की धमकी दी गई। आरोप यह है कि 26 अक्टूबर को मुजफ्फरपुर स्थित शहीद खुदीराम बोस जेल मे सजायाफ्ता पूर्व विधायक मुन्ना शुक्ला ने जेल से ही फोन कर संतलाल से 7 करोड़ की रंगदारी माँगी। पुन: 27 अक्टूबर को 08-42 बजे सुबह एवं 10-28 बजे सुबह अलग-अलग नंबरो से फोन की गई और गंदी गालियों के साथ जान मारने की धमकी दी गई।
इलेक्ट्रानिक मीड़िया में खबर को प्राथमिकता से दिखाये जाने के बाद सत्तारूढ़ दल हरकत में आया आनन-फानन में प्राथमिकी दर्ज करायी गयी हालांकि मिठनपुरा पुलिस स्टेशन में दर्ज प्राथमिकी में रंगदारी की राशि को 2 करोड़ ही बताया गया हैं। तत्पश्चात् पूर्व की भांति ही नीतिश कुमार का रटा-रटाया बयान आया कि "आरोपों की जांच होगी और कानून अपना काम करेगा"। स्वाभाविक रूप से जद(यू) के तमाम नेता बिना किसी जांच के ही आरोपों को निराधार बताने लगे। यह निश्चित रूप से राष्ट्रीय स्तर पर एक पखवाड़े पूर्व हुए राबर्ट वाड्रा प्रकरण का पुनर्मंचन जैसा प्रतीत हुआ जब सभी कांग्रेसी नेता आरोप लगने के घंटे के भीतर ही आरोपों को निराधार बताने लगे।मीडिया के बढ़ते दबाब मे मुन्ना शुक्ला कि पत्नी एवं वर्तमान जद(यू)विधायक अंजु शुक्ला ने भी स्वीकार किया है कि पैसे की माँग की गई थी लेकिन तर्क यह कि वह आपसी लेन-देन का मामला है और उधार न चुकाने की मंशा से कालेज के निदेशक संतलाल ने व्यक्तिगत लेन-देन के मामले को रंगदारी की शक्ल दे दिया।
कौन है मुन्ना शुक्ला
गंभीर आरोपों से घिरे मुन्ना शुक्ला उर्फ विजय शुक्ला सिर्फ एक पूर्व विधायक ही नहीं है, य़ह एक ऐसा नाम है जिसकी धौंस मोटे तौर पर संपूर्ण उत्तरी बिहार पर है और राज्य की सत्ता किसी के पाले में हौ इनकी राबिनहुड वाली छवि का असर अछुण्ण रहता है। नीतिश के प्रथम सत्ता काल मे मुन्ना शुक्ला सत्तारूढ़ दल के विधायक थे हालांकि उनपर हत्या जैसे गंभीर आरोपों का मुकदमा चल रहा था। कालांतर में न्यायालय से सजा होने के कारण उन्हें पद त्याग करना पड़ा परंतु सुशासन बाबू का प्रेम इन दबंग आपराधिक व्यक्तियों के लिए बढ़ता ही रहा और 2010 विधानसभा चुनाव में नीतिश ने उनकी पत्नी अंजु शुक्ला को पार्टी टिकट दिया और नीतिश लहर की वजह से वह चुनाव जीत गयीं। यहां यह जानना जरूरी है कि वर्तमान में यह दबंग नेता एक पूर्व मंत्री बृज बिहारी प्रसाद(लालू सरकार में कैबिनेट मंत्री)की हत्या(13 जून 1998) के आरोप मे ताउम्र कैद की सजा काट रहा है। इसके आलावा मुन्ना शुक्ला पर गोपालगंज के तत्कालीन जिलाधिकारी की हत्या का भी आरोप है। ज्ञातत्व है कि राजद शासन के दौरान में मुजफ्फरपुर में भीड़ ने गोपालगंज के तत्कालीन जिलाधिकारी की हत्या दिनदहाड़े उनके कार से खींच कर कर दी थी, और मुन्ना शुक्ला और कुछ अन्य दबंग नेता उस भीड़ की अगुआई कर रहे थे। 
अधिकार रैली की सार्थकता पर सवाल
अधिकार रैली को जनता का समर्थन तो नहीं ही मिल रहा है प्रदेश में इसके पक्ष में हो रहे सत्ताधारी दल के प्रयासों को धन, समय एवं उर्जा की बरबादी बताया जा रहा है। राजधानी की तमाम होर्डिंग पर जबरन कब्जा कर लिया गया है और बड़ी संख्या में अस्थायी पोस्टर एवं बैनर से डिवाइडर एवं दीवार पाट दिये गये हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से लगातार दबी दबाई खबरें लीक कर आ रहीं हैं कि अधिकार रैली के लिए पैसों की वसूली की जा रही है। ट्रेवेल ऐजेंसी और निजी बस चलाने वाले कई लोग कैमरे के पीछे नाम न बताने की शर्तो पर इस बात को कूबूल करते हैं। पटना विशविधालय के राजनीतिशास्त्र के पूर्व व्याख्याता प्रो. जे. के. शर्मा बड़े ही बेहतरीन उदाहरण से इस रैली की सार्थकता पर प्रश्न ख़डा करते हैं। "अगर आप को वेतन नहीं मिले (या और कोई मांग है) तो आप अपनी मांगों के समर्थन में घर के अंदर प्रदर्शन करेंगे या संबंधित अथारिटी के दरवाजे पर? विशेष राज्य की मांग के लिए इस रैली का आयोजन पटना में करने का कोई अर्थ ही नहीं है- आप दिल्ली जाइये, अनशन किजिये, रैली कीजिये। परन्तु, पटना में इस भारी भरकम रैली का कोई औचित्च ही नहीं है।"
सरकार में दबंग नेताओं की बडी संख्या
चार नवंबर को पटना में होने वाले अधिकार रैली में बड़ी संख्या में भीड़ जुटाने के लिए पूरा सरकारी तंत्र कहीं खामोशी से तो कहीं खुलकर सामने आ चुका है। मोकामा के जद(यू) विधायक एवं दबंग नेता(जिनकी अपराघिक पृष्ठभूमि से बिहार का बच्चा-बच्चा वाकिफ हैं) की बड़ी-बड़ी हौर्डिग पटना की सभी सड़को पर लगाये गए हैं। और चूंकि विधायक जी भी बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने के नीतीशिया मुहिम में जोरदार समर्थन दिखा रहें है उनके लिए सभी हौर्डिग उपलब्ध हैं। पटना जंक्शन पर दो विज्ञापन होर्ड़िंग को सिर्फ इसलिए फाड़ दिया(तस्वीरों में स्पष्ट) गया क्योंकि संबंघित कंपनी इस सरकारी जुबानी हुक्म को मानने के लिए तैयार नहीं हुई। वर्तमान दौर मे किसी भी राज्य या केंद्र मे सत्ता पर बने रहने के लिए के लिए समझौते करना लाजमी है पर उसकी सीमा सत्ता के सारथी को पता होनी चाहिए। और नीतिश कुमार को याद रखनी चाहिए कि अपराधिक सांठगांठ को भंगुर करने की अपेक्षा से ही जनता ने उन्हें पुन: राज्य की सत्ता सौंपी है।
अपराध को मिटाने के वादे के साथ 2005 में सत्तासीन हुई जदयू के विधायक विजय कुमार शुक्ला को भी हत्या के इसी केस में कारावास हुई थी। इसी केस मे अन्य सजायाफ्ता शशि कुमार राय भी जद(यू) के विधायक ही थे। सारी हकीकत जानते हुए भी नीतिश ने ऐसे लोगों को सरकार में शामिल किया। बात दिगर है कि अगर एक दूसरे दबंग अपराधी मोहम्मद शहाबुद्दीन(लालू के सहयोगी) को दिल्ली के तिहाड़ जेल में भेजा जा सकता है तो हत्या के आरोप मे उम्रकैद काट रहे मुन्ना शुक्ला को उनके गृह जिला के जेल मे क्यों रखा जाता है? क्या सिर्फ इसलिए कि वह सत्तारूढ. दल का सहयोगी है? बहुत आसानी से कल्पना कि जा सकती है कि ऐसा दबंग नेता अपने गृह जिला के जेल में कैसी सजा काट रहा होगा।