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मोदी के जेड प्लस सिक्योरिटी कवर को रौदती बिहार सरकार
मालूम हो कि नरेंद्र मोदी को भारत की सर्वोच्च सुरक्षा प्रोटोकाल- अति विशिष्ट सुरक्षा जेड प्लस दी गई है। इसमें एनएसजी की विशेष प्रशिक्षत टीम मोदी के इर्द-गिर्द होती है। इस सिक्योरिटी प्रोटोकाल को प्राप्त करने वाला व्यकि्त जहाँ जाता है उस स्थल पर 72 घंटे पहले से जीरो टोलरेंस जैसी स्थिति होती है।
सबसे अहम बुलेट प्रुफ गाड़ी देने में टालमटोल किया गया। इसे अनुपलब्ध बताया गया। जबकि 26 अक्टूबर को राष्ट्रपति महोदय ने इसी का उपयोग किया था। वैसे सप्ताहांत तक उहापोह की स्थिति में अंतिम विकल्प के तौर पर गुजरात पुलिस ने एक बुलेट प्रुफ कार दिल्ली से मंगायी रखी थी।
इसके बाद रैली को स्थगित करन के लिए बिहार पुलिस ने जैमर उपलब्ध नहीं होने का बहाना बनाया। तब गुजरात पुलिस के उच्चाधिकारियों से जबर्दस्त बक-झक हुई। केंद्रीय गृह मंत्रालय तक मामले की तूल को जाता देख अत्यंत दबाब में आयी बिहार सरकार ने 26 की देर रात या कहें 27 के अहले सुबह इसपर राजी हुई।
सुरक्षा एक्सपर्ट जी.एस.राव, की मानें तो यह राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। वह भी तब जब 26 तक आपका सुरक्षा तंत्र यह सब राष्ट्रपति के लिए मुहैया करा पाया परंतु अगले ही दिन सब कुछ अनुपलब्ध!
ABP न्यूज के वरिष्ठ पत्रकार ब्रजेश जी से प्राप्त इस खबर का मैने अपने स्तर पर जाँच किया तो सबकुछ शब्दशः सत्य साबित हुआ।
अभी मैं यह लिख ही रहा हूँ कि बार-बार मेरे को ट्वीट मिल रही है कि यह नीतिश की फ्रस्ट्रेशन है। यकीं मानिए कल देर शाम तक मैं इन सबको बदइंतजामी मानता रहा, और विस्फोटों को आतंकी हमला। परंतु वरिष्ठ पत्रकार ब्रजेश जी के सटीक और तार्किक इनपुट ने मुझे साक्ष्य जुटाने पर मजबूर किया। अब यह बात दावे के साथ कह सकता हूँ की बम धमाके में भले नीतिश का हाथ न हो परंतु उन्होने प्रशासनिक स्तर पर जो साजिश की है वह पूरे बिहार पर न मिटनेवाला कलंक है।
अब हद देखिए-
बम धमाकों के बाद चारो तरफ अफरा-तफरी मची थी और लगभग एक हजार की भीड़ गांधी मैदान के बाहर पुलिस कंट्रोल रूम को घेर कर प्रशासन के खिलाफ नारे लगाने लगी। हद तो तब हो गई जब बैकफुट पर आये बिहार पुलिस के आईजी खोपड़े साहब ने मेरे वरिष्ठ सहयोगी और गुरू आलोक कुमार से आग्रह किया की आप भीड़ को समझायें। आलोक जी ने उनसे कहा कि आप यूँ नहीं लाउडस्पीकर से बात करें तभी इतने लोगों को एड्रेस किया जा सकता है। पूरा महकमा पुलिस कंट्रोल रूम में पीएसी या भोंप ढूँढता रह गया पर रहे तब तो मिले।
धीरे-धीरे हालात बिगड़ते गये और भीड़ आक्रमक हुई। हल्का पथराव हुआ और पुलिस कंट्रोल रूम का मुख्य गेट बंद कर लिया गया। अभी गाँधी मैदान के चारों ओर लाखों लोग थे, चीख-पुकार मचा था, घायल विक्षिप्त पड़े थे और हमारा पुलिस कंट्रोल रूम खुद ही अपनी सुरक्षा मे कैद हो कर रह गया।लगभग 50 मिनट के बाद एक दृश्य ने मुझे चौंकाया। पुलिस वर्दी में एक जवान बिलकुल नया पीएसी(भोंपू) लेकर पुलिस कंट्रोल रूम में घुसा। यह दृश्य जितना दिलचस्प था उतना ही आश्चर्यजनक भी। कितनी बेबसी, कितनी लाचारी और इस स्तर की प्रशासन की तैयारी... मैं सन्न रह गया पर एक तस्वीर जरूर ले ली ताकि आपको भी यकीन हो जाये।
मोदी ने दिया धैर्य का परिचय
गाँधी मैदान की हर गतिविधि मोदी अपने मंच से साफ देख रहे थे। राजनाथ के भाषण के दौरान दो धमाके हुए। 15 फुट उंचे मंच से मोदी को सबकुछ साफ दिख रहा था- धुआँ, लपटें और भगदड़। इनसबके बावजूद उन्होने और पूरे संगठन की ओर से ऐसा कोई शब्द नहीं दुहराया गया जिससे भगदड. मचे। मोदी ने अपने भाषण के अंत में सबसे शांति और भाईचारा बनाये रखने की अपील की। उन्होने कहा कि आप सभी रैली स्थल से आराम से निकलें और सुरक्षित घर पहुँचे- घबराने की कोई बात नहीं है।
नीतिश की प्रेस वार्ता
आनन-फानन में नीतिश ने शाम में प्रेस वार्ता की। पर उन्होने नरेंद्र मोदी की शांति कि अपील(नोट्स) का संज्ञान तक नहीं लिया। भई, जब आपका प्रशासन भोंपू तक इंतजाम नहीं कर सका तो देश के सर्वाधिक कद के नेता की अपील का ही असर था कि भीड़ शांतिपूर्वक लौट गयी।
नीतिश जी, हद कर दी आपने
आज 28 अक्टूबर, अभी दिन के बारह बजे तक नीतिश जी ने नरेंद्र मोदी को फोन तक नहीं किया। औपचारिक शिष्टाचार तक को भूल रहे हैं नीतिश कुमार। राजनीतिक मर्यादा को रौंदते नीतिश शायद अपने राजनैतिक हश्र के अंतिम पायदान पर खड़े हैं। कहीं इस तरह के आचरण उनके राजनीतिक करियर का अंत न कर दे।
Amit Sinha is a bilingual journalist. You can join him on facebook.amit.

