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Juvenile Justice means Justice Jeopardised

This article originally appeared as featured article on www.jagranjunction.com on Sep14, 2013
अपने कई आदेशों में सर्वोच्च न्यायलय ने निचली अदालतों को फटकार लगायी है और स्पष्ट कहा है कि यदि आरोपी जन्म प्रमाण पत्र या प्राथमिक विधालय की नामांकन रजिस्टर का प्रमाण देता है तो फिर अन्य किसी जाँच की जरूरत ही नहीं है। इसी आधार पर दिल्ली रेप कांड में ज्युवेनाईल जस्टिस बोर्ड(JJB) का निर्णय आया है। और इन्हीं आदेशों के मद्देनजर JJB ने आरोपी के उम्र दस्तावेज को सहर्ष सच मान लिया। न क्रास वेरीफीकेशन का झंझट और न कोई मेडिकल बोर्ड बिठाने की जरूरत।

तेरह साल पहले बर्ष 2000 में किशोर अधिनियम में संशोधन किया गया था। अंर्तराष्ट्रीय मानकों के आधार पर तर्क दिया गया और किशोर की उम्र 16 से बढ़ाकर 18 कर दी गई। तब मिडिया की सक्रियता कम रही और इस कारण इस मुद्दे पर किसी का ध्यान नहीं गया और बिना किसी शोर-गुल के यह संशोधन पारित हो गया।
जूवेनाईल लॅा की सबसे बड़ी विसंगति यह है कि यह पीड़ित के हितों की पूरी तरह अनदेखी करता है। इरादतन इस कानून को ढ़ाल की तरह इस्तेमाल करने की बढ़ती प्रवृति आज घातक रूप ले चुकी है। आज देश की विभिन्न अदालतो के हजारों रेप केस में आरोपी को बालिग या नाबालिग मनवाने में दलीलों की लंबी तकरार ने मूल मुद्दे को कहीं पीछे छोड़ दिया है, कि सर्वप्रथम आरोपी एक बलात्कारी है।

शक के दायरे में कानून ही नहीं न्यायालय भी
दिल्ली बलात्कार कांड में मीडिया की सक्रियता और जन सहभागिता के कारण अत्यंत दबाब में आयी सरकार और न्यायालय ने फास्ट ट्रैक कोर्ट में मामले की सुनवाई करने का निर्णय लिया। इससे आगे बढकर इस केस की सुनवाई प्रतिदिन होने लगी जो स्वागतयोग्य है। परंतु प्राप्त साक्ष्यों के अनुसार इस केस की 90% सुनवाई  अप्रैल के अंतिम सप्ताह में हो चुकी थी। तत्कालीन दिल्ली पुलिस कमिशनर नीरज कुमार पीटीआई को दिये इंटरव्यू में भी यह साफ किया था। उनका मानना था कि कि मई के अंत तक फैसला आ जायेगा। अगर ऐसा है तो फिर सिर्फ 10% दलीलों के लिए जून, जुलाई समेत अगस्त के तीन सप्ताह का लंबा वक्त क्यों लगा? राजनीतिक महकमों में चर्चा है कि ऐतिहासिक फैसला आने से पहले उच्च स्तरीय दबाब में उसे बदला गया। इस तर्क पर सहज विश्वास करना लाजिमी है क्योंकी जब कोल घोटाले जांच की फाईलें सीबीआई के हाथ से सरकार के पास चली जाती हैं तो निचली अदालत और एक आम पीड़िता के केस की क्या औकात।

बलात्कार के साथ अपहरण फ्री
भारत में बलात्कार के लिए 10 साल की सजा है और अपहरण के लिए 4 साल। इसलिए तार्किक तौर पर दोनों अपराध के दोषी पाये जाने पर आरोपी को कुल 14 साल कारावास की सजा होनी चाहिए। लेकिन अपने देश के कानून के अनुसार कनकरेंट सजायाफ्ता को अपहरण एवं बलात्कार के संयुक्त दोषी को 10 साल की सजा ही दी जायेगी। अर्थात् 4 साल की छूट। यानी बलात्कार के साथ अपहरण फ्री। यहां हम किसी काल्पनिक केस नहीं बल्कि एक चर्चित केस की ओर इशारा कर रहे हैं, क्योंकी कानूनी खामियों का ज्वलंत उदाहरण है लखनउ का जाहिरा शबारूद्दीन बलात्कार कांड।

कानूनी खामियों का ज्वलंत उदाहरण - लखनउ का जाहिरा शबारूद्दीन बलात्कार कांड
पूरा मामला यूँ है कि 2 मई 2005 को जाहिरा नाम की 13 साल की मासूम बच्ची को 6 लड़को ने अगवा कर पाँच घटे तक उससे बलात्कार किया। इस दौरान जाहिरा को बुरी तरह मारा पीटा और काटा गया। इस केस में 6 में 4 आरोपी पर दोष सिद्द हुआ। दोष के अनुसार उन्हें 10+4 बर्षों की स्पष्ट सजा मिलनी चाहिए थी परंतु उन्हं 10 साल कारावास की ही सजा दी गई। मतलब 4 साल की छूट। इसी केस का एक दिलचस्प पहलू यह रहा कि तमाम समाजसेवी संगठनो के अथक प्रयास के बावजूद घटना के 8 वें साल भी एक आरोपी पर सुनवाई शुरू तक नहीं हो सकी और वह सिर्फ इसलिए कि मामला जूवेनाइल का था या बनाया गया था। इसके साथ-साथ एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी की यह आरोपी सतारूढ़ समाजवादी पार्टी का दबंग नेता का निकट संबंधी था।

दिल्ली कांड के बाद के जनभावनाओं का घ्रुवीकरण व्यर्थ
दिल्ली के दिसंबर 16 बलात्कार कांड के बाद समाज के हर महकमें की यह माँग उठी कि संज्ञेय और घृणित अपराधों में जुवेनाइल कानून को रद्द मान कर फैसले किये जाये। यह मांग व्यावहारिक, तार्किक और प्रासंगिक भी लगा। कांड के बाद की तीखी जन-प्रतिक्रियाओं के बाबजूद हमारे नेतृत्व टस-से-मस न हुआ और संबधित कानूनी संशोधन के मुद्दे पर सभी दल मौन रहे।

जन सक्रियता के दबाब में सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा को लेकर संवेदनशील कानून बनाने की पहल की और पूर्व चीफ जस्टिस जे एस वर्मा की अगुआई में एक कमिटी का गठन भी किया। परंतु जनभावनाओं को शांत होते कमिटी की सिफारिशों को नजरअंदाज कर दिया। बात-बात पर संसद की कार्यवाही रोकती विपक्षी पार्टियों की बेरूखी ने भी इस मामले में देश को निराश किया है। गौरतलब है कि आज भी भारत में रेप केस में कन्वीकशन रेट(सजा की दर) मात्र 2 प्रतिशत है। इससे स्पष्ट है कि हमारी जाँच एजेसियाँ, पुलिस और अदालते महिला सुरक्षा के मामले में कितनी संजिदा हैं।
Amit Sinha is a bilingual columnist. He is available at facebook.amit