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Democracy Loses To Devils Advocate

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि स्त्रियों के खिलाफ होने वाले अपराध साल-दर-साल तेजी से बढ़ रहे हैं। 16 दिसंबर को दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार के खिलाफ जो व्यापक आक्रोश पैदा हुआ, उसके चलते सरकार को संबंधित कानूनों को और कठोर बनाने के लिए विवश होना पड़ा। इससे उम्मीद बंधी कि ऐसी घटनाओं में कमी आएगी। मगर ऐसा नहीं हो सका। इस केस में शनिवार को जो पहला फैसला आया उसने पूरी न्यायिक प्रक्रिया से जनता का विश्वास उठा दिया।

एक स्थानीय विधालय से एक फर्जी उम्र प्रमाण पत्र बनवाकर दिल्ली रेप कांड के एक आरोपी ने कोर्ट में पेश किया और हमारे न्यायालय ने उसे सच मान उसे नाबालिग करार दे दिया। कौन नहीं जानता कि सामान्य तौर पर अभिभावक अपने बच्चों की उम्र दो-तीन साल कम करवाकर ही स्कूलों में नामांकन कराते हैं? फिर सब कुछ जानते समझते हुए भी व्यावहारिक क्यों नहीं होती हमारी न्याय प्रणाली। मोटी-मोटी किताबों की कानूनी मजबूरी है या कोई राजनीतिक मजबूरी?

विज्ञान के माध्यम से हम डायनासोर और हजारों-लाखों साल पुराने जीवों की सही उम्र पता लगा सकते हैं फिर अदालत ने एक मेडिकल या वैज्ञानिक बोर्ड गठित कर ऐसे घृणित अपराधी की वास्तविक शारीरिक उम्र जानने की कोशिस तक क्यों नही की?

इसके आलावा अगर अपराध की प्रकृति और गंभीरता को भी पैमाना मानकर न्यायालय ने अपना फैसला सुनाया होता तो आज शायद भारतीय न्याय प्रणाली से लोगों का भरोसा इस कदर नहीं टूटता। इस तरह 16 दिसंबर को दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार के खिलाफ जो व्यापक आक्रोश सड़कों पर पैदा हुआ था उस सामूहिक जनभावना को हमारी व्यवस्था ने कुचल दिया।

घटना को तर्कसंगत परिणति तक पहुंचाने की जटिल और लंबी होती प्रक्रिया के कारण ज्यादातर मामलों में पीड़िता और उसका परिवार न्यायालय तक जाना ही नहीं चाहता। इसके बाद भी जब 16 दिसंबर जैसे उदाहरणीय केस में अगर इस तरह के तर्कहीन और अव्यवहारिक फैसले आते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब जनसमूह खुद फैसले करने लगे। अब सब्र का बाँध टूटने लगा है और इंडिया गेट पर विरोध प्रदर्शनों के दौरान लाठी और वाटर कैनन से पिटी जनता कहीं आंदोलित हो गई तो डेमोक्रेसी की दुहाई देने वाली इन स्तंभो को उखड़ते देर न लगेगी।

यह सर्वभौम सत्य है कि दिल्ली में हुई बलात्कार की इस घटना पर जो तीखी प्रतिक्रिया हुई वह अपने आप में अभूतपूर्व थी। जनता की तटस्थ भूमिका ने इस घटना को प्रतीकात्मक बना दिया। घटना के विरोधस्वरूप कैंडिल मार्च करने वालों पर शुरूआती दिनों में सतापक्ष ने मजाक भी किये। पर दिसंबर की ठंड रातों में इंडिया गेट पर हजारो हाथों में जलती मोमबत्ती से टप-टप कर चूता गर्म मोम मानों इस नेतृत्वविहीन भीड़ के खौलते तन-मन को शीतलता दे रहा था और इसलिए यह कहने में अतिश्योक्ति नहीं होगी कि बलात्कार की घटना पर ऐसी तटस्थ प्रतिक्रिया, बदलाव के नए युग के सूत्रपात का संकेत दे रही थी।

व्यवस्था परिवर्तन के लिए हमेशा से कोई एक प्रतीकात्मक घटना ही आंदोलन का मु्खपृष्ठ बनी है. अरब के मोहम्मद बूआजाजी, एक 26 बर्षीय बेरोजगार युवक, जो ट्यूनीसीया की सड़कों पर फेरी लगा कर कुछ सामान बेचता था और अपनी माँ मुनूबिया और बहन बसमा का इकलौता सहारा था. पुलिस ने अतिक्रमण बताकर उसके सामान जब्त कर लिए और जब वह ट्यूनिशिया म्यूनिसिपल के दफ्तर पहुँच कर अधिकारियों से उसके सामान छोड़ देने की विनती की तब वहाँ की महिला कर्मियों तक ने उसे थप्पड़ मारे और पुलिस ने अन्य अमानवीय तरीकों से प्रताड़ित किया. इन सब से आहत मो. बूआजी ने 17 दिसंबर को मिस्र के दमनकारी सरकार के खिलाफ ट्यूनीसिया के सार्वजनिक स्थल पर दिन-दहाड़े आत्मदाह कर लिया. इस घटना से मिस्र की जनता उबल उठी और मिस्र आंदोलन की नींव पड़ी. अभूतपूर्व आंदोलन से अत्यंत दबाब में आये राष्ट्रपति अबीदाईन बेन अली को इस्तीफा देना पड़ा जो पिछले 23 बर्षों से लगातार शासनाध्यक्ष थे। इस प्रतीकात्मक जनाक्रोश की घटना ने पूरे मिस्र का इतिहास ही बदल दिया।

दिल्ली कांड के संदर्भ में जो बात चिंताजनक है वह है कि इतने विरोध के बाद भी न तो सरकार और न ही आला-अधिकारियों में से किसी एक ने भी इस्तीफा दिया था। जनाक्रोश से बिलबिलाई सतापक्ष ने पुलिसिया तंत्र से पहले तो आंदोलन को कुचलने की कोशिस की परंतु इसके गंभीर विपरीत परिणाम को देख बैकफुट पर आ गयी। कुछ कदम पीछे हट कर सरकार ने जनता को ठोस कानून और कड़े एक्शन का आश्वासन दिया। परंतु शुरूआती अफरा-तफरी के बाद पहले तो नाबालिग की उम्र 18 से 16 बर्ष करने से सरकार का इंकार और अब 8 महीने बाद सजा (जुवेनाइल को सुधार-गृह में सुधरने के मौके दिए जाते हैं, उसे सजा नहीं कही जाती) देने से इंकार कर न्यायालय ने भारतीय जनभावनाओं को भड़काने के पर्याप्त कारण तो दे ही दिये हैं।
Amit Sinha is a bilingual writer and research Journalist. He can be contacted at facebook.amit