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More Dynamics To Rupee Fall

The article originally appeared at हिन्दुस्तान yuva on Sep1, 2013
खाद्य सुरक्षा विधेयक को लोकसभा की मंजूरी मिलने की खबर ने रुपए को करार झटका दिया और शेयर बाजार भी औंधे मुँह गिरा। ऐसे वक्त में जब देश न्यूनतम जीडीपी, गिरते विकास दर और औधौगिक उत्पादन के साथ-साथ बढ़ते महँगाई दर से त्राहिमाम है, इस विधेयक की मंशा ही गलत नजर आती है। इस योजना से 24,000 करोड़ रूपये के अतिरिक्त बोझ के प्रभाव के अनुमान भर से शेयर बाजार में खलबली मच गई और बुधवार को सेंसेक्स लगभग 600 अंक तक गिर गया। एकदिनी कारोबार मे 3.7 प्रतिशत की अभूतपूर्व गिरावट दर्ज कर रूपया 68.85 के अभूतपूर्व न्यूनतम स्तर को छू गया।

इस बार भी विदेशी निवेशकों में भारतीय अर्थव्यवस्था पर भरोसे की कमी का रोना रोया जाने लगा। परंतु सच्चाई यह है कि भारत में विदेशी निवेश का एक बड़ा हिस्सा पोर्टफोलियो इन्वेस्टर का है जो कि पिछले कुछ सालों में बढ़ कर कुल विदेशी निवेश के 50 प्रतिशत तक पहुँच गया है। मालूम हो कि पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट अस्थाई होता है और यह पैसा किसी भी समय बाजार से किसी भी वक्त निकाला जा सकता है। केंद्र में बैठे हमारे अर्थशास्त्रीयों की फौज इस पैसे को स्थाई विदेशी निवेश समझने या समझाने की गलती क्यों कर रहे हैं, यह आर्थिक से अधिक राजनीतिक प्रश्न नजर आता है।
इन सबसे पृथक वायदा बाजार ने मँहगाई बढाने के लिए जिम्मेदार है। आज खाध पदार्थों के दाम सटोरिए तय करने लगे हैं। गेंहूँ, चावल, चीनी, चना से लेकर सोना-चाँदी तक का कारोबार वर्चुअली(हवा में) हो रहा है। इसे आधार बनाकर बड़े व्यापारी स्टाक कर कृत्रिम कमी पैदा कर रहे है। इससे चौतरफा मुश्किलें बढ़ रही है परंतु न तो सरकार और न विपक्ष ने अबतक वायदा बाजार और पूंजी बाजार के सटोरियों पर लगाम लगाने की चर्चा तक की है। खैर, इन सबके बीच शुक्रवार को राहत की खबरें आई और शुरूआती घंटों में ही रूपया 2 रूपया तक चढ़ा। परंतु अचानक से आई इस खनक से ज्यादा उम्मीद ठीक नहीं।
Amit Sinha is a bilingual writer and Research Journalist. He can be contacted at facebook.amit