This story originally appeared at www.palpalindia.com in May 2013
देश में
आज 90 प्रतिशत इंजीनियरिंग कालेज प्राईवेट हैं। इंजीनियरिंग पास करने के बाद 30-35
प्रतिशत बच्चे बेरोजगार रह जाते हैं। बड़ी संख्या में बेरोजगार इंजीनीयर दूसरे
पेशा जैसे मार्केटिंग, क्लर्रिकल जाब और किराने की दुकान तक
चलाने को मजबूर हैं। AICTE, MCI और NCTE की कसौटी सवालों के घेरे में है। पिछले 10 सालों में
भारत में शिक्षा दर को 65 प्रतिशत से 74 प्रतिशत करने के सरकारी दावे चाहे जो कुछ कहें यह सर्वविदित है कि भारत
में उच्च शिक्षण संस्थानों की स्थिति बेहद खराब है। अकुशल प्रबंधन और नजरअंदाजी के
कारण नामी-गिरामी संस्थानों की गरिमा धूमिल हुई है। शोध-संस्थानों की स्थिति सबसे
बुरी है। ब्रेन-ड्रेन बदस्तूर जारी है।
ऐसे में
बिहार में निजी विश्र्वविधालयों की स्थापना की दस्तक से इस गरीब राज्य का छात्र
वर्ग सकते में है। शिक्षाविद् मानते हैं कि बिहार में निजी विश्र्वविधालयों की
आवश्यकता को बढा चढ़ा कर दिखाया जा रहा है। इसके पीछे भ्रष्टाचार और पूँजीवादी
मानसिकता है। सरकारी विश्र्वविधालयों की जर्जर स्थिति को सुधारने के बदले सुशासन
सरकार निजी विश्र्वविधालयों को आमंत्रित कर बिहार में उच्च शिक्षा को धनाढ्य वर्ग
के हाथों में सौंप देना चाहती है। जब सरकार से निजी संस्थानों के मनमाने रवैयों का
अनुभव बताया जाता है तो सरकार रेगूलेशन और नियंत्रण की बात करती है। परंतु सुशासन
सरकार का यह तर्क मजाकिया ही लगता है। रेगुलेशन की बात तो भूल ही जाईये, जब सात
बर्षों में सुशासन सरकार सिर्फ पटना के छोटे-मोटे कोचिंग संस्थानों का पंजीकरण तक
नहीं करवा सकी है, ऐसे में 100-500 करोड़ रूपये निवेश करनेवाली
संस्थानों को मापदंड पर अनुशासित रखना असंभव ही दिखता है।
2011 तक देश भर में 145 निजी विश्र्वविधालय थे, जिनकी संख्या अब 151 हैं। पिछले बर्ष जब इनमें से 53 विश्र्वविधालयों के बारे में शिकायतें मिलीं तो यूजीसी की टीम नें
निरीक्षण शुरू किया। दिसंबर 2012 में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री
एम.एम.पल्लम राजू ने राज्यसभा में जानकारी दी की सिर्फ 5
संस्थानों ने ही यूजीसी गाईडलाईन का पालन किया था। यह दृश्य चौंकानेवाला है कि
नान-टेकनीकल शिक्षा को गाईड करनेवाली सर्वोच्च संस्था यूनीवर्सिटी ग्रांड कमीशन(UGC)
के पास ऐसे कोई अधिकार ही नहीं है कि वह नियमों की अनदेखी करनेवाले
निजी विश्र्वविधालयों को बन्द कर सके। यूजीसी की सीमित अधिकारों को लेकर सरकार में
कोई चिंता दिखाई नहीं देती। परंतु महाराष्ट्र, बिहार से लेकर
कई राज्यों में निजी विश्र्वविधालयों की स्थापना के पैरोकारों की कोई कमी दिखाई
नहीं देती।
निजी विश्र्वविधालयों
में क्या कुछ चल रहा है यह कई स्टिंग आपरेशन के जरिये प्रामाणिक हो चुका है। न्यूज
चैनल "आज तक" की अंडरकवर टीम ने 2011 में जब राजस्थान
के एक निजी सिंहानिया यूनिवर्सिटी में चल रहे पीएचडी डिग्री के व्यापार का
भंड़ाफोड़ किया तो सब सकते में आ गये। विश्र्वविधालय के जयपुर सेंटर हेड गुप्त
कैमरे पर धरे गये। मात्र तीन बार यूनिवर्सिटी आने की औपचारिकता और फीस 1.20 लाख। पीएचडी की डिग्री आपकी। http://indiatoday.intoday.in /story/degrees-on-sale-in-jaipur-phd-in-3-days/1/153852.html ।
इसके बाद
अजमेर के भगवंता यूनिवर्सिटी सहित कई नाम सामने आये जो पैसे लेकर डिग्रीयाँ बाँटते
कैमरे पर पकडे गए। परंतु आज तक कोई कार्यवाई नहीं हुई। अपनी मजबूरी बताते केंद्रीय
मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल के शब्दों में "इन निजी विश्र्वविधालयों पर
नियंत्रण के लिए अभी देश में कोई कानून नहीं है"। परंतु प्रश्न यह है कि आखिर
कानून क्यों नहीं है? और यदि कानूनी प्रावधान ही नहीं है
तो फिर अनुमति क्यों दी जा रही है?
स्वामी
विवेकानंद विश्र्वविधालय(सागर, मध्य प्रदेश) ने एम.फील और
पी.एच.डी जैसे प्रोग्राम शुरू कर दिये है, जबकि इनके पास इन
कोर्सेस को शुरू करने के लिए मुलभूत सुविधाएं और क्वालीफाईड टीचर तक नहीं हैं। CMJ,
EIILM, मानव भारती, विनायका मिशन, सेंट पीटरस, राजस्थान विद्यापीठ पर खुलेआम डिग्री
बांटे जाने के आरोप लगते रहे हैं।
बिहार
में इस बिल को लाने के साथ ही दरियादिली दिखायी गयी है। 2012 में महाराष्ट्र में निजी विश्विधालयों की स्थापना के लिए जो शर्तें तय की
गई हैं उनमें मुंबई मेट्रोपोलिटन, जहां जमीन की उपलब्धता
न्यूनतम है, में कम-से-कम 10 एकड़
क्षेत्र का निर्धारित है। जबकि बिहार में इस मापदंड को पटना म्यूनिसिपल एरिया में
मात्र 5 एकड़ कर दिया गया है। अमरावती जैसे शहरों में 50 एकड़ और ग्रामीण क्षेत्रों में 100 एकड़ की न्यूनतम
कैंपस क्षेत्रफल और 2 करोड़ की इंड़ावमेंट राशि जैसी शर्तों
को बिहार निजी विश्विधालय बिल में काफी आसान कर दिया गया है। संभव है शर्तों में
इस तरह की ढिलाई देकर सरकार शिक्षा के स्तर से खिलवाड़ करने जा रही है।
बिहार
में उच्च शिक्षा को लेकर फ्रश्ट्रेश्न वाली स्थिति है। लालू-राबड़ी सरकार के वक्त
से हाशिये पर गयी उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सुशासन सरकार विगत् सात बर्षों में
कुछ ठोस नहीं कर पायी। एक तरफ चाणक्य विधि विश्विधालय, चंद्रगुप्त नालेज यूनिवर्सिटी की स्थापना कर सरकार अपनी पीठ थपथपाती है
तो वहीं दूसरी तरफ पटना विश्विधालय के पटना कालेज और पटना लाँ कालेज समेंत दर्जनों
कालेजों की स्थिति दयनीय हुई है।
प्राईवेट
विश्र्वविधालय तो छोड़िये बिहार के प्राईवेट कालेजों पर आर्थिक शोषण और नियमों को
दरकिनार करने के गंभीर आरोप लगते रहे हैं। यह मसला बी.एड़. और विधि कालेजों में
अधिक है। पटना के आर.पी.एस. विधि कालेज के कई छात्र दावा करते हैं कि उनका नामांकन
सत्र के अंतिम दिनों में परीक्षा के फार्म भरने के साथ हुआ। यहां नामांकन लेनेवाले
ज्यादातर छात्र प.बंगाल और दूसरे राज्यों से होते हैं। कुछ छात्रों ने माना कि
कालेज में उन्होने एक दिन भी लेक्चर अटेंड नहीं किया फिर भी परीक्षाएं दी और
ढीले-ढाले माहौल में हुई परीक्षा पास भी कर ली।
विश्व के
250 चुनिंदा विश्र्वविधालयों की लिस्ट में भारतीय विश्र्वविधालयों का गौण
होना दुखद है। परंतु इस वास्तुस्थिति को निजी विश्र्वविधालयों की जरूरत के तर्क के
रूप में पेश करना शर्मनाक है। हमारी राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण ही आज देश
के विश्र्वविधालयों की ऐसी स्थिति है। राजस्थान जैसे राज्य जहां सर्वाधिक(33)
निजी विश्विधालय है, वहाँ उच्च शिक्षा कि
स्थिति अत्यंत खराब है। डिग्रीयां खुलेआम बेची जा रहीं है और डाक्टरेट(Ph.D.) जैसी मानक उपाधि के प्रति लोगों
का सम्मान कम हुआ है।
फिर हम
यह क्यों भूल जाते हैं कि आज अमेरिका जैसे पूँजीवादी देश में भी 80 प्रतिशत से ज्यादा छात्र सरकारी विश्र्वविधालयों में ही पढ़ते हैं। इन सब
तथ्यों से तो यही पता चलता है कि निवेश के पर चौतरफा आलोचना का शिकार रही नीतिश
सरकार शिक्षा के नाम पर निवेश करवाना चाह रही है और शिक्षा के स्तर को सुधारने की
इनकी मंशा शक के दायरे में हैं।
