The article originally appeared on www.biharkhojkhabar.com on July 20th, 2013
बदलते परिस्थितयों में आजकल मुद्दों की प्रासंगिकता राजनीतिक दल तय करने लगे है। लोकतंत्र में आम आदमी
की भूमिका नगण्य हो चुकी है। रोजमर्रा की जिंदगी में मँहगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी से लड़ते-लड़ते वह इतना टूट चुका है कि राजनीति से दूरी मे ही वह अपनी भलाई समझता है। हर पाँच साल के अंतराल पर एक या दो बार वोटिंग बूथ तक जाने तक में उसकी दिलचस्पी घटती जा रही है। निःसंदेह इस परिदृश्य के लिए वही दल जिम्मेदार होगी जिसने स्वतंत्र भारत में सर्वाधिक समय तक शासन किया है। इन 66 बर्षों में भारतीय राजनीतिक पटल पर ध्रुवीकरण के दो ज्वलंत मुद्दे बने रहे है। पहला मुद्दा है कांग्रेस बनाम गैर-कांग्रेसवाद और दूसरा सेक्युलरिज्म बनाम कम्यूनलिज्म का।
की भूमिका नगण्य हो चुकी है। रोजमर्रा की जिंदगी में मँहगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी से लड़ते-लड़ते वह इतना टूट चुका है कि राजनीति से दूरी मे ही वह अपनी भलाई समझता है। हर पाँच साल के अंतराल पर एक या दो बार वोटिंग बूथ तक जाने तक में उसकी दिलचस्पी घटती जा रही है। निःसंदेह इस परिदृश्य के लिए वही दल जिम्मेदार होगी जिसने स्वतंत्र भारत में सर्वाधिक समय तक शासन किया है। इन 66 बर्षों में भारतीय राजनीतिक पटल पर ध्रुवीकरण के दो ज्वलंत मुद्दे बने रहे है। पहला मुद्दा है कांग्रेस बनाम गैर-कांग्रेसवाद और दूसरा सेक्युलरिज्म बनाम कम्यूनलिज्म का।
कांग्रेसवाद बनाम गैर-कांग्रेसवाद
दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेसवाद बनाम गैर-कांग्रेसवाद के मुद्दे पर कांग्रेस की भूमिका एक पार्टी के रूप में न रहकर एक विचार के रूप में रही। इसका फायदा भी उसे मिलता रहा है। दरअसल कांग्रेस ने आजादी के पहले और बाद में खुद को देशभक्ति के पर्याय के रूप में प्रोजेक्ट किया और इस आभामंडल को बनाये रखने में वह कई दशकों तक सफल भी रही। यही कारण है कि 1970-80 के दशक में लोग बड़ी शान से कहते थे कि "हम तो पैदाईशी कांग्रेसी हैं"। तब कांग्रेसी होना शान(देशभक्ति) की बात होती थी । यही कारण है की एक बहुत बड़ा किसान वर्ग, शहरी और ग्रामीण गरीब क्रांगेस से बाद के दिनों तक जुड़ा रहा। जमींदार, मुखिया और तमाम नबाब अपने निजी स्वार्थवश सता से जुड़े रहने के कारण कांग्रेस के समर्थक रहे। यहाँ तक की समाज का एक बड़ा बुद्धिजीवी वर्ग भी देशभक्ति और कांग्रेस के इस पर्याय को पृथक रूप से परिभाषित अथवा प्रचारित नहीं कर सका।
नया नही है राजनीतिक ध्रवीकरण का अनुभव
जयप्रकाश आंदोलन के साथ ही कांग्रेस के देशभक्त रूपी इस प्रतिमा के दरकने का दौर प्रारंभ हुआ। परंतु अत्यधिक वैचारिक नेतृत्व का बोझ देश को सुदृढ़ नेतृत्व नहीं दे सका। दरअसल आपातकाल और उसके आसपास के बर्षों में गैर-कांग्रेसवाद का जो पौधा पनपा वह वक्त-वक्त पर सता लोलुप्त नेताओं की वजह से फल-फूल नहीं पाया। विपक्ष की अंदरूनी रणनीतिक गतिविधियों की खबर लेकर कांग्रेस येन-केन-प्रकारेण सता में बनी रही। इसके साथ ही गैर-कांग्रेसवाद के समग्र विस्तार और ध्रुवीकरण का फायदा नैसर्गिक रूप से भी कांग्रेस को मिला। बिहार के परिदृश्य में इसकी तुलना लालू-राबड़ी के दौर से की जा सकती है, जहाँ संपूर्ण विपक्ष के एक-जुट होकर "लालू हटाओ" के बुलंद होते नारों के बाबजूद लालू ने 1995 और 2000 विधानसभा चुनावों में बाजी मारी और 2005 चुनावों में भी 25 प्रतिशत वोट लेकर सबसे लोकप्रिय पार्टी के रूप में उभरी। हालांकि मात्र 75 सीट लाकर वह सता से दूर रह गयी।
अबकी बहस सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता
राजनीतिक ध्रुवीकरण के कारण हमेशा से किसी एक पलड़े पर भीड़ तो बढ़ती है लेकिन इसका फायदा दूसरे पक्ष को ही अधिक मिलता है। अब सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता को लेकर जो बहस चल रही है उसमें भाजपा एक ध्रुव पर और बाकी सारे दल विपक्ष में नजर आ रहे हैं। 1990 के दशक में रामलला, अयोध्या और धारा 370 के निरस्त्रीकरण जैसे विषयों को लेकर देश के भीतर अभूतवपूर्ण हलचल शुरू हुई। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में यह वह दौर था जिसने धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर पूरे देश झकझोर कर रख दिया। जनसंघ और भाजपा का कद अपेक्षा से अधिक बढा़ और हिंदुत्व जैसे शब्द खबरों के शीर्षक में जगह पाने लगे। बस यहीं से कांग्रेस बनाम गैर-कांग्रेसवाद का मुद्दा खत्म होने लगा और भारतीय राजनीतिक पटल पर सेक्युलरिज्म बनाम कम्यूनलिज्म की जद्दोजहद शुरू हुई।
मोदी के खिलाफ ध्रुवीकरण – मोदी बनाम गैर-मोदी
मोदी के सार्वजनिक भाषणों पर गौर करें तो पायेंगे की वह हमेशा गवर्नेंस की बात करते है, बेहतर प्रशासन की बात करते हैं। वे बात करते हैं भ्रष्टाचार की, महँगाई की और बढ़ते बेरोजगारी की। राष्ट्रभक्ति के साथ ही वह अपने स्वपनदृष्टा होने की छवि भी गढ़ते हैं। देश के विकास को गुजरात माडल से जोड़ने की कवायद करते दिखते मोदी विकास के प्रतिमान दिखते हैं। और फिर एक ऐसा जुमला बोल देते हैं जिससे उनके विरोधी एकमत हो जाते हैं। बार-बार होती इस आचरण की पुनरावृति निश्चित तौर से कोई संयोग नहीं है। दरअसल मोदी की इस रणनीति को कांग्रेस समझ ही नहीं पा रही है। जबकि मोदी अपने खिलाफ ध्रुवीकरण की प्रकिया आगामी लोकसभा चुनावों की पूर्वसंध्या तक मजबूत कर देना चाहते हैं। यह बहुत कुछ आपातकाल के पूर्व में इंदिरा गांधी के दौर की पुनरावृति होगी जब तमाम गैर-इंदिरा विचारों के ध्रुवीकरण को खुद इंदिरा ने ही अपने बयानों और कार्यशैली से मजबूती दी थी। और, 1971 के चुनावी शोलों को टहलते-टहलते पार कर लिया था।
नरेंद्र मोदी के जुमले और परेशान सेक्युलरिस्म
राष्ट्रीय राजनीतिक मंच पर नरेंन्द्र मोदी के दस्तक के साथ ही इस मुद्दे की प्रबलता पुनः बढ़ी है। संघ, वाजपेयी, शाईनिंग इंडिया, आडवाणी और गोवा को लांधते मोदी ने अपने आपको इस प्रकार स्थापित कर लिया है कि वे आज संपूर्ण भारत के राष्ट्रीय विमर्श को मोड़ने की ताकत रखते हैं। सोशल मीड़िया से आगे बढकर आज पूरी मुख्यधारा मीड़िया उनकी इर्द-गिर्द घूमती नजर आती है। उनके बयानों पर प्रतिक्रिया लेने-देने के लिए होड़ लगती है। वे बोलकर आगे निकल जाते हैं और कांग्रेस समेत तमाम दल तीन-चार दिनों तक उसपर सिर खपाते नजर आते हैं।
नरेंद्र मोदी के जुमले और परेशान सेक्युलरिस्म
इनसबके पीछे मोदी की अपनी ताकत और कमजोरी ही है। कट्टर मुस्लिम समुदाय किसी भी हालत में मोदी को माफ नहीं करना चाहता। कांग्रेस, जदयू, राजद, लोजपा, लेफ्ट, बसपा, सपा समेत दर्जनों तथाकथित सेक्यूलर पार्टियों के एक ध्रुव पर जमने से लगभग 18 प्रतिशत की ताकत रखने वाला मुस्लिम वोट आपसी खींचतान से बुरी तरह बंटेगा और उसकी ताकत कमेगी। दूसरी ओर, मुस्लिम समाज की कट्टरपंथी अवधारणा से चिढते अन्य अल्पसंख्यक वर्ग के अलावा हिंदूओं को मोदी के रूप में एक नेतृत्व मिलेगा। इसके साथ ही मोदी जानते हैं कि घर के अंदर एकजुटता बनाये रखने के लिए जरूरी है कि बाहरी ताकतों से लड़ा जाये। इन सारे समीकरणों को लेकर चलते मोदी अपनी रणनीति में तेजी से कामयाब होते जा रहे हैं, इसलिए बस इंतजार किजिए अगले जुमले का।
Amit Sinha is a Bilingual Writer cum Research Journalist. He is available at facebook.amit

