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Apolitical Correction

लेकिन बदलते वक़्त की नजाकत और बढ़ते युवा आक्रोश को ना समझ पाने वाली केंद्र सरकार अपनी संवेदनहीनता का दुष्परिणाम देख चुकी है, जब विगत १६ अगस्त से अनसन पर बैठे एक गाँधीवादी ने केंद्र सरकार और उसके सारे महकमे को समस्त मीडिया के सम्मुख घुटनों के बल चलने पर मजबूर कर दिया. गिरफ्तार करने की औपचारिक घोषणा के तीन घंटे के अन्दर अन्ना को छोड़ना, छत्रसाल स्टेडियम के अन्दर और बाहर दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र -छात्राओ का अभूतपूर्व व्यापक जनसैलाब का उमड़ना गृह मंत्रालय के लिए सरदर्द बन गया और उसने आनन-फानन में उन्हें छोड़ने का आदेश जारी किया.

अनसन की जगह ना देने से लेकर तमाम हथकंडो में टीम अन्ना को उल्झाने की कोशिस से जनाक्रोश को और बल मिला और अनैतिक तरीके से अन्ना की गिरफ़्तारी ने उनकी भ्रस्टाचार विरोधी मुहीम को नयी ऊर्जा दी. १५ अगस्त की शाम को जब अन्ना मात्र २०-२५ समर्थको के साथ अचानक राजघाट पहुंचे तो ३० मिनट के अन्दर करीब ५-६ हज़ार लोग वहां तिरंगा और नारों से लिखे पोस्टर के साथ पहुँच गए. उसी समय दिल्ली पुलिस कमिसनर का बयांन की "we never envisaged such a huge assembly in such a short notice ", भारतीय मानस पटल पर अन्ना की छवि के सर्वग्राहा होने का संकेत है. वक़्त रहते अगर संप्रग-२ गठबंधन सरकार नहीं चेती तो निश्चित ही हम एक गंभीर लेकिन सुखद भविष्य की ओर अग्रसर हैं और अन्ना हजारे ने कम से कम उस सुनहरे कल का सूत्रपात तो कर ही दिया है.